उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वाभाविक स्वागत !

 

राजनीतिक असहमति और आलोचना को साइबर अपराध करार देकर मनमानी गिरफ्तारियां महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में हुर्इं, जहां अलग-अलग दलों की सरकारें रही हैं। धारा 66 ए कायम रहती तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता। जब भी नागरिक अधिकारों को कुचलने के कदम उठाए गए हैं, न्यायपालिका ने नागरिकों का पक्ष लिया है। सर्वोच्च अदालत का ताजा फैसला इसी परिपाटी की ही एक कड़ी है।

        अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश नहीं

S.C. INDIA 

Bureau Office/New Delhi : आइटी अधिनियम की धारा 66 ए को निरस्त करने के उच्चतम न्यायालय के फैसले का स्वाभाविक ही चौतरफा स्वागत हुआ है। यह कानून इंटरनेट और सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश लगाने का जरिया बन गया था। ऐसे कई मामले सामने आए जब इस कानून के तहत मनमाने ढंग से गिरफ्तारी हुई। पर बात सिर्फ इतनी नहीं थी। अन्य कानूनों के भी बेजा इस्तेमाल के कुछ उदाहरण दिए जा सकते हैं। सर्वोच्च अदालत ने धारा 66 ए को असंवैधानिक ठहराया तो इसके दुरुपयोग के मामलों के अलावा यह बात भी थी कि यह धारा बहुत अस्पष्ट है, और इसी के चलते पुलिस को जहां असीमित अधिकार मिले हुए थे वहीं सोशल मीडिया पर आलोचना और असहमति का इजहार करने वालों को प्रताड़ित होने की आशंका बनी हुई थी। इस धारा का स्वरूप ही अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ था। आइटी अधिनियम वर्ष 2000 में बना। 2008 में इसमें बदलाव किए गए। धारा 66 ए उसी फेरबदल की देन थी। याद रहे, संशोधित कानून के मसविदे को संसद ने बिना बहस किए पारित कर दिया था।
2008 में बने आइटी अधिनियम के मुताबिक इंटरनेट या सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक और आहत करने वाली सामग्री डालना अपराध था। इस प्रावधान का नतीजा यह हुआ कि किसी भी बात को आहत पहुंचाने वाली बता कर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई जाने लगी। जो शिकायतें राजनीतिकों या रसूख वाले लोगों की तरफ से आर्इं उन पर पुलिस ने फौरन कथित ‘आरोपियों’ को गिरफ्तार किया। लेकिन सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि जो बात किसी को आपत्तिजनक या आक्रामक लग सकती है, वह किसी और को कहने लायक लग सकती है, उसे पसंद भी आ सकती है।

अभिव्यक्ति की आजादी का कोई अर्थ है !
अगर महज चिढ़ाने या आहत करने के आरोप में कार्रवाई की जाएगी, तो असहमति का इजहार करना असंभव हो जाएगा और फिर अभिव्यक्ति की आजादी का कोई अर्थ नहीं होगा। संविधान की धारा 19 (1) के तहत हर नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार हासिल है। सही है कि यह अधिकार असीमित नहीं है। संविधान ने धारा 19 (2) के तहत कुछ मर्यादाएं तय की हुई हैं। मसलन, राष्ट्रीय संप्रभुता पर आंच आने, कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा होने, समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करने की स्थितियों में संबंधित सामग्री को लेकर दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। ये मर्यादाएं ज्यों की त्यों लागू रहेंगी। इसी तरह मानहानि से संबंधित कानून पहले की ही तरह प्रभावी रहेगा। अगर किसी वेबसाइट को लेकर धारा 19 (2) के तहत तय की गई मर्यादाओं के उल्लंघन की शिकायत हो, तो उसे बंद करने का रास्ता भी सरकार के लिए खुला रहेगा। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने असहमति और आलोचना को साइबर अपराध का रंग देकर नागरिकों के खिलाफ पुलिस-कार्रवाई की गुंजाइश समाप्त कर दी है।

राजनीति में  आलोचना तो सहनी पड़ेगी,असहमति का इजहार व निन्दा से नेताओ  को परहेज क्यों ?
भाजपा ने धारा 66 ए की जमकर मुखालफत की थी। नरेंद्र मोदी भी इस धारा के खिलाफ काफी मुखर थे। यह दिलचस्प है कि सत्ता में आने के बाद भाजपा धारा 66 ए के बचाव में खड़ी हो गई। सर्वोच्च अदालत का फैसला मोदी सरकार की दलीलों को खारिज करते हुए ही आया है। इससे साफ हो जाता है कि अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर देश की दो सबसे बड़ी पार्टियों का नजरिया कैसा है। कई अन्य दलों का रुख भी इससे अलग नहीं रहा है। गौरतलब है कि राजनीतिक असहमति और आलोचना को साइबर अपराध करार देकर मनमानी गिरफ्तारियां महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में हुर्इं, जहां अलग-अलग दलों की सरकारें रही हैं। धारा 66 ए कायम रहती तो यह सिलसिला कभी खत्म नहीं होता।

                                                                                             Vaidambh.in

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