कन्या भू्रण हत्या के परिणाम

भारत में महिला पुरूष अनुपात में आ रहा अन्तर इस बात का द्योतक है कि बालिका बचाओ का शोर, तमाम बडे चेहरों का प्रयास, स्वैच्छिक संगठनो की पहल सब कुछ बेकार हो चुका है। इन सबके बीच सरकार का एक बडा प्रयास प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण एवं कन्या भू्रण हत्या प्रतिरोध अधिनियम से कुछ आस जगी भी थी लेकिन अल्ट्रा साउण्ड केन्द्रों के कूडेदानों, अस्पतालों, नदियों में भारी संख्या में कन्या भू्रण मिलना इस तरफ इशारा करता है कि इस कार्य में कन्या को जन्म देने वाली मां से लेकर, सास, ससुर, पिता, डाक्टर का एक बडा खेमा इसमें जुटा हुआ है की परिवार में लडकी जन्म न लेने पाये।
क्यो हो रही है कन्या भू्रण हत्याः-
सवाल यह उठता है कि लडका-लडकी में यह अन्तर शुरू क्यों हुआ और जन्म से पहले ही उन मासूम बच्चियों को गर्भ में ही समाप्त क्यो किया जाने लगा। शायद जवाब हम सब के पास है और इसके दोषी भी हम ही है। सदियों से महिलाओं पर पुरूषों का वर्चस्व रहा है और घर में जन्म लेते ही बेटी को अभिशाप मानने की प्रथा बेटी को दूसरे का धन मानने और दहेज प्रथा से हुई। कन्याभू्रणहत्या का एक काला सच इसमें छिपा है। वह है दहेज प्रथा, आज एक लडकी की शादी में अमूमन 2 लाख रूपये से अधिक खर्च आ रहा है जिसे हम एकदम निम्न श्रेणी का किफायती विवाह कह सकते है। क्या एक साधारण सामान्य व्यक्ति इसको उठाने की हिम्मत जुटा सकता है। जिसकी आमदनी 6 से 10 हजार रूपये हो ऐसा व्यक्ति क्या खायेगा, क्या पहले कैसे अपने परिवार को चलायेगा। यह सोचना तो उसका काम है ही साथ ही उसे लडकी को उच्च शिक्षा दिलाना उसकी जरूरते भी पूरा करना साथ ही उसके शादी के लिए धन की व्यवस्था करना।
कन्या भू्रण समापन की शुरूआत बस इसी कारण से हुई जो सिर्फ धन से जुडा है। आज के दिन जो कन्या पैदा होगी उसका विवाद यदि औसत में 30 वर्ष की उम्र में करेगें तो दहेज की क्या हालत होगी। एक अन्दाज के मुताबिक यह रकम 40 लाख से 60 लाख रूपये के आस-पास होनी चाहिए। क्योंकि जिस तरह से मंहगाई बढ रही है उससे तो यही स्थिति बनती है। मां-बाप आज के समय में झंझट पालन कतई नही चाहता। मां बाप जानते है कि लडकी पैदा करना सिवाय नुकसान के कोई फायदा नही है। यह विषय ही हानि और लाभ के गणित पर आधारित है। जिसमें सिर्फ निजी स्वार्थ जुडा हुआ है। ज्यादातर माता-पिता का सोचना है कि लडकियों की सुरक्षा करना भी एक अहम भरा काम है पता नहीं कब किसकी बुरी नजर लगे, कुछ भी शारीरिक अथवा यौन उत्पीडन हो सकता है फिर लडका ढूढियें शादी करिये। इसके लिए अनावश्यक भाग दौड लडके व योग्य वर ढूंढने की शरीर और मन तोड़ देने वाली भारी कवायदें भागदौड तब तक जब तक कि लडका मिल न जाय। जलालत से भरे लडके वाले लोगों का व्यवहार इन सबको देखकर लोगों ने यह सोचना शुरू कर दिया कि लडकी न पैदा करते तो बहुत अच्छा था। इसी अपराध बोध से कन्या भू्रण हत्या मे बेतहाशा वृद्धि हुई है लेकिन इस का दूरगामी परिणाम किसी ने नही सोचा। लोगो का यही नजरिया ऐसे जघन्य अपराध को जन्म दिया है।
