इंसेफेलाइटिस पर राजनीति के बजाय हो ठोस पहल.

  • 1 से 15 वर्ष के बच्चो को संक्रमण का खतरा
  • तीन दशक बाद भी स्वास्थ्य सेवाओं में फिसडडी है पूर्वांचल 

आजाद भारत के लोकतांत्रिक व्यवस्था में तीन चीजें उपहार स्वरूप मिली है भय,भुख और भ्रष्टाचार। साठ के दशक में भुख सबसे बड़ी समस्या थी कालान्तर में उवर्रक की उपलब्धता ने खूब अनाज पैदा किये लेकिन भूखे का पेट आज भी नहीं भर पा रहा। खाद की बहुउपयोगिता ने भुगर्भ जल व खाध पदार्थों को इतना दूषित कर दिया कि आज हर व्यकित स्वंय को बीमार बता रहा है। स्वतंत्र होने के बाद मूददों के बजाय धर्म और जाति में बटकर हम विकास का मार्ग स्वंय ही अवरूद्ध कर लिए है। फलस्वरूप स्वास्थ्य की समस्यांये आज विकराल रूप धारण कर हमें तथा हमारे बच्चो को ही निवाला बना रही है। हमे स्वतंत्र हुए साठ वर्ष से ज्यादा हुए पिछले बत्तीस वर्षों से लगातार पूर्वांचल के नौनिहाल जलजनित बीमारियों के कारण प्रतिदिन काल के गाल में समाते चले जा रहे है। जागरूकता का अभाव स्वास्थ्य सेवाओं तथा प्रशासनिक तंत्र में इच्छाशकित की भारी गिरावट के कारण आज इंसेफेलाइटिस ने 50 हजार से अधिक मासूम को निगल लिया। वैषिवक स्तर पर इतने ज्यादा मासूमों की मौत का शायद ही कोर्इ रिकार्ड है। पूर्वांचल में इंसेफेलाइटिस से पीडि़त मरीजों केे लिए सरकार की तरफ से जागरूकता के सभी दावे उस समय फेल हो गये। जब राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के समाने जन सुनवार्इ के समय प्रशासनिक अमले पर यह आरोप लगा कि जन सुनवार्इ में शिकायती लोगों को आने से रोक जा रहा है। इस सवाल के सफार्इ में पूरा का पूरा प्रशासनिक कुनबा मिलकर भी आयोग के अध्यक्षा कुशल सिंह को संतुष्ट नहीं कर पाया। गोरखपुर मण्डल में एनसीपीसीआर ने दो दिवसीय जनसुनवार्इ में पाया कि बीते 3 दशक में जो मौतें हुंर्इ उस पर दिल्ली हिल जानी चाहिए थी। एनसीपीसीआर की सदस्य डा0 वन्दना प्रसाद के अनुसार अबतक का जो भी प्रारूप इस बीमारी के संर्दभ में दृषिटगत हुआ है। उसमें गरीबों के लिए मामलों को सरल बनाने के बजाय भारी दिक्कतें पैदा की गयी है। सरकार तथा प्रशासन की व्यवस्था में स्थानीय स्तर पर जेर्इ और एर्इएस के लिए दवायें तथा इलाज सुलभ नहीं किये जा सके। सबको बी आर डी मेडिकल कालेज ही रेफर किया जाता है। सरकार के पास गांव स्तर पर जागरूकता व उनके अधिकारों के रक्षा के लिए दर्जन भर कर्मचारी तैनात है फिर भी जेर्इ और एर्इएस से मासूम प्रतिवर्ष मरने को मजबूर है। सरकारी तंत्र के साथ-साथ लोकतंत्रिक व्यवस्था में एक ग्राम सभा में लगभग दर्जन भर चयनित सदस्य व ग्राम प्रधान है। इन सब के होते हुए भी इंसेफेलाइटिस का उन्मूलन नहीं हो पा रहा।
