आखिर अपने घर से क्यों भाग रहे मासूम ?

Gorakhpur :  हमारे पास संवेदी इंद्रियां हैं पर कहीं ऐसा तो नहीं कि हम संवेदना खोते जा रहे हैं ! सार्थकता से विलग दिखावे के आकर्षण में कहीं दूर सुदूर ! ये कह पाने का साहस भारत के भविष्य को सड़क व रेलवे प्लेटफार्म पर पानी बोतल बेचते अथवा भीख मांगते देखकर अनायाश ही हो जाता है। ये बच्चे कौन हैं ! कहाॅ से आते हैं ! कहाॅ रहते हैं ! क्यों है इनकी ये दशा ? किसे जिम्मेदार ठहराया जाय! क्या किसी एक ब्यक्ति अथवा तंत्र की लापवाही के कारण ये दृश्य हमारे सामने है ! दिमाग पर जोर डालिये ; जवाब मिलेगा, नहीं ! तो फिर अपने घर परिवार से भागकर अस्त ब्यस्त माहौल में जीवन जीविका चलाते इन बच्चों का रहस्य क्या है ? प्रस्तुत हैं ”धनन्जय शुक्ल” की एक रिपोर्ट —
समाज पर भौतिकवाद पूरी तरह हावी हो चुका है। अब समाज कहने के लिये बचा है वरना परिवार इतनी बुरी तरह बॅटे हुए हैं कि उसके किसी पक्ष को सोचकर ही मन मस्तिष्क गहरे सदमें की ओर कूंच करने लगता है। परिवार चाहे गरीब हो अथवा अमीर बच्चों के पैदा करने व उन्हे पालने पोषने में अनुशासित होना पड़ेगा जिस परिवार में बच्चों के लिये प्रेम और आदर नहीं है वह स्वयं को परिवार व सभ्य नहीं कह सकता। आज यूनेस्को भारत के चंद रेलवे स्टेशन पर सर्वे के आधार पर आंकड़े प्रस्तुत करता है कि 1 करोड़ 10 लाख बच्चे भारत के रेलवे प्लेटफार्म पर आते हैं और किसी न किसी माध्यम से जीविकोपार्जन में लग जाते हैं। ये जीविका उन्हे कभी सुन्दर भविष्य नहीं दे पाती । यह अनवरत 40 वर्षों से देखा जा रहा है। उत्तर भारत के महत्वपूर्ण स्थानों में से एक गोरखपुर रेलवे प्लेटफार्म पर पैदा होने वाले बच्चे आज यहीं जिंदगी बिताते 30-35 वर्ष की आयु पूरी कर चुकें हैं। इनका ना कोई भविष्य है नाही इन्हे किसी अच्छे बुरे की चिंता। कारण स्पष्ट है जबसे ये घर से भागे भागते ही जा रहे हैं। इन्हेाने पहला अध्याय ही भागना सीखा और उसे ही जीवन मान लिया । समाज और ब्यवस्था ने उन्हे जब भी मौका मिला अपने फायदे के लिये केवल शोषण किया । इनका शोषण जरुरतमंदों के लिये आसान है क्योंकि इनमें अत्यधिक उर्जा है घुटन तोड़ अपनों को त्यागकर वह यहां पहुॅचे हैं । वह बदलाव चाहते हैं पर उन्हे इसके आगे का ज्ञान नहीं । जैसा मार्गदर्शक मिला वैसा किया करते हैं और आगे करेंगे ! ये जो बच्चे घर से निकलते हैं तो इन्हे सबसे जादा आकर्षित करते हैं वे लोग जिन्हे हम असामाजिक कहते हैं क्योंकि सामाजिक लोग इन बच्चों से कोई वास्ता रखते ही नहीं।
बच्चों के अपने घर -परिवार से भागने के मुख्य कारण क्या हैं —
माता पिता द्वारा अपने बच्चों के साथ मार पीट गाली गलौज !
बच्चों के अपने परिवार से निकल भागने के कारण पूछने पर अक्सर जवाब मिलता है गरीबी -भूखमरी के कारण । ये जवाब हमारे समझ से कामर्शियल है, किसी तरह टालनेवाला । यही सच नहीं है। गोरखपंुर में रेलवे चिल्ड्रेन के साथ काम करने वाली सेफ सोसाइटी के रिसर्च एण्ड स्टडी विंग के मुताबिक पिछले एक साल में जितने बच्चे स्टेशन पर मिले उसमें 70 फिसद् बच्चे माता पिता के रुखे ब्यवहार से घर छोड़ दिये मतलब कि मार पिटाई, माॅ बाप का आपसी तनाव, घरेलू काम, खेती बारी का दबाव, जबरदस्ती मजदूरी कराना, जातिय विवाद, रोजगार की मजबूरी ,घर में बीमार के इलाज की महति जरुरत इत्यदि । इस मामले में ऐसा नही है कि इस परिस्थिति के शिकार सभी बच्चे अपने घर से भाग जा रहे हैं । लेकिन जो घर से भागे बच्चे स्टेशनों ढाबों पर मिले उनमें इस तरह के मामले सबसे अधिक पाये गये। घर से भागने वाले बच्चों के कारण में गरीबी एक कारण है।
साथ चलते हुए सफर में बिछड़ गये !
माॅ- बाप अथवा अपने किसी परिचित के साथ सफर करते हुए बच्चे रेलवे स्टेशनों तथा बस-टैक्सि स्टैंण्ड पर हाथ छूटने पानी तथा जरुरी सामान खरीदते समय बच्चे अपने स्थान से इधर -उधर हो जाते हैं। यहाॅ स्टेशन पर तुरंत खेज बीन करने पर उनके मिलजाने की अधिक सम्भावना रहती है। इसमें यदि बच्चा नहीं मिला तो तुरंत एफआईआर दर्ज करवाना जरुरी होता है क्योंकि ऐसे बच्चों के चोरी हो जाने की सम्भावना से इंकार नहीं किया जा सकता। गोरखपुर रेलवे प्लेटफार्म पर संस्था को प्राप्त हुए ऐसे बच्चे 40ं प्रतिशत हैं । यहाॅ माॅ-बाप की बच्चे के प्रति असावधानी महत्वपूर्ण कारण है।
रोजगार की तलाश में !
