अर्थयुग में नैतिकता की खोज

बदजुबानी संस्कृति के वाहक बन चुके हमारे नेता सभ्य राष्ट्र के निर्माण में क्या योगदान देंगे,ईश्वर जानें। एक बार फिर नैतिकता से दूर होती हमारी ब्यवस्थाओं को पुनः नैतिक शिक्षा पढ़ाने की असफल कोशिश जारी है। शिक्षा का स्तर उठाने के झूठे दावों से देश का आम आदमी वाकिफ है। गाव का गरीब किसान-मजदूर अनपढ़ है लेकिन उसमे नैतिकता आज भी जिंदा है। पढ़े-लिखे समाज को कौन सी शिक्षा मिली कि उसमे नैतिकता का अभाव चारो तरफ दिख रहा है। भ्रष्टाचार, शोषण, भेद-भाव की बढ़त से तो यही लगता है कि कथित विकासवादी सोचवाले लोगों के बीच कभी नैतिकता थी ही नही। शायद इस बात का अनुमान देश की शीर्षस्थ ब्यवस्थाओं को भी होने लगा है,तभी तो सभी संस्थानों में नैतिक शिक्षा दिये जाने की बड़ी बहस शुरु हो गई है।
अर्थप्रधान ,भाग-दौड़ की जिंदगी में भौतिकवादी ब्यवस्थाओं की अनिवार्यता ने पाल्य व पालक दोनो को स्वाभाविक रिश्ते से बहुत दूर कर दिया है। फलस्वरुप पाल्यों का किशोर मन;प्यार की गलत परिभाषा गढ़ने लगता है। गलत संगति की चपेट मे आकर युवा अपराध को महत्व देने लगते हैं। इनके ऐसे कदम का लाभ अराजकतत्व अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए करतें हैं,फिर उन्हे दूध की मक्खी की तरह अलग कर देतें हैं। अपने पाल्यों से अर्थसंग्राहक अभिभावकों की दूरी देश व समाज के लिए बहुत बड़ा खतरा बन रही है। संसद में मिर्च पाउडर उड़ाते ,चाकू -छूरी दिखा कर सांसदो को डराने का प्रयास करते लोग मिलकर ऐसी कौन सी नैतिकता विकसित करेंगे जो देश को रास्ता दिखायेगा । माननीय कहे जाने वाले लोगों में सबसे ऊपर रहने वाले न्यायधीशों पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगता है। लोक सेवकों पर यौन उत्पीड़न की शिकायतें यें सभी मामले नैतिक शिक्षा की अनिवार्यता को बल तो देतें हैं।
आम वैज्ञानिक धारणा है कि हम जिस तरफ अपने दिमाग को ले जायेंगे वह उसी तरफ खिंच जायेगा। लोकसेवक तथा नेतागण में क्या सभी अपने काम के प्रति ईमानदार हैं। यदि होते तो संसद जैसी जगह पर जहा देश के भाग्य का निर्धारण हो रहा हो वहा मोबाइल पर ब्ल्यू फिल्म देखने व खर्राटे भरने का दुस्साहस कैसे कर पाते। गोवा मे रंगरेंलिया मनाते नेता रंगेहाथ धरे जाते हैं। कई लोकसेवक सरकारी काम के लिये शहर के सुरक्षित होटेल का सहारा लेते हैं। आजकल चुनावी दौर में नेता कुत्ता,पिल्ला हत्यारा सम्बोधित कर अपनी बौद्धिक क्षमता का वैश्विक परिचय दे रहें हैं। निश्चित ही हमारे नैतिक मूल्यों का निरंतर क्षरण हो रहा है। यही कारण है देश के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को कहना पड़ा कि सम्पूर्ण शिक्षा से ही मानव मूल्यों की गिरावट रोकी जा सकती है। एक दिक्षांत समारोह मे महांमहिम ने कहा कि नैतिक शिक्षा पर सर्वाधिक बल देने की आवश्यकता है।दिल्ली उच्च न्ययायालय ने एक याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार व नेशनल काउंसलिं फार एजुकेशन रिसर्च एण्ड ट्रेनिंग को नैतिक शिक्षा पाठ्यक्रम को कैसे और कहा लागू करना है इस पर विचार करे। केन्द्रिय मानव संसाधन विकास मंत्री पल्लम राजू ने एक समारोह मे स्पष्ट किया कि देश के समक्ष नैतिक चुनौतिया हं। इससे निपटने के लिए नैतिक शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण माध्यम है। मानव अधिकारो पर काम करनेवाली संस्था एलर्ट मूवमेण्ट के कार्यकर्ता सुशांत व सौरभ का मानना है कि शिक्षा का उद्देश्य है सत्य व मूल्य के साथ जीवन यापन करने लायक बनाना। सिर्फ शिक्षा में नैतिकता के पाठ्यक्रम का अधिभार बढ़ाने भर से काम नही चलने वाला। सामाजिक कार्यकर्ता ए0के0गम्भीर के अनुसार नैतिकता लाने के लिये सिर्फ शिक्षा ही नही बल्कि सभी संस्थाओं में इसे अनिवार्य रुप में लागू किया जाना चाहिए। फिलहाल अभी सबकुछ सुझाव व परामर्श के बीच उलझा है। चुनाव के बाद नई सरकार क्या निर्णय लेगी तथा विभाग इसे कितना महत्व देंगे यह उनकी अपनी समझ पर निर्भर करता है।

धनञ्जय “ब्रिज”

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