अपराध बढ़ाने में टीआरपी और क्लब 100 करोड़ की भूमिका !

ब्यूरो कार्यालय, मुंबई/ पुणे। अपराधियों के महिमा मण्डन से मिडिया जगत क्या साबित करना चाहता है? समाज को इससे कितनी मदद मिल रही है ? टीआरपी के धंधे में अंधी होती मिडीया तमाम जगहों पर अपने फर्ज भूल गयी है। देश की कानून ब्यवस्था का खुला मजाक उड़ा रही फिल्मों को महज मनोरंजन मानकर नही छोड़ा जा सकता। यदि हम आज के दौर की आपराधिक पृष्ठभूमि वाली फिल्मों व युवाओं के ब्यवहार पर गौर करें तो पातें हैं कि वो पात्र जिन पर फिल्में बनी है उन्हे आदर्श मान ,भटके नवयुवा उनके पगचिन्हों पर चल पड़े हैंैं। फिल्म र्निमाताओं मे कुछ भी करके 100करोड़ के क्लब में शामिल होने की होड़ मची है।
अपराध बढ़ रहा है। विकास की अंधी दौड़ मेें जहाॅ फिल्में युवाओं को भटकाने का प्रयास जारी रखें हैं, वहीं लोगों का विश्वसनीय मीडिया जगत अपराधियों का नाटकीय रुपांतरण दिखा कर टीआरपी और वाहवाही दोनो लूट रहा है। बाबर, धूम, गैंग आॅफ वासेपुर, वंसअपान ए टाइम इन मुम्बई सरीखी खूब पैसा बटोरने वाली अपराध पृष्ठभूमि की फिल्मों ने समाज में कोई बदलाव किया हो न किया हो इन फिल्मोें के नायकों व विलेन से प्रभावित युवा, गोली दागना, खुली सड़क पर गाली बकना फैशन में शामिल कर चुके हैं। फिल्म प्रभावित बाइक स्टंट के शौक ने कई मासूम जिंदगी रोड पर खत्म कर दी। मशहूर क्रिकेटर मो0 अजहरुद्दीन के पुत्र की बाईक स्टंट में दुःखद मृत्यु देश के सामने उदाहरण है।सम्पन्न परिवार के बच्चों द्वारा चेन स्नेचिंग,मोटर व बाइक की चोरी, सरेआम चैराहों पर फायरिंग,अवैध , नंगे असलहों का खुलेआम प्रदर्शन ,फेसबुक, हव्वाट्सअप्, लाईन व हाईक जैसे ई-मित्र समूह में युवाओं की पसंद का सबसे अधिक पोस्टर हथियारों से भरा है। कभी इस तरफ खूफिया तंत्र की नजरे इनायत क्यों नहीं हो रही? जैसे आपके विचार हैं आपके क्रियाविधि व शौक उसे परिलक्षित कर देतंे हैं। आश्चर्य इस बात का है कि धर्मधुरंधर, राष्ट्रवादी, देशभक्त नेतागण को नही दिखता कि दाउद इब्राहिम, अबु सलेम जैसे चरित्र, फिल्मों मेें नायक की तरह प्रस्तुत किये जा रहे लोगों को पूरे कथानक में लीजेंण्ड साबित करने की कोशिश भी की जाती है। यह चर्चा तब और भी गम्भीर हो जाती है जब फिल्मों की टाईटिल प्रमाण पत्र के लिए घूस का मामला सामने आता है। ऐसी ही फिल्में हैं जिनमे कभी- कभी जाॅच के दौरान पता चलता है कि इसके निर्माण का खर्च किसी डॅान ने उठाया था। पैसा कमाने के साथ-साथ प्रभुत्व जमाने का ध्येय इन्हे बोनस में मिल जाता है। जिस तरह ये मसाला परोसा जा रहा है देश व समाज के हित में तो कत्तई नहीं लगता।
केन्द्रिय फिल्म प्रमाणन बोर्ड और न्यूज ब्राडकास्ट प्राधिकरण दोनो की जिम्मेदारी और सतर्कता बढ़ानी पड़ेगी। न्यूज चैनल अक्सर किसी श्री प्रकाश शुक्ला, सुरजभान जैसे देश भर के छॅटे गुण्डों को स्टाइलिश तरीके से दिखा कर क्या परोसना चाहतें हैं?उनकी इस प्रस्तुति की वर्तमान में क्या प्रासंगिकता है? इन्हीे सब से प्रभावित पिं्रट मीडिया लोकल अपराधियोें के स्टाइल उसके रुतबे को किसी साहित्य की तरह लिखने लगा है। जेल में बंद अपराधी के लिये ये खबरें काफी महत्व की होती हैं। जेल मे अखबार , कैदियो को पढ़ने के लिये मिलता है लेकिन अपराध या अपराधी से जुड़े समाचार की कटिंग कर दिया जाता है। इतने से ही वे बेचैन हो जाते है और पूरे समाचार वाला पत्र मंगाकर पढ़ने के बाद इत्मीनान होते हैं। ये हाल जनपद स्तरीय अपराधियों के हैं। इन्हे अखबार में छपी खबर से खुद की हैसियत बताने का मौका मिलता है। बाजार पर दहशत बनाने व मनचाही धन उगाही में आसानी रहती है। जरा कल्पना कीजिये आतंक के उन आकाओं का जिन पर फिल्म बनाई जाती है, उनका क्या मकसद होता है ? कहीं न कहीं स्वयं का बर्चस्व कायम रखनें का यह सबसे आसान तरीका है। जिम्मेदार लोग महज खानापूर्ति कर यह तर्क देतें हैं कि फिल्म में काल्पनिक घटना होती है, समाचार नाट्य रुपांतर दिखाते हैं। यह बदलते परिवेश को सिवाय भयावह बनाने के कुछ और नहीं। गौरतलब है कि लघुस्तर अपराधी अपने अखबारी महिमामण्डन से छोटे ब्यापारियों व नवयुवा जो उनमें दिलचस्पी रखता है उन पर अपना दबदबा कायम रखते हैं। हाई प्रोफाईल अपराधी यही फार्मूला थ्रीडी के रुप में प्रस्तुत करतें है। फिलहाल तो सरकार व समाज दोनो को सजग व जागरुक रहने की आवश्यकता है, तभी सही दिशा मिल पायेगी।

 प्रभा देशमुख

 मुंबई

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