जरुरतेें कभी परिवार की , कभी अपनी ; बच्चों को कम उम्र में ही घर छोड़ने पर मजबूर कर रहीं हैं। कभी बीमार माॅ के इलाज के लिये बच्चा पैसा कमाने शहर की ओर रुख कर देता है कभी मां बाप बच्चेां को बोझ बताने लगते हैं जिससे उसे घर छोड़ना पड़ता है। कई बच्चे होने पर अपने ही बच्चों में भेदभाव , लैंगिक भिन्नता , अपने मुताबिक स्वादिष्ट भोजन की चाह । यहाॅ जनसंख्या घर छोड़ने का कारण है।
शहरी आकर्षण !
बच्चे अबोध होते हैं। उन्हे सब कुछ जान लेने की जल्दी होती है। वे अपने मनमे उठ रहे सवालों का उत्तर नहीं मिलने पर उत्तर ढूढने स्वयं ही निकल पड़तें हैं। बच्चे स्वयं भी अपार सम्भवनाओं का इंद्रधनुष जैसे होते हैं, उन्हे उनकी कोमलता से अलग नहीं आंका जा सकता। पिछले एक साल में 35 प्रतिशत बच्चे शहरी आकर्षण में घर छोड़ कर भाग निकले थे। जिन्हे पुनः उनके माता-पिता के पास पहुॅचाया गया। क्या इससे वे बच्चे दुबारा घर छोड़ कर नहीं भागेंगे ? गरीब हो या अमीर बच्चे सबके एक जैसे होते हैं और घर से दोनो ही भाग सकते है। यदि माहौल उनके अनुकूल नहीं मिला तो। गाॅव और शहर के बीच आकर्षण की एक लम्बी खाई खींच दी गई है। सत्ता में बैठे लोग इस बात पर गौर ही नहीं कर पा रहे कि इसकी भयावहता क्या होगी! जब गाॅव का गाॅव शहर की ओर पलायन कर रहा है तो बच्चा क्यों नही ? पर यह भी सत्य है कि केवल शहर विकसित होने से देश विकसित नही होगा। गाॅव और उसके होनहार के लिये भी उर्जा खर्च करनी ही होगी । ग्रामीण पर्यटन विकसित कर बच्चों में शहरों का आकर्षण कम करना होगा। उन्हे गाॅव की विरासत व अहमियत बतानी होगी । ग्रामीण खेल प्रतियोगिता करनी होगी।
ट्रैफिकिंग !
समाज का सबसे क्रुर चेहरा है ट्रैफिकिंग। समाज का इसलिये कि बिना समाज के यह फलफूल नहीं सकता । आज यह इतना विकसित हो चुका है कि इस कुकृत्य के लिये समूचा विश्व एक बाजार है। यहाॅ उत्पाद एक बार बाजार में आने के बाद सिवाय लाभ के कुछ नहीं देता इस रुप में इसकी हैं इसके कारोबारियों के बीच में। इसमें बच्चों को मजबूत रणनीति के साथ अपहृत कर लिया जाता है। यह इतनी होशियारी से होता है कि इसमें अपहृत हुए बच्चे और कभी -कभी तो जाने -अनजाने अभिभावक भी साथ देतें हैं। यह सबसे भयावह स्थिति है। गोरखपुर में सेफ के आंकड़े बताते हैं कि बीते वर्ष में जो बच्चे रेलवे प्लेटफार्म पर मिले उनमें से 50 प्रतिशत ट्रैफिकिंग चिल्ड्रेन रहे।
प्रेमाकर्षण !
किशोरवय मन में प्रेम के अंकुर फूटते ही रहते हैं। ऐसे में अभावग्रस्त ग्रामीण जीवन में टेलीविजन क्रॅांति ने प्यार में घर से भाग जाने वालों को काफी बल देता आ रहा है, पर वास्तव में घर से भागने का कारण घर का ही माहौल है। ब़़च्चों की महत्वाकांक्षा को दबाना , प्यार -मुहब्बत की बात करने पर चुप करा देना , अभिभावक द्वारा जबरिया शादी करने की जिद, बच्चों की अभिब्यक्ति पर ब्यक्तियों अथवा परिवारों द्वारा प्रतिबंध लगाने की कोशिश ।
रेलवे चिल्ड्रेन केा प्रश्रय !
इन तमाम कारण के साथ जब बच्चे रेलवे प्लेटफार्म पर आ जाते हैं तो उन्हे प्यार-दुलार से कोई उनके बारे में जानने की कोशिश भी नहीं करता। बाद में बच्चों को ही ब्लेम किया जाता है कि फलां चोर है , इतनी सी उमर में ही ये लोगों के साथ सोती है, ये सुधरने वाले नहीं साहब ! इनको स्टेशन पर हराम का मिल रहा है क्यों जायेंगे कहीें! ये विचार इन बच्चों को लेकर रेलवे के लोग भी अलग- अलग तरीके से रखते हैं। कोई नहीं कहता कि वह जब पहली बार स्टेशन पर भाग कर कोई बच्ची आई तब कितनी जिम्मेदारी से उसे सुरक्षा प्रदान करने की कोशिश हुई ? उसके बारे में किस तरह की जाॅच पड़ताल की गई। निः संदेह रेलवे प्लेटफार्म पर विभागीय अनदेखी ने लावारिस लोगों के बसावट में बृद्धि की है। गोरखपुर आपीएफ इंसपेक्टर कृष्णानन्द तिवारी के शब्दों में कहें तो रेलवे स्टेशन पर सुरक्षा के मद्देनजर कोई स्थाई रुप से वास नहीं कर सकता , यदि करता है तो उसे हमें गिरफ्तार कर जेल भेजना आवश्यक हो जाता है। कोई नाबालिग है तो उसे सुधार गृह भेज दिया जाता है। हलांकि श्री तिवारी ने माना कि ये लोग पुनः वापस जेल और सुधार गृह से वापस यहीं आ जातें हैं। आस पास के छोट बड़े दुकानदार भी इन्हे पानी बोतल अथवा कामकाज उपलब्ध कराने में सहयोगी होते हैं। कुछ पुराने भिखारी जो भीख के धंधे में नये बच्चों को डाल कर अपनी सुविधा बढ़ाने की कोशिश करतें हैं। कहनें का आशय है कि जो बच्चे घर छोड़कर अपने परिवार से भाग कर परिर्वतन ढूढने कहें कि अपने अनुकूल दुनियाॅ तलाशने निकलें हों वहाॅ उन्हे सिर्फ दोष देने का तरीका बिल्कुल ही स्वीकार्य नहीं है। कह सकते हैं कि हमारा समाज कहीं ना कहीं रेलवे चिल्ड्रेन की बदहाल जीवन शैली के लिये जिम्मेदार हैं।

