उत्तरोत्तर विकास में फलती – फूलती सामाजिक बुराई ‘दहेज’ !

married-woman-alleged-torture-by-husband-and-in-laws-for-dowry  विकास की आंधी में दहेज की विकरालता !

Gorakhpur :  देश में  तमाम सामाजिक बुराइयों का साथ हम विकास की झकाझूम आंधी में भी नहीं छोड़ रहे हैं, कुछ तो खासी वजह होगी ही । आइये , आज के दौर में जब जनता द्वारा पूर्ण बहुमत से केन्द्र में स्थापित सरकार सरप्राइज नोटबंदी कर देश को कइ तरह की बीमारी से मुक्ति दिलाने का जादु कर रही है तो हम भी कुछ बीमारीयों की पड़ताल कर पटल पर रखने का प्रयास करते हैं। नोट बंदी से सभी सामाजिक अराजकता के वाइरस को मार डालने वाले प्रधानमंत्री जी अब वक्त आ गया है कि देश में एक कानून और दूसरा कोई सब्सटीट्यूट नही होने की घोषणा कर डालिये ! चूके तो मौका हाथ से निकल जायेगा। अरे भाई मैं  तीन तलाक व दहेज ,बलात्कार पर अपनी अदालत लगा बैठे समाज के कोढ़ बन चुके खाप पंचायत और काजी अदालतों की बात कर रहा हू। जो आये दिन अपने फतवा व उल जूलूल सजा को सामाजिक मान्यता बनाने में सरकार की मूक सहमति से जिंदा हो तामसी अट्ठहास कर रहीं हैं। बेटी तभी पढ़ पायेगी और बचेगी जब उसे पढ़ने और बचे रहने का माहौल मिल पायेगा ! मुझे नहीं लगता कि खाप और काजी अदालतें इसे फलने फूलनें देंगी। कारण स्पश्ट है कि इन्हे हजारों साल पुराने नियम, जो नियत व काल पर बदल जाने चाहियें थे उसे जबरिया लागू करने में धर्म के सहयोग से भारी मदद मिलती है।
दहेज व मेहर कहां से और कैसे आई !

दहेज. प्रथा का उदभव कब और कहां हुआ ? यह कह पाना असंभव है । विश्व के विभिन्न सभ्यताओं में दहेज लेने और देने के पुख्ता प्रमाण मिलते हैं। इससे  स्पष्ट  है कि दहेज का इतिहास अत्यन्त प्राचीन है।  दहेज की वास्तविक परिभाषा ;  दहेज के अंतर्गत वे सारे सामग्रियां अथवा रकम आते हैं जो वर पक्ष को वधू पक्ष के माध्यम से विवाह के प्रक्रिया के दौरान अथवा विवाह के पश्चात प्राप्त होते हैं। इन वस्तुओं की मांग या तो वर पक्ष द्वारा वधू पक्ष से की जाती है अथवा वे स्वेच्छा से इसे प्रदान करते हैं।दहेज का अर्थ है जो सम्पत्ति, विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ से वर को दी जाती है।  दहेज को उर्दू में जहेज कहते हैं। यूरोप, भारत, अफ्रीका और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है। भारत में इसे दहेज, हुँडा या वर-दक्षिणा के नाम से भी जाना जाता है तथा वधू के परिवार द्वारा नकद या वस्तुओं के रूप में यह वर के परिवार को वधू के साथ दिया जाता है। आज के आधुनिक समय में भी दहेज प्रथा नाम की बुराई हर जगह फैली हुई हँ। पिछड़े भारतीय समाज में दहेज प्रथा अभी भी विकराल रूप में है!

भारत में यह  भयंकर बीमारी के रूप में सदियों से चलकर आज भी मौजूद है। देश का शायद ही ऐसा कोई भाग बचा हो जहां के लोग इस बीमारी से ग्रसित न हों। आए दिन दहेज लेने-देने के सैकड़ों मामले दिखाई देते हैं। जिन व्यकितयों की बेटियां होती हैं वे अल्प काल से ही दहेज के लिए रकम संग्रह में लीन हो जाते हैं। इस वजह से समाज का एक बड़ा तबका बेटियों को मनहूस समझता है और प्रतिवर्श देश में ही लाखों बेटियों को लिंग परीक्षण कर समय से पूर्व ही नष्ट कर दिया जाता है। विवाह के पश्चात लड़कियों को दहेज के लिए प्रताडित करने के सैकड़ों मामले हमारे समाज का हिस्सा बनती जा रही है। देश भर में दहेज के लोभी राक्षसों द्वारा जलाया जा रहा है, मारा  और प्रताडित किया जा रहा है।  दहेज लेना और देना तो कानूनन अपराध है , लेकिन साथ ही इससे संबंधित किसी प्रकार की शिकायत पर तुरंत कार्रवाई की जाती है। कदापि नहीं!

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े !

दहेज-दानव को रोकने के लिए सरकार द्वारा सख्त कानून बनाया गया है । इस कानून के अनुसार दहेज लेना और दहेज देना दोनों अपराध माने गए हैं । अपराध प्रमाणित होने पर सजा और जुर्माना दोनों भरना पड़ता है । यह कानून कालान्तर में संशोधित करके अधिक कठोर बना दिया गया है ।किन्तु ऐसा लगता है कि कहीं-न-कहीं कोई कमी इसमें अवश्य रह गई है. क्योंकि न तो दहेज लेने में कोई अंतर आया है और न नवयुवतियों द्वारा की जाने वाली आत्महत्याओं अथवा उनकी हत्याओं में ही कोई कमी आई है । दहेज संबंधी कानून से बचने के लिए दहेज लेने और दहेज देने के तरीके बदल गए हैं ।देश में औसतन हर एक घंटे में एक महिला दहेज संबंधी कारणों से मौत का शिकार होती है  वर्ष 2014 में 8455 मामले देश में यानि 4.6 प्रतिषत और वर्ष 2007 से 2011 के बीच इस प्रकार के मामलों में काफी वृद्धि देखी गई है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि विभिन्न राज्यों से वर्ष 2012 में दहेज हत्या के 8,233 मामले सामने आए। आंकड़ों का औसत बताता है कि प्रत्येक घंटे में एक महिला दहेज की बलि चढ़ रही है।

