अमरावती को सिंगापुर बनाने की क्या मजबूरी है साहेब !

ये सुधारवादी मुख्यमंत्री ?

 New Delhi : अक्सर यह देखा जाता है कि जो राजनेता खुद को अग्रगामी सोच वाला दिखाना चाहते हैं वे भारत में सिंगापुर के अनुकरण की बात जरूर करते हैं।amravati- VS SINGAPUR स्मार्ट सिटी परियोजना को भी उसी आकांक्षा से जुड़ा एक कदम माना जा सकता है। इस क्रम में ताजा नाम है आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू का जो निर्विवाद रूप से देश के मुख्यमंत्रियों में पहले सुधारक का दर्जा रखते हैं। उन्होंने कहा है कि वह राज्य की नई बनने वाली राजधानी अमरावती को सिंगापुर की तर्ज पर विकसित करेंगे।
छद्म बातें !
घरेलू और विदेशी निवेशकों की बात करें तो वे भारतीय उपभोक्ता बाजार की असीम संभावनाओं से आकर्षित हैं और देश के अनिश्चित कार्य माहौल के बीच इस तरह की दूरदर्शी बातों को काफी पसंद करते हैं। निश्चित तौर पर कई अन्य राजनेताओं की तर्ज पर कारोबारी जमात के लोग भी देश की लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के साथ जीने की छद्म बातें करते हैं। वे संसद की स्थिति, कानूनों, न्याय व्यवस्था, कर विभाग और नियामकों आदि को लेकर व्यंजना प्रकट करते हैं और भूमि अधिग्रहण को लेकर चल रही अंतहीन राजनीति का जिक्र भी।CMnaidu परंतु अनेक राजनेताओं की ही तर्ज पर वे भी गोपनीय रूप से वैसे ही अधिनायकवादी प्रशासन की चाह रखते हैं जैसा ली कुआन यू ने सिंगापुर में स्थापित किया था। भला किसे परवाह है कि सिंगापुर के इतिहास का शुरुआती दौर जातीय सफाये को समेटे है और उसका प्रशासन एक परिवार द्वारा संचालित कारोबार का ही प्रतिरूप रहा है जिसमें बेटे और दामादों का दबदबा रहा जबकि असंतुष्टïों को दबाया गया। सबकुछ एकदम साफ सुथरा और सक्रिय नजर आता है। गरीबी, नागरिक अधिकारों पर गंभीरता से ध्यान देना और व्यक्तिगत आजादी से लेकर विचलित करने वाली निष्क्रियता तक ऐसी किसी असहज करने वाली हकीकत का जिक्र नहीं, जिससे हमारा देश दोचार हो रहा है। कारोबारियों को अधिनायकवाद से कभी कोई समस्या नहीं रही है। खासतौर पर तब जबकि यह अन्य लोगों पर थोपा गया हो।

देश आगे बढ़ रहा है ; यह ब्यंग नहीं तो क्या है ?

जिन लोगों को आपातकाल की याद होगी उनको यह भी याद होगा कि कैसे घरेलू उद्योगपति और बुर्जुआ वर्ग के लोग इंदिरा गांधी के अधिनायकवादी शासन और नागरिक आजादी को निलंबित करने की उनकी हरकतों का मौन समर्थन कर रहे थे।modiAMRAVATI केवल वही लोग इसके प्रतिरोध में नजर आ रहे थे जिनको मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्युरिटी ऐक्ट यानी मीसा के अंतर्गत जेल में डाला गया था। उन दिनों देश के नागरिकों को आश्वस्त करने केलिए विशालकाय होर्डिंग लगाए गए थे जिन पर लिखा था, ‘देश आगे बढ़ रहा है।’ यह घटना उत्तर कोरिया के तानाशाह शासकों की याद दिलाने वाली है। कारोबारी समुदाय राजी था। ट्रेनें समय से चल रही थीं। कोई हड़ताल नहीं कर रहा था। नसबंदी के जरिये गरीबों के बच्चे पैदा करने पर रोक लगाई जा रही थी और कामगारों को दंडित किया जा रहा था। वहीं बड़े कारोबारी और कंपनियों के प्रवर्तक अपने आलीशान घरों में बैठे स्कॉच का सेवन कर रहे थे। आपातकाल की पूरी कवायद का सबसे बुरा असर देश के गरीबों पर पड़ा था।
अतुलनीय है भौेेगोलिक स्थिति ?