कन्या भू्रण हत्या की स्थितिः-
सबसे ज्यादा कटु सत्य यह है कि अगर इसी तरह हम समस्याओं से घबराकर हम बेटियों को गर्भ में ही मारते रहे तो प्रकृति का सन्तुलन एकदम से बिगड जायेगा। शायद कन्या भू्रण हत्या ही यह कारण रहा है कि समलैगिंग सम्बन्धों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सत्तर के दशक में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान चिकित्सालय के डाक्टरों का जनसंख्या को रोकने के लिये बेटियों की गर्भ में हत्या करने की सलाह बेटियों के लिए अभिशाप बन गयी। जिसके परिणाम स्वरूप पिछले 20 सालों में कम से कम सवा करोड़ बच्चियों की भू्रण हत्या की गयी है। सन् 2011 1000 लडकों पर सिर्फ 914 लडकियां रह गयी है। जबकि यह अनुपात सन् 2001 मंे 1000 लडकों पर 943 लडकियों का था। तेजी से गिरता हुआ यह अनुपात चिंता का विषय है। इस समय स्त्रियों की कमी का प्रमुख कारण भू्रण हत्या ही है। इस समय सन् 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या 1210, 193, 422 है जिसमें 623724248 पुरूष और 586469174 महिलायें है। इस आंकडे को देखते हुए 1000 पुरूषों पर मात्र 940 महिलाओं का औसत आता है। अगर यही स्थिति भारत के राज्यों के सन्दर्भ में देखा जाय तो सबसे अच्छी स्थिति केरल राज्य की है यहां पर प्रति 1 हजाार पुरूषो पर 2001 में 1058 में महिलायें थी जोकि 2011 की जनगणना में बढकर 1084 महिलायें थी जोकि 2011 की जनगणना में बढकर 1084 हो गयी इसी दूसरे नम्बर पर तमिलनाडु है यहा ंप्रति 1 हजार पुरूष 995 महिलायें व तीसरे नम्बर आन्ध्र प्रदेश में 992 महिलायें है। कमोबेस यह आंकडे भी आधी आबादी के सपने को झूठा साबित करते है। सिवाय केरल को छोडकर।
अगर 2011 के जनगणना आंकडो को देखा जाय तो हरियाणा राज्य में बालिकाओं की संख्या पूरे देश में सबसे कम है। यहां पर प्रति हजार पुरूषों पर मात्र 877 महिलायें ही है। इसी प्रकार जम्मू और कश्मीर में 883 महिलायें व सिक्किम में 889 महिलाये है।
देश में महिलाओं की संख्या का घटता यह आंकडा प्रकृति की देन नही बल्कि मनुष्य द्वारा ही पैदा की गयी है। लिंग चयन प्रतिषेध अधिनियम 1994 को इसीलिए लागू किया गया कि बेटे की चाहत में मां बाप व डाक्टरों द्वारा संयुक्त रूप से किये जा रहे इस जघन्य अपराध पर रोक लगायी जाय लेकिन शासन प्रशासन के नाक तले कन्या भू्रण हत्या का यह धन्धा तेजी से फल-फूल रहा है और सरकारें खुद ही अपने हाथों अपना पीठ थपथपाती है कि उनके यह कन्या भू्रण हत्या नहीं रही है।
अरे भई जब कन्या भू्रण हत्या नही हो हो रही है तो यह महिला पुरूष अनुपात में भारी अन्तर कहां से आ गया है।
