ईवीएम है, तो भी बैलेट जितना समय क्यों ?

आखिर क्यों लग रहा है चुनाव में ईवीएम के बाद भी बैलेट जितना समय ?

 New Delhi :  17वीं लोकसभा और चार विधानसभा के लिए सात चरण में चुनाव होने हैं। देश में होने वाले चुनावों में दूसरी बार इतना लम्बा समय चुनाव हागा। इसके पूर्व सन 1951-52 में देश का पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर से 21 फरवरी तक चार महीने चला था, उसके बाद इस बार 39 दिन तक अनवरत चलने वाला भारतीय लोकतंत्र का चुनावोत्सव,11 अप्रैल से 19 मई तक 39 दिन होना तय हुआ है। देश में सन 1999 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) का प्रयोग हुआ। ईवीएम चुनाव में लगनेवाले समयावधि को कम करने के उद्देश्य से किया गया था। पर विविधताओं के इस देश में फिर भी चुनावी समय का संतुलन नहीं बन पाया। प्रश्न स्वाभाविक है कि अतीत में जब देश में बैलेट पेपर पर चुनाव होते थे तब भी वही समय लगते थे जितना कि आज ईवीएम के आने के बाद भी लग रहे हैं। आखिर इतनी लंबी प्रक्रिया क्यों ? इस सवाल के जवाब का एक पक्ष यह हो सकता है कि देश में युवा मतदाताओं की बढ़ती तादाद । क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ी आबादी वाला लोकतांत्रिक देश है। सन 1951 में देश में 17.3 करोड़ मतदाता थे, 2019 में इनकी तादाद 90 करोड़ का आंकड़ा पार करने की उम्मीद है।

  66 फीसद् मतदान हो तो,59.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का करेंगे प्रयोग  !


2014 के आम चुनाव की तर्ज पर 66 फीसद् मतदान का अनुमान रखा जाए तो करीब 59.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। भारत का चुनाव आयोग दुनियाॅ की  सबसे बड़ी एजेंसी है जो इतने बड़े जनसमूह को नियंत्रित करते हुए चुनाव सम्पन्न कराती है। कश्मीर से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तक लाखों मतदान केंद्र स्थापित होते हैं। ऐसे में बुनियादी सुविधाएं और सुरक्षा इंतजाम मुहैया कराने के मोर्चे पर निर्वाचन आयोग के समक्ष काफी बड़ी चुनौती है। प्रत्येक चरण के बीच सात दिन का अंतराल है। यह प्रक्रिया छोटी हो सकती थी, यहाॅ प्रबंधन में समयावधि को लेकर चूक मानी जा सकती है। जहाॅ चुनाव सम्पन्न हो जायेंगे वहाॅ ईवीएम की रखवाली के लिए स्ट्रॉन्ग रूम पर सुरक्षा बलों की तैनाती का बोझ अतिरिक्त ब्यय है। चुनाव की तिथियों का ब्योरा हमारे देश में शासन के एक अन्य पहलू की ओर ध्यान आकृष्ट करता है। 80 लोकसभा सीटों वाले और 24 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले उत्तर प्रदेश के बारे में ठीक है कि उसके लिए सात चरण में चुनाव कराया जा रहा है। कुछ छोटे राज्यों के लिए कई चरण में चुनाव कराना समझ से परे है। यदि हम देखें तो 48 सीटों पर 30 लाख वर्ग किलोमीटर में फैले महाराष्ट्र में चार चरण में और 42 सीटों तथा 88 हजार वर्ग किमी में फैले पश्चिम बंगाल में सात चरण में चुनाव कराए जाने हैं। 40 सीटों और 94 हजार वर्ग किमी वाले बिहार, 14 सीट और 79 हजार वर्ग किमी वाले झारखंड और 29 सीटों तथा 30 लाख वर्ग किमी भू क्षेत्र वाले मध्य प्रदेश तथा ओडिशा (21 सीट, 15 लाख वर्ग किमी भूक्षेत्र) में भी चार चरण में मतदान कराया जा रहा है।

सांप्रदायिक तनाव, पार्टी कार्यकर्ताओं के आपसी द्वेष !


चुनाव प्रक्रिया का धीरे संचलन में राज्यों की कानून ब्यवस्था की स्थिति बहुत मायने रखती है। पश्चिम बंगाल और बिहार में राजनीतिक हिंसा का पुराना इतिहास चुनाव आयोग को सचेत करता है। जबकि पश्चिम बंगाल में कुछ वर्षो से पार्टी के कार्यकर्ताओं की हत्या और द्वेषपूर्ण राजनीतिक वातावरण पैदा हो जाने से हालात बेकाबू होने के खतरे को देखते हुए आयोग ने सतर्कता बरती है। आशंका है कि आगामी चुनाव शांतिपूर्ण होंगे भी या सांप्रदायिक तनाव, पार्टी कार्यकर्ताओं के द्वेष का शिकार होंगे। राजनीतिक पार्टी मुख्य दलों की ओर से ऐसे मौकों की प्रतिस्पर्धा को और हवा देनें में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जाती है। झारखंड, मध्य प्रदेश और ओडिशा में नक्सली अशांति, चुनाव आयोग के समक्ष सुरक्षा की एक अलग ही चुनौती पेश करती है। आज सोशल मीडिया का प्रोपेगण्डा कहीं भी दंगा प्लान कर सकता है ! न्यूज ऐसे परोसे जा रहे हैं कि जैसे युद्ध हो रहा हो। चुनाव में शाॅति व सुरक्षा के गारण्टी की बात राज्य या केन्द्र दोनों ही सरकारें करतीं हैं पर आम लोग यही मानते हैं कि ऐसा सम्भव नहीं है ! सरकारों के पास इस संकट का फिलहाल कोई हल नहीं दिख रहा। सन 2017 में आई एक फिल्म ‘न्यूटन‘ देखें यह काफी हद तक सच बयाॅ करती है। देश में अशांति का विस्तारित स्वरूप जम्मू-कश्मीर में देखने को मिलता है जहां छह लोकसभा सीट के लिए पांच चरण में मतदान होगा। हम स्पष्टतः कह सकते हैं कि इतनी लंबी निर्वाचन प्रक्रिया होने की अहम वजह है देश की कानून व्यवस्था की स्थिति !

  Dhananjay Shukla

Vaidambh Media

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