अब तक ‘सिकिया पहलवान’ ही साबित हुए भ्रष्टाचार से लड़नेंवाले बड़बोले !

ईमानदारी ;  आज संदेह के दायरे में !

New Delhi : देश में आजादी के बाद पांच दशक से भी ज्यादा समय तक सत्ता पर काबिज रही कांग्रेस पार्टी फिलहाल अगर परेशान है तो इसकी वजह भी उतनी ही ऊंची है। Jaitley-Kirtiइस पार्टी को चलाने के लिए अब तक इस पर एकछत्र राज करने वाले गांधी परिवार को अदालत के कठघरे में आना पड़ा, यह एक असहज करने वाली बात तो है ही। दूसरी ओर, देश के दिल के तौर पर मशहूर दिल्ली में सभी बड़ी पार्टियों के बीच से अप्रत्याशित बहुमत के साथ सत्ता हथियाने वाले अरविंद केजरीवाल के अपने अधिकारियों के चुनाव पर सवाल हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई की दुहाई देकर लोगों का प्रचंड बहुमत हासिल करने वाले केजरीवाल के अपने हाथ और उनकी ईमानदारी आज संदेह के दायरे में है क्योंकि उनके नजदीकी बाबू के दामन खंगाले जा रहे हैं।इसके अलावा, अमृतसर में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के हाथों करारी हार झेल कर भी केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कृपा के कारण एक ताकतवर मंत्री पद से नवाजे गए अरुण जेटली के आसपास उनकी अपनी ही पार्टी के सांसद कीर्ति आजाद ने घेरा कसा तो ‘आजाद लब’ को ही निलंबित करना पड़ा।

सहिष्णुता बनाम असहिष्णुता !
यह सब तब हो रहा है जबकि देश में सहिष्णुता और असहिष्णुता पर बहस अब भी जारी है। यह समझ से बाहर है कि देश को असहिष्णुता का पाठ पढ़ाने वाले ये राजनेता खुद पर सवाल उठते ही इतने असहिष्णु क्यों हो जाते हैं?arvind-Kejriwal-Arun-Jaitley इसे शायद देश की राजनीति का एक और अफसोसनाक अध्याय ही माना जाएगा कि अरविंद केजरीवाल को जहां अपने घोषित सरोकारों को साबित करते हुए अपने प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार पर लगे आरोपों की जांच के लिए खुद पहल करके उन्हें पाक-साफ निकल आने का इंतजार करना चाहिए था, वहां वे उनके दफ्तर पर पड़े सीबीआइ छापे को इस तरह पेश करने में लग गए, मानो खुद उनके कार्यालय पर छापा पड़ा हो। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस छापे के केंद्र में उनके प्रमुख सचिव ही रहे होंगे और जिस वजह से यह छापा पड़ा था, उसके छींटे से केजरीवाल पूरी तरह आजाद हैं , लेकिन छापे के बाद यह समझना मुश्किल था कि उनकी उद्विग्नता एक तरह से बेलगाम रूप में क्यों फूट पड़ी! उनके गुस्से और परेशानी का आलम यह था कि वे आपा और शिष्टाचार दोनों से नाता तोड़ बैठे। वरना एक राजनीतिक के तौर पर नरेंद्र मोदी और उनके बीच जिस तरह की दूरी है, उसमें मोदी के प्रति उनके सहज होने की उम्मीद नहीं थी, लेकिन कम से कम मुख्यमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति से एक प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति का लिहाज करना लाजिमी होता है।

प्रधानमंत्री को ‘मनोरोगी’ और ‘कायर’ कहना कितना जायज !