जनसंख्या की दृष्टि से देश का सबसे बडा राज्य उत्तर प्रदेश है। यहां पर गैर कानूनी रूप से ढेर सारे अल्ट्रासाउण्ड सेन्टर और क्लीनिक कन्या भू्रण हत्या में लिप्त है और कन्या भू्रण हत्या पर रोक लगाने की जिम्मेदारी बाल विभाग व लोग आख्ंा मूद कर सो रहे है। या तो ऐसे लेागों की ये गैर कानूनी काम करेन वाले जेबे नोटो से भर देते है। या खुद ये लोग कन्या भू्रण हत्या को बढावा देना चाहते है।
उ0प्र0 में सन् 2001 में प्रति हजार पुरूषों पर मात्र 898 महिलायें थी जो 2011 की जनगणना में बढकर 908 हो गयी। यह बढोत्तरी मात्र 1.11 प्रतिशत है। जो नाममात्र है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश की अपेक्षा पूर्वी उत्तर प्रदेश में महिला पुरूष का अनुपात ठीक है। चन्दौली जिले में 975 बलरामपुर में 967 व सन्तकबीरनगर में 940 बालिकायें है सबसे निचले क्रम पर आगरा 834 बागपत 836 व बुलन्दशहर 843 इन आंकडो पर अगर गौर किया जाय तो जो संख्या बराबर होगी चाहिए थी उसमें इतना भारी अन्तर पूरे समाज के लिए शर्मिन्दगी का विषय है।
इसके लिए कौन जिम्मेदारः-
कन्या भू्रण हत्या यानी लडकी को जन्म लेने से पहले ही मां के गर्भ में खत्म कर देना। उस लडकी जो एक मां, पत्नी, बहन, दादी, नानी, बूआ, मौसी, चाची इत्यादि रूपों में देखी जाती है। हर परिवार यही चाहता है कि उसके घर लडका जन्म ले न कि लडकी। वह स्वयं यह नही सोचती कि लडके को जन्म देेने के लिए लडकी का होना उसी तरह आवश्यक है जैसे सांस लेने के लिए आक्सीजन। फिर यह भेदभाव क्यो? लडकी जन्म लेने पाये इसके लिए अल्ट्रासाउण्ड करा करके उनकी लिंग जांच करायी जाती है चूंकि सरकार द्वारा लिंग जांच करने पर रोक लगा दी गयी है। फिर भी इस काम गैर कानूनी रूप से कई डाक्टर और अल्ट्रासाण्उड केन्द्र लगे हुए है। जिसके लिए ये लोग भारी-भरकम राशि लेकर नन्ही सी जान को गर्भ में खत्म कर देते है। जिसका घातक परिणाम मां को शारीरिक व मानसिक दोनों रूपों में सहना पडता है लेकिन वहीं मां कभी स्वयं की इच्छा, कभी पारिवारिक दबाव के चलते इस काम को अंजाम देती है। कुछ एक मामलों को छोड दिया जाये तो कन्या भू्रण हत्या के व्यवसासय में लिप्त लोग पुलिस और कानून की पकड में कम ही आ पाते है।
कन्या भू्रण हत्या के परिणामः-
कन्या भू्रण हत्या की अगर यही स्थिति रही तो आने वाले भविष्य में सबसे खतरनाक परिणाम महिला पुरूष के बीच के शारीरिक सम्बन्धों पर पडेगा जब महिलाओं की संख्या पुरूषों की अपेक्षा कम होगी तो पुरूष अपनी यौन इच्छाओं की तृप्ति के लिए समलैंगिग सम्बन्धों पर जो देगा। इसके अलावा महिलाओं के साथ बलात्कार, छींटाकशी, उत्पीडन, आदि की घटनाओं में भी इजाफा होगा, ऊपर दर्शाये गये आंकडो से यह साफ जाहिर है कि यह स्थिति आने ही वाली है। सामूहिक दुराचार, बहुपति प्रथा, इन सबको बढावा मिलने के साथ-साथ अपराध में भी बढोत्तरी होनी तय है।