सबको बढ़ाना होगा हाथ !
पूर्वोत्तर रेलवे को नये सिरे से रेलवे प्लेटफार्म पर रहने वाले बच्चों के निवास को यथार्थ में स्वीकार करते हुए अपने जनकल्याण बजट का कुछ हिस्सा इन बच्चों पर खर्च कर देश निर्माण में सहयोग करने की जरुरत अवश्यम्भावी हो गई है। साथ ही यह भी समझना होगा कि बच्चे अपने घर से भागते हैं तो वे बुरे कहे जायेंगे ? नहीं, क्योंकि वह किसी ना किसी बुराई से ही पीछा छुड़ाने के लिये भागे हैैं। और सिर्फ गरीब का बच्चा भगता है ऐसा भी नहीं । सबके अपने- अपने कारण हैं, पर दोष निकालने में माहिर समाज से आये जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग रटारटाये जुमला ही रटते हैं जो भविष्य निर्माण की सबसे बड़ी बाधा है। समाज को अपने देखने का नजरिया बदलना होगा ताकि जिन लोगों पर बच्चों की जिम्मेदारी हैं वो टालू रवैया व बच्चों पर आरोपों की झड़ी ना लगांयें जिससे कागजी खानापूर्ति के बजाय धरातल पर भी कुछ कार्य होता हुआ दिखे।

Vaidambh Media

 

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