ई-मण्डी : अब बिना बाधा के, किसान मण्डी में बेंच सकेंगे अपना उत्पाद !

ई-मण्डी : जहाॅ मिले अच्छा मुल्य , वहाॅ बेचे अपना उत्पाद !

 New Delhi : देश के किसान लंबे समय से राज्यों की सीमा से परे कारोबार की राह तक रहे थे। गुरुवार को प्रधानमंत्री द्वारा उद्घाटित नई ई-मंडी इस दिशा में एक अहम कदम है।emandi बिना किसी बाधा वाले राष्ट्रीय कृषि बाजार की अवधारणा 2000 के दशक में पेश की गई थी। मकसद था किसानों को अपना उत्पाद ऐसी जगह बेचने की सुविधा देना जहां उन्हें अच्छा मूल्य मिले। इससे उनको स्थानीय मंडियों में चलने वाले गठजोड़ों से निजात तो मिलेगी ही साथ ही कारोबारी स्वतंत्रता भी। पहली राष्ट्रीय किसान नीति वर्ष 2007 में संप्रग सरकार ने पेश की थी। उसमें भी इस आवश्यकता पर बल दिया गया था। बहरहाल संपूर्ण कृषि विपणन सुधार को अंजाम देना अभी भी मुश्किल है। मौजूदा राजग सरकार ने वर्ष 2015-16 के बजट में ऐसे प्रावधान अवश्य किए कि राष्ट्रीय इलेक्ट्रॉनिक मंच पर थोक कारोबार करने वालों को आवश्यक बुनियादी ढांचा मिल जाए। फिलहाल कृषि विपणन का काम राज्य दर राज्य अलग-अलग है और राज्यों के भीतर भी। इसलिए कि थोक मंडी का संचालन उनकी अपनी कृषि उपज वितरण समितियां (एपीएमसी) करती हैं। इन मंडियों को अलग लाइसेंस की आवश्यकता होती है और उनका विपणन शुल्क अलग-अलग होता है। तकनीक का प्रयोग कम होने के कारण लेनेदेन में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है। इसका नुकसान किसानों को होता है।

585 प्रमुख बाजारों को मार्च 2018 तक ई-प्लेटफार्म से जोडऩे की योजना

ई-मण्डी से किसान को मिलेगा भरपूर लाभ : प्रधानमंत्री

नया एकीकृत इलेक्ट्रॉनिक मंच सीमित तरीके से शुरू हुआ है लेकिन फिर भी यह किसानों की तमाम समस्याओं को हल करेगा। देश के सभी 585 प्रमुख बाजारों को मार्च 2018 तक ई-प्लेटफार्म से जोडऩे की योजना है। agriculture-online-lead-5कर्नाटक ने पहले ही कृषि उपज के लिए राज्य स्तर पर बिना बाधा वाला बाजार स्थापित कर दिया है। इसकी वजह से वहां किसानों की पहुंच अधिक खरीदारों, खाद्य प्रसंस्करण उद्यमियों और खुदरा शृंंखलाओं तक है और उनको कीमत भी अच्छी मिल रही है। नया राष्ट्रव्यापी मंच मोटे तौर पर कर्नाटक मॉडल का अनुसरण करेगा। बहरहाल, इस मंच को आधिकारिक तौर पर राष्ट्रीय कृषि बाजार कहा जा रहा है लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं। यह मान लेना भी खतरनाक है कि राज्य स्तर पर सफल हो चुका एक मॉडल राष्ट्रीय स्तर पर भी स्वत: सफल साबित होगा। उसके लिए इसे अनेक शर्तो पर खरा उतरना होगा। तीन सबसे अहम बिंदु इस प्रकार हैं। समूचे क्षेत्र के लिए थोक कारोबार का एकल लाइसेंस, बाजार शुल्क की एकल व्यवस्था और मूल्य निर्धारण के लिए ई नीलामी की व्यवस्था। फिलहाल ऐसे बहुत कम गोदाम हैं जहां ई बिक्री के पहले माल का वजन करने, ग्रेडिंग करने और मानकीकरण की व्यवस्था है। इतना ही नहीं ऐसे पूल भी बनाने होंगे जहां निजी किसानों के छोटे बिक्री योग्य अधिशेष को इकठ्ठïा बड़े खरीदारों को बेचा जा सके ताकि उनको बढिय़ा मूल्य मिले। स्माल फार्मर्स एग्रीबिजनेस कंसोर्से (एसएफएसी) इस नए मंच को चलाने वाली प्रमुख संस्था है।

एकीकृत कृषि विपणन मंच के राजनीतिक मायने भी हैं।

यह मौजूदा या खास तौर पर बनी विशेष इकाइयों के जरिए काम कर सकती है।mm वास्तविक सुधारों को अंजाम देने के लिए कुछ अन्य काम करने होंगे मसलन: राज्यों के एपीएमसी अधिनियम में संशाधन कर उसे मॉडल एपीएमसी अधिनियम के अनुरूप बनाना। कई राज्यों ने अपने विपणन कानून बदल दिए हैं लेकिन कुछ ने इस मॉडल का पूरा अनुसरण किया है। आधे-अधूरे विपणन सुधारों के मूल में राज्यों की वह अनिच्छा है जिसके तहत वे एपीएमसी पर नियंत्रण नहीं छोडऩा चाहते। इससे न केवल उनको बढिय़ा राजस्व मिलता है बल्कि इसके राजनीतिक मायने भी हैं। यही वजह है कि कई राज्य इस नए एकीकृत कृषि विपणन मंच से भी दूर हैं। देश के अधिकांश थोक बाजार, जिनमें दिल्ली की आजादपुर और मुंबई की वाशी मंडी शामिल हैं, ने इस मंच को नहीं अपनाया है। केंद्र को अन्य राज्यों को भी इससे जोडऩे के उपाय करने होंगे, खासतौर पर पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य को इससे जोड़ा जाना चाहिए।

Vaidambh  Media

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