पूर्ण  इलाज नदारद : कानून हैं , पर अदालत में केस बढ़ाने के लिये !

dowry-1दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार दहेज लेने, देने या इसके लेन-देन में सहयोग करने पर 5 वर्ष की कैद और 15,000 रुपए के जुर्माने का प्रावधान है।
दहेज के लिए उत्पीड़न करने पर भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए जो कि पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा सम्पत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, के अन्तर्गत 3 साल की कैद और जुर्माना हो सकता है।
धारा 406 के अन्तर्गत लड़की के पति और ससुराल वालों के लिए 3 साल की कैद अथवा जुर्माना या दोनों, यदि वे लड़की के स्त्रीधन को उसे सौंपने से मना करते हैं।   यदि किसी लड़की की विवाह के सात साल के भीतर असामान्य परिस्थितियों में मौत होती है और यह साबित कर दिया जाता है कि मौत से पहले उसे दहेज के लिए प्रताड़ित किया जाता था, तो भारतीय दंड संहिता की धारा 304-बी के अन्तर्गत लड़की के पति और रिश्तेदारों को कम से कम सात वर्ष से लेकर आजीवन कारावास की सजा हो सकती है।

                                                                                                         बहू भरती रहे मायके से लाकर पति का घर !

dahej-prathaदहेज अब एक लिप्सा हो गई है, जो कभी शान्त नहीं होती । वर के लोभी माता-पिता यह चाह करते हैं कि लड़की अपने मायके वालों से सदा कुछ-न-कुछ लाती ही रहे और उनका घर भरती रहे । वे अपने लड़के को पैसा पैदा करने की मशीन समझते हैं और बेचारी बहू को मुरगी, जो रोज उन्हें सोने का अडा देती रहे । माता- पिता अपनी बेटी की मांग कब तक पूरी कर सकते हैं । फिर वे भी यह जानते हैं कि बेटी जो कुछ कर रही है, वह उनकी बेटी नहीं वरन् ससुराल वालों के दबाव के कारण कह रही है ।यदि फरमाइश पूरी न की गई तो हो सकता है कि उनकी लाड़ली बिटिया प्रताड़ित की जाए, उसे यातनाएं दी जाएं और यह भी असंभव नहीं है कि उसे जान से मार दिया जाए । वरपक्ष के लोग शादी से पहले ही  मोटी रकम कन्या पक्ष वालों से ऐंठ लेते हैं । जहां तक सामान की बात है जैसे- रंगीन टीवी, सोफा सेट, अलमारी, डायनिंग टेबल, घड़ी, अंगूठियां-ये सब चीजें वर पक्ष की शोभा बढ़ाने के लिए पहले ही  भेज दी जाती हैं , कहीं -कहीं रुतबा बढ़ाने के लिये अपने दरवाजे पर   शादी के समय दी जाती है । इसके अलावां अपब्यय भोज जिसमें ,  खा-पीकर, इधर -उधर गंदगी का अंबार लगा कर लोग चले जाते हैं ।

मनु से अब तक दहेज जिंदा क्यों ?

भारत में दहेज एक पुरानी प्रथा है । मनुस्मृति मे ऐसा उल्लेख आता है कि माता-कन्या के विवाह के समय दाय भाग के रूप में धन-सम्पत्ति,  गायें  आदि कन्या को देकर वर को समर्पित करे । यह भाग कितना होना चाहिए, इस बारे में मनु ने कोई सपष्ट उल्लेख नहीं किया । समय बीता, स्वेच्छा से कन्या को दिया जाने वाला धन  धीरे-धीरे वरपक्ष का अधिकार बनने लगा और वरपक्ष के लोग तो वर्तमान समय में इसे अपना जन्मसिद्ध अधिकार  मान बैठे हैं ।

दहेज का बाजार भाव !

विज्ञापन निकलते है कि लड़के या लडकी की योग्यता इस प्रकार हैं । उनकी मासिक आय इतनी है और उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत सम्माननीय है । ये सब बातें पढ़कर कन्यापक्ष का कोई व्यक्ति यदि वरपक्ष के यहा जाता है तो असली चेहरा सामने आता है । वरपक्ष के लोग घुमा-फिराकर ऐसी कहानी शुरू करते हैं जिसका आशय निश्चित रूप से दहेज होता है  दहेज मांगना और देना  दोनों निन्दनीय कार्य हैं ।   जब वर और कन्या दोनों की शिक्षा-दीक्षा एक जैसी है,   दोनों रोजगार में लगे हुए हैं, दोनों ही देखने-सुनने में सुन्दर हैं, तो फिर दहेज की मांग क्यों की जाती है ?   कन्यापक्ष की मजबूरी का नाजायज फायदा क्यों उठाया जाता है ?   शायद  योग्य लड़के बड़ी मुश्किल से तलाशने पर मिलते हैं ।

दूल्हन ही दहेज है !

हमारे देश में ऐसी कुछ जातियां  हैं जो वर को नहीं, अपितु कन्या को दहेज देकर ब्याह कर लेते हैं लेकिन ऐसा कम ही होता है । अब तो ज्यादातर जाति वर के लिए ही दहेज लेती हैं ।

    Dhananjay

 Vaidambh Media

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