आमतौर पर एक सौम्य व्यक्ति के रूप में मशहूर अरविंद केजरीवाल के भीतर क्या और किस शक्ल में छिपा था, जो अचानक ही फूट कर बाहर आ गया !arvind-kejriwal1 भारत के इतिहास में एक ऊंचे और जिम्मेदार पद पर बैठे किसी व्यक्ति ने शायद पहली बार प्रधानमंत्री को ‘मनोरोगी’ और ‘कायर’ कह कर आलोचना की होगी। भ्रष्टाचार के मसले पर किसी को भी नहीं बख्शने के मुद्दे की राजनीति की जमीन पर खड़े केजरीवाल आखिर क्यों इतने विचलित हो गए? भ्रष्ट आचरण के किसी भी आरोपी की जांच और उसे सजा दिलाने की बात करने वाले केजरीवाल के नजदीक जब इसी तरह की एक जांच की आंच पहुंची तो किस वजह से वे बौखला गए? अब तक जिन्होंने उनकी राजनीति को बाहर से देखा है, उन्हें तो यही उम्मीद रही होगी कि वे छापे में आरोपी के खिलाफ खड़े मिलेंगे। लेकिन राजनीति में अपनों के खिलाफ खड़ा होना थोड़ी मुश्किल अपेक्षा है! शायद यही वजह है कि अरविंद केजरीवाल की प्रतिक्रिया ने समूचे देश को हैरान किया। यह भ्रष्टाचार के मुद्दे के सहारे राजनीति में अचानक धमके और सत्ता की कुर्सी तक पहुंचे अरविंद केजरीवाल का एक खालिस राजनीतिज्ञ की तरह किया गया व्यवहार था।

नेता कम, भाजपा- काॅग्रेस के प्रतियोगी बन गये केजरीवाल !
सत्ता में आने के पहले अरविंद केजरीवाल राजनीति के इस फार्मूले पर चल रहे थे कि फाइलें खंगालो, सत्तारूढ़ दल में अपना निशाना ढूंढ़ो और इल्जाम के बदले में इल्जाम लगाओ।Kejriwal- दिल्ली में अभी की लड़ाई की मौजूदा शक्ल यही हो गई है। अव्वल तो राजेंद्र कुमार नाम के ये अफसर पहले भी कई तरह के भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे रहे। उसके बावजूद वे ईमानदारी की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के भी चहेते बने। क्या केजरीवाल को राजेंद्र कुमार का इतिहास मालूम नहीं था?लेकिन इस कसौटी पर केजरीवाल अकेले नहीं हैं। हां, चूंकि उन्होंने खुद को सबसे अलग करके पेश किया था, इसलिए उनके भीड़ में सबसे अलग दिखने की उम्मीद थी। लेकिन वे अब शायद अपने बरक्स खड़ी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसी पार्टियों के साथ प्रतियोगिता में हैं!

न्याय दरबार की हाजिरी यदि अपमान है तो सभी देशवासियों के साथ हो यह नियम !
दिलचस्प है कि ‘नेशनल हेरल्ड’ मामले में गड़बड़ी का मुद्दा उठते ही कांग्रेस की ओर से ऐसी स्थिति पैदा करने की कोशिश की गई, मानो किसी पड़ोसी देश ने हमला कर दिया हो।sonia-rahul-gandhi-parliament-protest_650x400_41438929022 यह देश के लिए तो नहीं, लेकिन गांधी परिवार के लिए सचमुच एक हिला देने वाला प्रसंग जरूर है, क्योंकि सीधे सोनिया गांधी और राहुल गांधी के अदालत के दर पर हाजिर होने की बाध्यता के साथ इस परिवार की प्रतिष्ठा का भी सवाल जुड़ा है। इसके बाद इल्जाम की भाषा इस हद तक चली गई कि प्रतिक्रिया के लिए कोई मर्यादा बाकी नहीं रखी गई। ऐसा लगा मानो सरकार कांग्रेस के खिलाफ न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल कर रही हो। हालांकि, मामला बस यह था कि भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से डाली गई एक याचिका के आधार पर अदालत ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को तलब कर लिया था। हर रोज लाखों लोग अदालतों में हाजिरी भरते हैं। न्यायिक प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं। हजारों सजा पाते हैं और निर्दोष करार दिए जाते हैं। लेकिन सिर्फ अदालत में हाजिरी के सवाल पर इस कदर भूचाल की तरह पेश करने के मायने क्या थे?

