इंसेफेलाइटिस: वातानुकूलित कमरे में गाल बजाना बंद हो

वर्षो से हम इंसेफेलाइटिस पर केवल गाल बजा रहे हैं। अब कुछ करने का समय है। पर करें क्या ? सभ्य समाज मे पढ़े लिखे लोगों को अगुआ माना जाता है। इन लोगो ने इससे प्रभावित होकर स्वएं को बुद्धिजीवी बताने का कर्इ प्रयास किया है। समाज मे ऐसे लोगो की संख्या कम है। अधिक भी हो जांय तो कोर्इ फर्क नहीं पड़ने वाला। फिलहाल इन्ही में से कुछलोगों ने इंसेफेलाइटिस पीडि़तों के लिए कुछ करने का बीड़ा उठाया। सम्भवत: इसी का संदर्भ ग्रहण करते हुए दीनदयाल उपाध्याय विश्वविधालय गोरखपुर के मनोविज्ञान विभाग ने राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया। विषय था -इंसेफेलाइटिस के उत्तरजीवी-विषय, चुनौतिया और मनोवैज्ञानिक हस्तक्षेप ।
23से 24 फरवरी तक चले इस कार्यशाला में इंसेफेलाइटिस पर काम कर रहे हर पढ़े-लिखे वर्ग को बुलाया गया। प्रथम दिन बालरोग विशेषज्ञ चिकित्सक तथा विश्वविधालय के विद्वान प्रवक्ता इस महामारी के तकनीकि पक्ष रखने के लिये आमंत्रित थे। दूसरे दिन का समय गैर सरकारी संगठन व मनोवैज्ञानिकों को दिया गया। उन्हे अपने अनुभव बाटकर एक दूसरे को सहयोग कैसे कर सकते हैं इस पर समन्वय बनाना था। प्रयास सराहनीय रहा लेकिन जो कुछ वहा देखा गया उससे यही समझ में आया कि बंद कमरे की नसीहत कभी कारगर नही हो सकती। हलांकि तमाम मतभेदयुक्त बेनतीजा वाले शोधपत्र, ब्याख्यान इंटरनेट की कृपा से बहुत बढि़या तरीके से वर्कशाप मे प्रस्तुत किए गए। वर्षों से निरन्तर अपनी जड़ जमाती बिमारिया पुर्वांचल मे चिकित्सकों की भग्यलक्ष्मी बनीं हुर्इ है। इतने गम्भीर मुददों पर खुली बहस के लिए कोर्इ तैयार नही।ं वहीं बंद कमरों में सभी अपना पक्ष इतनी सफार्इ से रखतें है कि जैसे लगता है कि दोष ब्यवस्था का नही बल्की पिडि़त का है। दो दिवसीय सेमिनार में जो चीजें कार्यक्रम के मुताबिक रहीं वह थी चाय व लंच। पूरे कार्यक्रम में विद्वजन इसी बात में लगे रहे कि मैने अच्छा काम किया है,मै सबसे अधिक जानता हू। अपनी श्रेष्ठता साबित करने के अहं मे मुख्य बिंदु से विद्वजन काफी दूर जाते दिखे। वर्कशाप में स्वश्रेष्ठता के प्रतिद्वंदियों की पोल उनके द्वारा प्रस्तुत वृत्तचित्र स्वत: खोल रहे थे। सबसे खेदजनक रहा कि जो छात्र वर्कशाप में कुछ पाने के लिए आए थे उन्हे कुछ भी प्राप्त नहीं हो पाया। ये भारत -निर्माण की सच्ची तस्वीर है। दो दिन का यह वर्कशाप देखने का मौका मुझे एक मित्र के माध्यम से मिला उन्हे बहुत-बहुत धन्यवाद। साथ ही मनोविज्ञान विभाग को बधार्इ जिसने सभी बुद्धिजीवियों को एक पटल पर लाने की कोशिश की। मुझे ब्यकितगत फायदा हुआ कि उनकी कृपा से बहुते जोगी मठठ उजाड़ का मतलब समझ मेें आ गया।
मित्रों किसी का इंतजार मत करो खुंद सावधान रहते हुए दूसरे को सावधान करो। ये खुद को जानकार बताने वाले बहुरुपिये अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने मे मासूमोें की जान का सौदा करते रहेंगे। सरकार के पास ग्रामीण स्तर पर जितने तंत्र हैं उनका बिमारी उन्मुलन में एक साथ प्रयोग करें तो बहुत बड़ी सफलता हाथ लग सकती है। बुनियादी स्तर पर काम करने वाले विभागों को सरकार पाबंद नहीं करती। शिकायतें होतीं रहें,कार्यवाही सिफर। यहा तो ऐसा लगता है कि बंद कमरों में पढ़े लिखों के बीच बजती ताली उधर गरीब के घर से आती मासूम की चित्कार के बीच कोर्इ गहरा सम्बंध है। बिमारी का हैवा बनाकर जनता को उलझाए रखना ताकि विकास के बारे मे सवाल न उठे। वरना आप सोचिए हर साल शौचालय गाव में बनाने का क्या औचित्य? सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र है पर चिकित्सक नहीं।आशा,एनम, सफार्इकर्मी,रोजगार सेवक फिर भी कोर्इ जागरुकता कार्यक्रम नहीं। एन जी ओ तभी गाव गोंद लेते हैं जब वह गाव अगले दो -तीन साल तक निर्धारित हो कि वहा इंसेफेलाइटिस नही होगी। ऐसी वाह-वाही पर शर्म नहीं आती । जागरुकता का मतलब है कि हम जिस समाज में रहतें हैं उसका हर तबका अपने दैनिक ब्यवस्था में पूरी तरह सचेत हाें। हमें हक चाहिए तो पूरी ताकत से लड़ना होगा,पहले खुद से फिर औरोें से। इंसेफेलाइटिस पीडि़तों के साथ घोर अन्याय जारी है। अब तक पुर्नवास केन्द्र स्थापित नही हो सका जबकिं पीडि़त चिनिहत व प्रमाणित हैं। कोर्इ पीडि़त की मदद के लिए उसके पास चलकर जाना नही चाहता लेकिन वातानुकूलित कक्ष में आंकड़ों का प्रदर्शन कर घडि़यालू आसू बहाते हुए फंण्ड और संवेदना पाने की कोशिश जारी रखता है। र्इश्वर सबको सदबुद्धि देें ।

धनञ्जय ब्रिज

9839437437

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