एनसीपीसीआर के जन सुनवार्इ में गोरखपुर के स्वास्थ्य तंत्र की पोल खुलकर समाने आ गयी। राष्ट्रीय मुददा बनते बनते रह गयी इसेफेलाइटिस के विभीषका से बचने के लिए सुअरबाडों को रिहायसी क्षेत्रों से हटाना, स्वच्छ पेयजल की आपुर्ति, स्वच्छ शौचालय, शतप्रतिशत टीकाकरण जेर्इ और एर्इएस के उन्मूलन के लिए प्राथमिक है। सबसे अधिक प्रभाव उन परिवारों और बच्चों पर पड़ता है। जो इसे बीमारी के सम्पर्क में आने के बाद बच गये। सरकार के कागजी आकड़ो के मुताबिक लगभग 7 हजार बच्चे बीते वर्षों में शारीरिक व मानसिक रूप से विकलांग हो गये। पूर्वांचल के बस्ती,गोण्डा,आजमगढ़ और गोरखपुर मण्डल के गांव में जब मासूमों की चीत्कार से गांव का गांव सो नहीं पाता है। उस समय वह लोग जिन्हे जनता ने अपना नुमाइंदा बनाया है वे चुनाव के मुददे में इसेंफेलाइटिस को शामिल किया जाय या नहीं इस चर्चा में वातानुकुलित कमरे में निर्णय करते मिल जाते है। पिछले तीन दशक से इसेफेलाइटिस को लेकर सड़को पर जितना बाजार गर्म किया गया उतना यदि सरकार के दरवाजे पर यहां के जनप्रतिनिधि इंमानदार दस्तक दिये होते तो शायद हजारों मासूम आज उन्हे कम से कम एक बार अपना मत देकर संसद, विधान सभा तथा विधान परिषद भेज चुके होते।
वैषिवक स्तर पर इस बीमारी की पैदाइश 1877 में जापान में हुर्इ जापान से इस बीमारी ने चाइना का सफर किया और भारत में 1952 में प्रथम बार तमिलनाडु के बैल्लूर और महाराष्ट्र के चिंगिलपुर में रक्त परीक्षण के दौरान ज्ञात हुआ। जापान और चीन ने कुशल प्रबंधन व जागरूकता के दम पर इस बीमारी का उन्मूलन कर दिया। पूर्वांचल में इस बीमारी ने कुपोषित तथा गंदगी में रहने वाले गरीब परिवारों में अपना घर बना लिय है। बीमारी मुख्यत: 1 से 15 वर्ष आयु के बच्चों को शिकार बनाती है। पूर्वांचल में वर्ष 1978 में पहली बार इस महामारी का कहर बरपा। उस वर्ष 2386 मासूम संक्रमित हुए जिसमें 721 की मौत हो गयी। इसके बाद तो बीमारी ने क्रमश: वर्ष 1980,1985,1988,1989 में इस बीमारी ने कहर ढ़ा दिया। 1990 से वर्ष 2003 व 2004 तक संक्रमित मासूमों का औसत सामान्य रहा अचानक 2005 में पुन: इसेंफेलाइटिस ने मासूमों को बहुत तेजी से आगोश में लेना शुरू किया। क्रमश: 2005,06,07,08 में मृत शिशुओं की संख्या 1161, 435, 547, 514 हो गयी। इसी प्रकार 2010 में 516, 2011 में 626, 2012 में 521 तथा 2013 में अबतक मरने वालों की संख्या 500 का आकड़़ा पार कर चुकी है। सेफ सोसाइटी के मनोज कुमार  के मुताबिक जो भी आकड़े इसेंफेलाइटिस के सम्बंध में उपलब्ध है वह मात्र बीआरडी मेडिकल कालेज से प्राप्त है। अन्यत्र किसी पीएचसी अथवा अस्पताल में तो इस बीमारी का कोर्इ रिकार्ड दर्ज करना भी पाप समझा जाता है। वर्तमान अखिलेश सरकार को एनसीपीसीआर ने टीककरण तथा सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रो पर पूर्ण चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने के निर्देश दिये है। साथ ही बीमारी के बाद विकलांग हुए बच्चों को पुनर्वास तथा समान शिक्षा के लिए निर्देशित किया है। राष्ट्रीय स्तर पर बीमारी का संज्ञान लिए जाने के बाद लोगोें की उम्मीदें बढ़ गयी है। शायद अब सरकारें अपने कान की रूइ हटा दें और मासूमों का करूण क्रन्दन उन्हे इस बीमारी के उन्मूलन के तरफ आकृष्ट करें।

वैभव शर्मा

Vaibhav@vaidambh.in

 

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