अदालती फैसले भी बनते जा रहे हैं राजनीति का मुद्दा  !
आखिर किन वजहों से कांग्रेस ने देश भर में इसे अपने शक्ति प्रदर्शन का मौका बना डाला। क्यों नहीं इसे न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश के तौर पर देखा जाए?Ghulam_National_He पेशी से पहले गांधी परिवार के सिपहसालारों की अलग-अलग प्रेस कांफ्रेंस और पेशी के बाद सोनिया-राहुल का छत पर चढ़ कर यह कहना कितना जरूरी था कि ‘हम लड़ेंगे’, यह कांग्रेस के रणनीतिकारों को बेहतर मालूम होगा। लेकिन अब यह भी थोड़ा साफ होता जा रहा है कि राजनीतिक हिसाब-किताब बराबर करने के लिए अदालती फैसले भी राजनीति का मुद्दा बनते जा रहे हैं। जो भी नई सरकार आती है, पुरानी फाइलें खंगाल कर पुरानी सरकार और उसमें कुछ चुने हुए लोगों के ‘भ्रष्ट कारनामों’ की ‘पोल खोलने’ की कोशिश शुरू कर देती है।

सब कुछ इतना ही बेदाग है तो  डर क्यों रहे लोग !
बिना किसी अपवाद के हर तरफ यही हो रहा है।sonia-gandhi-herald-case पंजाब, हरियाणा, दिल्ली या दक्षिण का कोई राज्य, एक बार कोई पार्टी सत्ता से बाहर हुई नहीं कि उसके नेता अदालत के दरवाजे या फिर कठघरे में पहुंचा दिए जाते हैं। जहां तक ‘नेशनल हेरल्ड’ मामले का सवाल है तो यह मामला कई साल से चल रहा है। इसमें अगर सब कुछ इतना ही बेदाग है, जितना जाहिर किया जा रहा है तो फिर इसमें किसी को भी किसी से डरने की जरूरत क्यों पड़नी चाहिए?

अदालती फैैंसले का राजनीतिक इस्तेमाल !
लेकिन आलम यह है कि इस मामले को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मामले के समकक्ष खड़ा कर दिया गया। national heraldआपातकाल और उसके बाद की इंदिरा गांधी की छवि के रूप में सोनिया गांधी को पेश कर अब कांग्रेस पूरी तरह इस कोशिश में लग गई है कि किस तरह से इस मामले का पार्टी के हित में राजनीतिक इस्तेमाल किया जाए। शायद यही वजह है कि इस मसले पर देश भर में कांग्रेस की ओर से इसके लिए प्रदर्शन हुए, जनता का ध्यान खींचने की कोशिश हुई कि हमारे साथ अत्याचार हो रहा है। इसके अलावा, भाजपा का कांग्रेस के प्रति जो आग्रह और गुस्सा है, वह कोई हैरानी की बात नहीं। अपनी स्थापना से लेकर अब तक भाजपा को ज्यादातर कांग्रेस के ही हाथों शिकस्त खानी पड़ी है। इसलिए इस पर उसकी प्रतिक्रिया स्वाभाविक है कि भ्रष्टाचार के मामले में पेशी के अभिुयक्तों को ऐसे पेश न किया जाए, जैसे वे स्वतंत्रता सेनानी हैं। जबकि सच यह है कि अभियुक्तों को फैसले तक वैसे भी जबरन पेश करना न्यायोचित नहीं। लेकिन राजनीति को एक जंग मान कर मैदान में खड़े नेताओं को यह सब ध्यान रखना रास नहीं आता। इसलिए राजनीतिक टकराव आग्रहों की लड़ाई में बदल जाता है, जहां द्वेष अपना खुला खेल खेलता है।

