आधुनिक भारत से गाॅव व किसान दोनो का पलायन !

कृषि से मोहभंग :  युवा भारत के कृषि स्नातक भी भाग रहे खेती से दूर

New Delhi: घुटने तक धेाती,सिर पर मैला-कुचैला गमछा बाधे,  चिलचिलाती धूप हो या भीषण बरसात प्रकृति से हर दिन दो-दो हाथ करने वाला ‘अजेय’ किसान अब हार रहा है।DROUGHT- कुचाल व आधुनिकता की अंधी दौड़ ने उसे हराने का षणयंत्र रच डाला है। उपेक्षित असहाय होते किसान ने अब अपनी मेहनत का हिसाब-किताब लगाना शुरु कर दिया है ।

ग्रामीण युवाओं का बड़े पैमाने पर कृषि से मोहभंग हो रहा है। इससे भी बदतर बात यह है कि शिक्षित ग्रामीण युवा, जिनमें कृषि स्नातक भी शामिल हैं, खुद को लगभग पूरी तरह से खेती-बाड़ी से अलग कर रहे हैं। यहां तक कि अधिकांश किसान नहीं चाहते कि उनकी अगली पीढ़ी भी उनके परंपरागत पेशे को अपनाएं। वे चाहते हैं कि उनके बच्चे गांव-खेत छोड़ शहरी इलाकों में बस जाएं।देश की 35 फीसदी आबादी 15 से 35 वर्ष के आयुवर्ग में आती है और उसमें से former youthतकरीबन 75 फीसदी आबादी ग्रामीण इलाकों में रहती है, ऐसे में खेती से इतने बड़े पैमाने पर मोहभंग चिंता का विषय है। अगर इस आबादी का एक बड़ा हिस्सा शहरों की ओर कूच करता है तो इससे पहले से ही बोझ तले दबे शहरी केंद्रों पर और ज्यादा दबाव बढ़ेगा। इसके अलावा यह पलायन कृषि आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी भारी झटका साबित होगा क्योंकि युवाओं में ही वह कूवत है कि वे खेती को एक विज्ञान एवं ज्ञान आधारित उद्यम में तब्दील कर सकें।

jaivik khetiखेती में युवाओं की कम होती दिलचस्पी की तमाम वजहें हैं। मसलन खेती में कम होता मुनाफा, ज्यादा मेहनत लगना, ग्रामीण इलाकों में सुख सुविधाओं का अभाव और खेतों की जोतों का लगातार सिमटता आकार आदि-आदि।   जमीन के तमाम टुकड़े तो इसी वजह से बेकार पड़े हैं कि बेहद छोटी जोत होने के कारण वहां खेती करना व्यावहारिक नहीं रह गया है। ग्रामीण युवाओं को इतने छोटे खेतों में खेती करने में कोई भविष्य नहीं दिख रहा है। इस बीच उनकी आकांक्षाएं बढ़ रही हैं, जिस पर मास मीडिया के व्यापक होते प्रसार ने भी असर दिखाया है और इसी मीडिया प्रभाव का नतीजा है कि अब ग्रामीण युवा भी बेहतर जीवन और अच्छी नौकरियों की उम्मीद पाले हुए हैं। ऐसी सूरत में, गांवों से उनका पलायन रोकने का इकलौता तरीका यही है कि कृषि और उससे संबंधित गतिविधियों में उनके लिए बेहतर आर्थिक अवसर सुनिश्चित किए जाएं और ग्रामीण इलाकों में जीवन की गुणवत्ता में सुधार किया जाए।

कृषि कार्य आर्थिक रूप से मुनाफे का सबब हो तभी बनेगी बात

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इस किसान के हौसले से मुमकिन हुई बिहार में स्‍ट्रॉबेरी की खेती

