आपदाओं के आगे सिवाय बेबसी के कुछ और भी है करने को ?

क्या देश में  आपदाओं से बचने के लिए पर्याप्त संस्थागत उपाय हैं ?

 Hyderabad :  चेन्नई में बाढ़ का पानी लगातार कम हो रहा है और देश का चौथा बड़ा महानगर धीरे-धीरे सामान्य स्थिति की ओर बढ़ रहा है। bachavबादल फटने के कारण शहर में अचानक आई बाढ़ के कारण 280 लोगों की जान गई और तमाम अन्य नुकसान हुए। राहत प्रयासों में जहां सेना और स्थानीय प्रशासन के बीच बढिय़ा तालमेल देखने को मिला, वहीं अब यह सवाल उठाने का वक्त आ गया है कि क्या देश में ऐसी आपदाओं से बचने के लिए पर्याप्त संस्थागत उपाय हैं ? मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन में इजाफा होने के साथ ही यह आशंका है कि मौसम की विचित्रताएं भविष्य में और बढ़ेंगी। भारत जिस शैली में विकास कर रहा है उसमें यह आवश्यक है कि डेल्टा और ऊंची पहाडिय़ों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में जहां भूस्खलन हो सकता है वहां इससे निपटने के लिए त्वरित रणनीति तैयार की जाए।

विकास की दलील दे रही सरकारें  ऐसी आपदा के लिये कितनी तैयार हैं ?
बहरहाल, अभी तो यही तय नहीं है कि सरकार में इस बदलते परिदृश्य से निपटने की पर्याप्त क्षमता भी है अथवा नहीं। राष्टï्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकार (एनडीएमए) जिसकी स्थापना वर्ष 2005 में की गई थी, ने अब तक विभिन्न आपदाओं के मामले में खुद को अलग साबित नहीं किया है।chennai-Floods- कई तरह से देखा जाए तो किसी भी आपदा में पहली प्रतिक्रिया राज्य की होती है। उस वक्त एनडीएमए की सबसे अहम भूमिका यह सुनिश्चित करने की होती है कि राज्य आपदा प्रबंधन एजेंसियों के पास आपदा को लेकर पूरी जानकारी और विशेषज्ञता हो तथा वे एक दूसरे के साथ तालमेल से काम कर सकें। बहरहाल अब तक ध्यान इस बात पर दिया गया है कि प्राकृतिक आपदा के प्रभाव को सीमित किया जा सके और ऐसी घटनाओं के बाद तत्काल राहत पहुंचाई जा सके। ऐसी बाढ़ के बार-बार आने और उत्तराखंड में दो साल पहले हुए भूस्खलन से यह स्पष्टï है कि विकास की दलील दे रही सरकारों को किसी क्षेत्र में आने वाली आपदा से निपटने की पूर्व तैयारी भी रखनी चाहिए। उदाहरण के लिए कई शहरों में बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में खूब निर्माण कार्य कर लिया गया है।

उत्तराखण्ड, मुम्बई;  अब चेन्नई से क्या सीखे हम ?
उत्तराखंड की आपदा में भी यह बात सामने आई थी। हालांकि उत्तराखंड के बारे में जानकारी है कि आपदा के बाद पुनर्निर्माण में भी वही गलती दोहराई गई है।Uttarkashirain1 अन्य चेतावनियां भी जारी की जानी चाहिए। उदाहरण के लिए दुनिया भर में यह देखा गया है कि मक्के जैसी कुछ फसलों के कारण मिट्टïी की जलधारण क्षमता कम हो जाती है और पानी के बहाव को बढ़ावा मिलता है। इससे बाढ़ आने की घटनाएं बढ़ती हैं। नदियों के किनारों पर लगे वृक्ष भी बहुत मायने रखते हैं। शोध से पता चला है कि वृक्षों के आसपास की जमीन में पानी सामान्य जमीन की तुलना में 67 गुना अधिक रिसता है। नदियों के तल की सफाई से उनमें अधिक पानी तो आ सकता है लेकिन यह बाढ़ को रोकने में सक्षम नहीं। इसके लिए एक संपूर्ण बाढ़ नियंत्रण योजना की आवश्यकता है। चेन्नई में भी ऐसा ही हुआ।
दुनिया के अलग-अलग इलाकों से मिले ये अनुभव बताते हैं कि भारत को इस मामले में एकीकृत और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

प्राकृतिक आपदाओं से निपटने का हो  वैज्ञानिक अध्ययन !political
प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के तौर तरीकों का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए और विकास की विभिन्न संभावनाओं पर उनके असर का परीक्षण किया जाना चाहिए। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय इस पर विचार कर सकता है लेकिन उसका काम पर्यावरण की रक्षा करना है, न कि प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करना। आदर्श तौर पर देखा जाए तो इस विषय पर विचार विमर्श एनडीएमए को करना चाहिए। उसके निष्कर्षों को राज्यों के साथ साझा किया जाना चाहिए ताकि वे अपनी विकास प्रक्रिया में इसे शामिल कर सकें। (B.S.)
Vaidambh Media

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