जिस तरह उदाहरण दिये जाते है कि महिला पुरूष एक रथ रूपी परिवार के दो पहिया होते है और इन्ही से परिवार का सफल संचालन होता है। यह संख्या पारिवारिक सम्बन्धों के मायने भी खत्म कर सकती। दस पुरूषों के एक परिवार में एक महिला होना मतलब शोषण। इससे बचने का सिर्फ एक ही उपाय है जैसे हम लडके को महत्व देते है। उससे ज्यादा लडकी को महत्व दें।
ऐसे बढेगी महिलाओं की संख्याः-
देश में लगातार लडकियों की घटती संख्या को रोकने के लिए भारत सरकार ने लिंग चयन प्रतिषेध कानून बनाया। जिसका उद्देश्य प्रसव पूर्व निदान तकनीकी के अन्तर्गत लिंग जांच पूर्णतया निषिद्ध है। इस कानून के क्रियान्वयन की सारी जिम्मेदारी राज्यों की है।
अब बात आती है कि कानून बनने 18 वर्षो बाद जहां लडकियों की संख्या बढनी थी वह तेजी से घटी है। इसका मतलब सीधा है। जिला स्तर पर जिलाधिकारी की अध्यक्षता वाली कमेटी अपना काम सही से नही कर रही है। इस कमेटी द्वारा अल्ट्रासाउण्ड केन्द्रों की जांच तक नही की जाती है तो इन केन्द्रों पर कन्या भू्रण समापन का खेल तो खेला ही जायेगा।
कन्या भू्रण समापन करने वाले माता-पिता व उनके रिश्तेदारों की इस जुर्म के लिए मात्र 3 साल की जेल और 50000 का जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया। वही डाक्टरों को तो इस जुर्म में और छूट दी गयी है।
इस मामले में बस्ती जनपद के श्री कृष्ण चैरीटेबुल ट्रस्ट के अध्यक्ष एवं समाजसेवी बसन्त चैधरी का कहना है जब व्यक्ति किसी की हत्या कर देता है तो उस पर धारा 302 लगायी जाती है। कन्या भू्रण हत्या में हत्या शब्द तो जोड दिया गया लेकिन इसके लिए धारा 302 के तहत सजा का प्रावधान नही किया गया है। जरूरत है कि पुनः कानून में संशोधन करके दोषी व्यक्तियों को हत्या के जुर्म मे जेल भेजा जाय तभी कन्या भू्रण हत्या में कमी आयेगा।
अतः जरूरत है कि कानून में किये गये सभी प्रावधानों को कडाई से लागू किया जाय तभी महिला पुरूष अनुपात बढेगा।
बात सिर्फ कानून के कडाई से लागू करने से भी नहीं बनेगी इसके लिए सबसे पहले सामाजिक सोच बदलने की है। अगर लोग लडकियों को भार समझना बन्द कर दे तो महिलाओं को दोयम स्थिति से निकालकर बराबरी का दर्जा दिया जा सकता है।
इस मुद्दे पर फ्यूचर आॅफ इण्डिया नाम के सामाजिक संगठन से मजहर आजाद अगर महिलाओं की संख्या में बढोत्तरी करनी है और उन्हे बराबरी का दर्जा दिलाना है तो सबसे पहले दहेज प्रथा को खत्म करना होगा। इसके लिए सबके लिए बराबर कानूनी कार्यवाही हो क्योकि कन्या भू्रण समापन सिर्फ पैसे से जुडा मामला है। जो जिम्मेदार अफसर या सरकार है वह स्वयं लाखों करोड रूपये दहेज लेते है तो कार्यवाही कहां से होगी इसलिए कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप करके पहले सरकार से जुडे लेागो व अधिकारियों पर दहेज लेने पर रोक लगाना होगा। फिर स्वयं ये लोग सामाजिक दहेज रोक में आगे आयेगा।

(वृहस्पति कुमार पाण्डेय)

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