आक्रामक शैली बनी विकास में रोड़ा!

  •    राज्यसभा में 50 से 126 के लिए चाहिए दो वर्ष
  •    निवेशक कब तक रखेंगे सब्र

narendra-modi-and-amit-shah1 ब्यूरो, नई दिल्ली। सत्ता संभालने के बाद मोदी सरकार के कामकाज की जो सर्वाधिक उपलब्धि दिखी वह है ‘हाइपो’। यह बात गुजरात के अहमदाबाद में विश्वभर से आएं उद्योगपतियों के बीच खुद प्रधानमंत्री मोदी ने स्वीकार भी की। चुनावों में आक्रामक प्रचार शैली अपनाने वाले मोदी, बतौर पीएम मोदी विदेशों में भी उसी अन्दाज में मंच संभाले रहे। मोदी सरकार के सत्ता संभालने के बाद से ही उनके सहयोगियों ने भी साम्प्रदायिक व आक्रामक बयानों को जारी रखा, जिससे सरकार को काफी शर्मिन्दगी उठानी पड़ी। सत्ता में आने के बाद भी सरकार का अंदाज विपक्षी जैसा ही रहा। आर्थिक सुधार जैसे अति महत्वपूर्ण बिल तो संसद में, ‘घर-वापसी’ ‘लव-जेहाद’ जैसे कई बयानों की भेंट चढ़ गये। इसके लिए सत्ता पक्ष या विपक्ष कौन जिम्मेदार है!
विपक्ष को आक्रामक होने का मौका मोदी सरकार के बड़बोले नेताओं ने बेमौसम दे दिया जो उनकी अनुभवहीनता या किसी गहरे रहस्य को समेटे हुए है। आमतौर पर ऐसा माहौल सरकार व विपक्ष के बीच कार्यकाल के अंतिम वर्ष में ही देखने को मिलता रहा है। विविधता में एकता भारत की पहचान रही है। सत्ता का दायित्व संभालने वाला चाहे जो हो उसे सबसे सामान व्यवहार रखना होता है, लेकिन मोदी सरकार और भाजपा अध्यक्ष राज्यों में जाकर मुख्यमंत्रियों को सीधे निशाने पर ले रहे हैं। इससे राज्य सरकारों को अस्थिर होने का खतरा दिख रहा है। अमित शाह की यह व्यक्तिगत रणनीति हो सकती है लेकिन किसी राष्ट्र के संचालक में यह अवगुण कत्तई नहीं होना चाहिए। आक्रामकता का भाजपा व मोदी से गहरा रिश्ता है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इतने आक्रामक क्यों है कि राज्यों के मुख्यमंत्री उनसे चिढ़े हुए हैं। क्या ‘मेक इन इण्डिया’ बिना मुख्यमंत्रियों को साथ लिए सफल हो जायेगा? या राज्यसभा में विरोध झेल रही भाजपा के आश्वासन पर विदेशी निवेशक ‘मोदी ड्रीम-2016’ का इतंजार करेंगे। मोदी ड्रीम से तात्पर्य कांग्रेसमुक्त भारत के नारे का है। जिसे मोदी 2016 में कर दिखाने का दावा करते हैं। भाजपा की आक्रमक राजनीति अगर किसी का रास्ता रोके खड़ी है तो वह है विकास। अमित शाह का राजनीतिक विस्तारवाद में आक्रामकता उनका अमोघ है। इससे पश्चिम बंगाल में ममता, उड़ीसा में नवीन पटनायक के अतिरिक्त पार्टी के साथ एनडीए घटक के नेता भी संशक्ति हैं। पीएम मोदी उन मुख्यमंत्रियों का सहयोग कैसे हासिल कर पायेंगे जिन्हें यह अहसास कराया जा रहा है कि तुम्हारी सरकार तो गयी। भूमि अधिग्रहण अध्यादेश-2014 ने विपक्ष के सूने संसार में जान फूंक दी है। जाहिर सी बात है कि आने वाला बजट सत्र काफी हंगामेदार होने वाला है।
सबका विकास की बात करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पार्टी राज्यसभा में मात्र 50 की संख्या में है। जबकि सदस्य संख्या 126 तक पहुंचाने का अनुमान बीजेपी को 2016 तक है। इस दौर में क्षेत्रीय नेताओं के खिलाफ भाजपा नेताओं के साथ-साथ अमित शाह का सुर मिलाना राजनीति में बचकानी हरकत मानी जा सकती है। इस क्रम में नवीन पटनायक ने तो मोदी सरकार पर आरोप लगाते हुए कहा है कि बीजद सरकार को अस्थिर करने के लिए सत्ता का दुरूपयोग किया जा रहा है।
विश्वभर के उद्योगपतियों को पीएम मोदी ने आमंत्रण दे रखा है। वे यहां ‘मेक इन इण्डिया’ के लिए आने को बेताब हैं। स्वयं पीएम मोदी के कथनानुसार विश्व का सबसे बड़ा बाजार हमारे पास है, विश्वभर में सबसे ज्यादा युवा, योग्य, मजदूर हमारे पास है, हमारे दरवाजे विश्वभर के व्यापारियों के लिए खुले हैं। ऐसे लोगों को मोदी सरकार क्या जवाब देगी, जब उन्हें समय से मौका नहीं मिलेगा। यदि यह लोग निवेश नहीं करते और दो वर्ष राज्यसभा में भाजपा जगह बनाती रह गयी तो विनिमय दर और भुगतान संतुलन जैसे आर्थिक संकेतकों पर बहुत बुरा असर पड़ सकता हैं। मोदी सरकार व भाजपा को लोकतांत्रिक सरकार चलाना सीखना होगा। नकारात्मक राजनीति और विस्तारवाद मोदी सरकार के लिए मुश्किले खड़ी कर सकते हैं। विद्वेष के बजाय राज्यों के साथ प्रेम व सौहार्द से आगे बढ़ना होगा।

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