भ्रष्टाचार  से लड़ने का ढिढोरा पीटने वाले आप व भाजपा मे भ्रष्टसमानता !
अफसोस की बात यह है कि भारतीय राजनीति में चाल, चेहरा और चरित्र की कसौटी पर खुद को सबसे अलग और खास बताने वाली भारतीय जनता पार्टी को अपनी बताई गई खासियतों का खयाल रखना जरूरी नहीं लगता। aap bjpआज भाजपा और ‘आप’ में एक बड़ी समानता यह है कि दोनों ही पक्ष खुद को बेदाग और दूसरे को दागदार समझते हैं। अरविंद केजरीवाल के नजदीकी नौकरशाह को आरोपों के घेरे में देख कर खुश होने वाली भाजपा सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज चौहान के आरोपों के दायरे में आ जाने के बावजूद इनकी वकालत करने में नहीं हिचकती। इसी तरह, सत्ता में आने के बाद केजरीवाल के जो विधायक जेल की हवा खा चुके हैं, पार्टी उनकी वकालत का रुख अख्तियार न करती।Arun-jetaly
अब जब खुद अरुण जेटली जैसे कद्दावर नेता बेहद गंभीर आरोपों के घेरे में हैं तब भाजपा का रवैया हास्यास्पद दिख रहा है। अरुण जेटली दिल्ली में क्रिकेट की सबसे बड़ी संस्था डीडीसीए में कई व्यापक घोटालों या गड़बड़ियों के जिन आरोपों में घिरे हैं और वे जिस तरह की सफाई पेश कर रहे हैं, उस पर कोई उन्हें ‘भोला’ शख्स ही कह दे सकता है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है? पहले अरविंद केजरीवाल और फिर भाजपा के नेता कीर्ति आजाद ने जिस तरह के आरोप लगाए हैं, वे बेहद गंभीर हैं और जेटली को मामला टालने के बजाय इस पर पूरी तरह पाक-साफ होने के लिए खुद ही कठघरे में खड़ा हो जाना चाहिए, और प्रधानमंत्री ने तो उन्हें खुद को आडवाणी जी की तरह ‘बेदाग’ दिखने की सलाह दे ही डाली है।

केजरीवाल के दफतर में सीबीआई तो जेटली के क्यो नहीं!
यों भी, जब भ्रष्टाचार के आरोपों पर केजरीवाल के प्रधान सचिव के घर या दफ्तर में छापे या उसकी जांच होनी चाहिए तो जेटली की क्यों नहीं? delhi-secretariat-rkउन पर तो इल्जाम केजरीवाल ने नहीं, उनकी अपनी पार्टी के ही सांसद कीर्ति आजाद ने लगाए थे। लेकिन जांच में सहयोग करने के बजाए कीर्ति आजाद को ही निलंबित कर दिया गया। क्या यही भाजपा का बाकी पार्टियों के बरक्स अलग ‘चाल, चरित्र और चेहरा’ है? अगर केजरीवाल को अपने अफसर पर लगे आरोपों की जांच में खुद सक्रिय होना चाहिए तो भाजपा को भी जेटली की जांच करवाने में क्यों हिचकने की जरूरत है। और अगर कांग्रेस को इन मामलों में जांच की मांग जायज लग रही है तो ‘नेशनल हेरल्ड’ मामले में उसे परेशान होने की जरूरत क्यों है? अगर आरोप के आधार हैं तो वे किसी पर भी हों, उनकी निष्पक्ष जांच हो।

न्याय सबके लिये बराबर है !
यह समझना होगा कि राजनीति कोई सर्फ कंपनी का इश्तिहार नहीं कि मेरी कमीज तुम्हारी कमीज से उजली है। यह जुमला बेचने के लिए है।jaitley_azad कानून की नजर में अगर केजरीवाल के अफसर को कठघरे में खड़ा होना होगा, तो अरुण जेटली को भी यह साबित करना होगा कि उन पर सामने आए आरोपों का कोई आधार नहीं था। इसके बाद अगर वे पाक-साफ निकलते हैं तो अपनी ही विश्वसनीयता में इजाफा करेंगे। अगर नहीं, तो भारतीय न्याय-व्यवस्था एक बार फिर यह साबित करेगी कि उसके कठघरे में खड़े लोगों का कद नहीं, उसकी नजर में इंसाफ अहम है। दरअसल, अपनी सुविधा से न्याय-व्यवस्था को शक के दायरे में रखने वाले राजनीतिज्ञ यह भूल जाते हैं कि देश की न्यायिक प्रक्रिया इतनी भी कमजोर बुनियाद पर नहीं खड़ी है कि कोई भी उसे अपने हक में या खिलाफ यों ही इस्तेमाल कर ले। अगर वास्तव में ऐसा आम होता तो व्यवस्था कब की चरमरा गई होती। न्यायिक व्यवस्था को प्रभावित करने की कोशिशें भी ज्यादातर नाकाम ही रही हैं। इतिहास का यही इशारा है। ( j.)

मुकेश भारद्वाज

Vaidambh News Analisis

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