AMRAVTI
इंदिरा गांधी द्वारा समयपूर्व चुनावों की घोषणा के वक्त तक अगर गरीबों के बजाय कारोबारी वर्ग को सबकुछ सहना पड़ता तो क्या उनको सन 1970 के दशक में भारत में सिंगापुरी शैली के दीदार हो पाते? जी नहीं। ऐसा नहीं हो पाता क्योंकि इतिहास के अपने तुलनात्मक लाभ होते हैं। सिंगापुर का विकास ब्रिटिश शासन के अधीन एक समृद्घ बंदरगाह शहर के रूप में हुआ था जबकि भारत ब्रितानियों के लिए एक ऐसा संसाधन संपन्न देश था जिसका उन्होंने दोहन किया। इतना ही यह मामला आकार और जटिलता से भी ताल्लुक रखता है। ली कुआन यू ने इस एशियाई कारोबारी वंडरलैंड की स्थापना 718.3 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में की थी। भारत में तो एक जिले का आकार ही 4,300 वर्ग किमी तक हो सकता है, यानी सिंगापुर से 6 गुना बड़ा। सिंगापुर की आबादी 50 लाख है जो पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के बराबर है। उसका जातीय मिश्रण कुछ इस तरह तैयार किया गया कि चीन के लोगों का दबदबा है और मलय तथा भारत के लोग अल्पसंख्यक दर्जे पर हैं। जाहिर है भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में ऐसा कभी नहीं होना चाहिए।

अधिनायकवादी शासन लाने भर से सिंगापुर का अनुकरण कितना सही !

यह सोचना भोलापन होगा कि ली कुआन यू की शैली में अधिनायकवादी शासन लाने भर से सिंगापुर का अनुकरण हो जाएगा। उनकी असली विरासत वे प्रशासनिक संस्थान हैं जिनकी स्थापना उन्होंने की। सिंगापुर की सरकार सक्षम और भ्रष्टाचारमुक्त है। उसकी कानून व्यवस्था इतनी सहज है कि कि Singapurअक्सर विभिन्न कंपनियां अंतरराष्टï्रीय अनुबंधों की मध्यस्थता के लिए वहां का रुख करती हैं। उसकी कर व्यवस्था आकर्षक और पारदर्शी है। बुनियादी ढांचा शानदार है और अपराध न के बराबर हैं। कारोबारी सुगमता में भी वह निरंतर अव्वल दर्जों में शामिल रहता है। वह वैश्विक वित्तीय केंद्र के रूप में उभरा है और स्विट्जरलैंड तथा हॉन्गकॉन्ग को चुनौती दे रहा है। मानव विकास सूचकांक की रैंकिंग में भी वह बहुत बेहतर स्थान पर है। एक वक्त कहा जाता था कि गुडग़ांव भारत में सिंगापुर का प्रतिरूप बनेगा लेकिन वहां इनमें से कोई सुविधा नहीं है। वह केवल कांच और कंक्रीट का जंगल बनकर रह गया है। जबकि बुनियादी सुविधाओं के मामले में वह किसी गांव से बहुत बेहतर नहीं है। रोचक बात यह है कि गुडग़ांव का क्षेत्रफल 738 वर्ग किमी है जो तकरीबन सिंगापुर के बराबर ही है लेकिन 1.7 करोड़ की आबादी के साथ वह सिंगापुर के तीन गुना है।

संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है , बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी !

सिंगापुर जैसे देश का amravati-ME  CM PMनिर्माण और उसे स्थायी ढंग से चलाने के लिए केवल ऊंची इमारतें बनाने से काम नहीं चलेगा (नायडू अमरावती में यही करना चाहते हैं)। न ही अधिनायकवादी शासन इसमें मदद करेगा। इसके लिए संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है जो हमारे देश में अत्यंत धीमी गति से आकार ले रहा है। सबसे बढ़कर सामाजिक क्षेत्र के बुनियादी ढांचे का विकास जरूरी है जिसे सरकारें लगातार निजी क्षेत्र के हवाले कर रही हैं। हर गंभीर राजनेता को यह बात मालूम है लेकिन सत्ता में रहने वाला कोई भी नेता इस अनाकर्षक काम में मेहनत भला क्यों करना चाहेगा ?(B.S.)

कनिका दत्ता

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