अबकी बदरा ना बरसे तों…!

girgit1प्रकृति से लड़ने वाला यो़द्धा  , अथक परिश्रम करने के बाद भी कोई हिसाब किताब नही जोड़ने वाला अक्खड़  , सरकार की विकास गाथा सूंची मे सबसे नीचे रहने के बावजूद अपनी चाल में मस्त  ,  महत्वाकांक्षा से कोसो दूर रहने वाला धरती माॅ का लाडला बेटा ‘किसान’ ; आज निरास है। उसे सूखा, बाढ़, आपदा ने कभी इतना नुकसान नही पहुचाया जितना कि सरकार नें ! ये किसी भी दल की रही हो, किसान को उम्मीद देकर धोखा देती रही। भेाले-भाले किसान धीरे- धीरे इनके जुमलो में रुचि लेने लगे, नतीजा आज उम्मीद ज्यादा पाल लेने के कारण  घबराहट में आत्महत्या कर रहे हैं । सरकार व राजनीति की गलियों मे चैपाल जमाने वाले उसे भी वोट बैंक समझ रहे हैं। इस बार सूखा सामने दिख रहा है अब वह पहले की तरह आसमान की तरफ भी नहीं देखता , किसान किससे उम्मीद रखे सरकार… शाहूकार… जमांखेार… समाजसेवी… उसकी जमीन पर लार टपकाते उद्योगपति…. पता नहीं आज सभी के चेहरे में उसे एक कीड़ा गिरगिट नजर आता है ;  अफसोस ! 

V.M.

                     सुखा को हल्के में लिये तो बुरे फॅसेगी सरकार!

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New Delhi:भारतीय रिजर्व बैंक ने सरकार को सुझाव दिया था कि वह कमजोर मॉनसून के चलते कीमतों के बढऩे की स्थिति से निपटने के लिए आपात योजना तैयार करे। इस बीच सूखे की आशंका के चलते पिछले तीन दिनों में बीएसई सेंसेक्स तकरीबन 4 फीसदी की गिरावट के साथ 1,035.57 अंक लुढ़क चुका है। वित्त मंत्री याद दिलातें हैं कि पिछले साल भी मॉनसून का बिलकुल ऐसा ही व्यवहार रहा था। उन्होंने बताया कि खाद्य प्रबंधन के माध्यम से पिछले साल भी हमने कीमतों पर काबू पाने में कामयाबी हासिल की थी। हालांकि मौसम विभाग की भविष्यवाणी सही साबित न होने के कई उदाहरण खोजे जा सकते हैं, लेकिन पूर्वानुमान की उसकी प्रक्रिया बेहतर हुई है। इसलिए चेतावनी को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। मौसम विभाग ने अप्रैल में ही इस साल मानसून के कमजोर रहने के संकेत दे दिए थे।पर तब उसका शुरुआती पूर्वानुमान तिरानबे फीसद बारिश का था। अब उसका कहना है कि इस वर्ष बारिश अट्ठासी फीसद ही रह सकती है।

                             कमजोर रहेगा मानसून

atmoshfereअगर बारिश का आंकड़ा छियानबे फीसद से नीचे रह जाए, तो उसे सामान्य से कम माना जाता है। अट्ठासी फीसद के पूर्वानुमान ने सूखे का डर पैदा किया है। इससे निपटने की तैयारी के लिए ज्यादा वक्त नहीं है। इसलिए सरकार को अभी से कमर कसनी होगी। पूर्वानुमान के मुताबिक देश के उत्तर-पश्चिमी इलाकों में मानसून सबसे कमजोर रहेगा। जब भी ऐसी नौबत आती है, तो उसके पीछे अल नीनो प्रभाव की बात कही जाती है। वर्ष 2009 में भी यह बड़े सूखे का कारण बना था। लेकिन केंद्रीय भूविज्ञान मंत्री हर्षवर्धन ने भी माना है कि जलवायु बदलाव मानसून के लचर रहने के अनुमान के पीछे एक बड़ा कारण है। ग्लोबल वार्मिंग के चलते मौसम में तीव्र उतार-चढ़ाव का सिलसिला बढ़ रहा है। इसलिए अंदेशा सूखे का ही नहीं, बल्कि कम बारिश में व्यतिक्रम का भी है। खरीफ की फसलों पर सूखे का साया मंडरा रहा है। तीन दिन पहले आए जीडीपी के आंकड़े बताते हैं कि पिछले वित्तवर्ष में जीडीपी की वृद्धि दर सात फीसद से अधिक रही, पर कृषिक्षेत्र में कोई वृद्धि होना तो दूर, उलटे 2.3 फीसद की कमी दर्ज की गई।

                       साठ फीसद की आजीविका सीधे खेती से जुड़ी है

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देश की करीब साठ फीसद आबादी की आजीविका सीधे खेती से जुड़ी है। पहले से ही बदहाल किसानों पर सूखे से कैसी मुसीबत आएगी, इसकी कल्पना की जा सकती है। मगर असर खेती पर ही नहीं, समूची अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। उपभोक्ता सामान की बिक्री में गिरावट के आंकड़े आ चुके हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मांग घट जाने के कारण यह गिरावट और बढ़ सकती है। बांधों में पानी की मात्रा घटने से बिजली उत्पादन पर भी बुरा असर पड़ेगा। मौसम विभाग का पूर्वानुमान जारी होने से पहले ही रिजर्व बैंक ने मौजूदा वित्तवर्ष की बाबत विकास दर का सरकारी अनुमान कुछ कम कर दिया और महंगाई बढ़ने की चेतावनी दी।

             सूखा व महॅगाई के बीच जमाखोरी  की कुचाल

jamakhorसूखे के हालात में एक तरफ महंगाई और बढ़ेगी, तो दूसरी तरफ विकास दर में कमी आ सकती है। लेकिन सूखे की स्थिति दो कारणों से ज्यादा डरावनी हो जाती है। एक तो यह कि खेती पहले से ही घाटे का धंधा बनी हुई है। अपनी उपज का वाजिब दाम न मिलने का दंश किसान हर वक्त झेलते रहते हैं। बाढ़ या सूखे की स्थिति में तो वे कहीं के नहीं रहते। दूसरा कारण पर्यावरणीय है। पानी की बढ़ती समस्या के बरक्स उसकी बर्बादी का मंजर भी हर ओर नजर आता है। भूजल का ऐसा अंधाधुंध दोहन होता रहा है कि देश के अनेक इलाके ‘डार्क जोन’ की श्रेणी में आ गए हैं यानी वहां जमीन के नीचे से पानी निकालना संभव नहीं रह गया है।
गौरतलब है कि, खेती की ऐसी प्रणाली अपनाने और विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें पानी की खपत काफी घटाई जा सके। सिंचाई के अलावा अन्य कार्यों में भी पानी की फिजूलखर्ची रोकने और वर्षा जल संचयन के कदम उठाने की जरूरत है। सूखे के साथ जमाखोरी और कालाबाजारी बढ़ जाती है। सरकार को भी देखना होगा कि खाद्य पदार्थों की कीमतें बाजार की कुटिल चालों से प्रभावित न हो पाएं

                                                   Vaidambh Media

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