युवाओं को कृषि से निरंतर जोड़े रखने की रणनीति के पक्ष में सबसे पहली आवाज प्रतिष्ठिïत कृषि विशेषज्ञ एम एस स्वामीनाथन की अगुआई वाले राष्टï्रीय कृषक आयोग ने उठाई थी। आयोग ने वर्ष 2006 में अपनी पांचवीं और अंतिम रिपोर्ट में इसकी जरूरत जताई थी। अपनी रिपोर्ट में उसने निष्कर्ष निकाला, ‘युवाओं को खेती की ओर आकर्षित करना और यह आकर्षण बरकरार रख पाना तभी संभव हो पाएगा जब कृषि कार्य आर्थिक रूप से मुनाफे का सबब हो और उसमें बौद्घिक संतुष्टिï भी हो।’

farmer  poli houseआयोग ने अपनी रिपोर्ट में कई और पहलुओं पर भी जोर दिया। उसने कहा कि दूसरी कई चीजों के अलावा ग्रामीण इलाकों में बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बेहतर बनाने की जरूरत है। उसने देश भर के कृषि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में बदलाव के लिए भी कहा था। साथ ही यह सुझाव भी दिया कि ग्रामीण युवाओं को खेती के लिए तैयार और प्रशिक्षित करने के लिए वैज्ञानिक पद्घतियों या कृषि संबंधित आमदनी के उपक्रमों के साथ जोड़ा जाए। प्रत्येक छात्र को एक संभावित उद्यमी भी होना चाहिए। नीतिगत पैमाने पर आयोग ने खेतिहर और गैर-खेतिहर ग्रामीण रोजगार रणनीतियों को जोडऩे की जरूरत भी बताई।

फिलहाल सरकारी योजनायें गाॅवों से युवाओ का पलायन नहीं रोक पा रहीं

kukutशुक्र है कि अब आयोग की सिफारिशों के कुछ हिस्से पर अमल की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं, जिसके तहत ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षण देने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है। इसके जरिए उन्हें इस तरह कुशल बनाया जाएगा, जिससे कि उन्हें कृषि और गैर कृषि ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर आमदनी मुहैया हो सके। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने हाल में ही आर्य (कृषि की तरफ युवाओं को आकर्षित करना एवं उन्हें इसमें लगाना) नाम से एक योजना पेश की है। देश के 25 राज्यों में इसे कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) के जरिये अमल में लाया जाएगा। ऐसे हरेक केंद्र में 200 से 300 युवाओं को कृषि और कृषि संबंधित अन्य गतिविधियों में प्रशिक्षित किया जाएगा।  resham keet उन्हें खेती के अलावा मधुमक्खी पालन, कुक्कुट पालन, डेयरी, मत्स्य पालन, बकरी पालन, मशरूम उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण, बीज प्रसंस्करण के जरिये मूल्य वर्धन, मृदा परीक्षण जैसी उन तमाम गतिविधियों में प्रशिक्षित किया जाएगा, जिसमें उनकी दिलचस्पी होगी या उनमें इनसे संबंधित क्षमताएं होंगी। इन प्रशिक्षित युवाओं को अपनी परियोजनाओं को सिरे चढ़ाने के लिए बैंक से कर्ज दिलाने में भी मदद की जाएगी।

शिक्षित युवाओं को गाॅव में ही देना होग कारगर रोजगार !

aadhunik khetiअगर इस पर सक्षम रूप से अमल किया गया तो यह कार्यक्रम जमीन को जोते बिना ही युवाओं को खेती से जुड़ी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष गतिविधियों से जोडऩे में सहायक सिद्घ हो सकता है। वास्तव में वे व्यापक ग्रामीण क्षेत्र में बदलाव के वाहक बन सकते हैं। हालांकि इस कदम की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि इसके साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में शहरों जैसी सुविधाएं बढ़ाकर वहां जीवन स्तर को कैसे सुधारा जा सकता है। जब तक ऐसा नहीं होता है, तब तक ग्रामीण युवाओं, विशेषकर शिक्षित युवाओं की शहरों की ओर मुखातिब होने की इच्छा को सक्षम तरीके से नहीं दबाया जा सकता।

 Vaidambh Media

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