कानूनी प्राविधानों की सजग रिर्पोटिंग से मीडिया ला सकती है बड़ा बदलाव !

बच्चों के अधिकार संरक्षण पर कानूनी परिचर्चा
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Gorakhpur : रेलवे स्टेशन गोरखपुंर के प्लेटफार्म पर परिजनों से विछुड़े -भटके हुए बेसहारा बच्चों के साथ काम करने वाली संस्था सेफ सोसाइटी व जर्नलिस्ट प्रेसक्लब गोरखपुर के संयुक्त प्रयास से मीडिया के मध्य बाल अधिकार कानून तथा उसका पालन व जिम्मेदार लोंगों की स्थिति पर एक खुली बहस का आयोजन नगर के एक स्थानीय प्रतिष्ठान में किया गया। इस अवसर पर कानूनविद् प्रोफेसर ओंकारनाथ त्रिपाठी ने कहा कि कानून बना देने से किसी समस्या का समाधान नहीं हो जाता। समस्या है इसलिये कानून भी जरुरी है। मीडिया में जो प्रकाशन हो रहा हेाता है उससे हम ये जान पाते हैं कि समाज आज और अब कहाॅ पहुंचा है। मीडिया की भूमिका सर्वत्र और सदैव महत्वपूर्ण रही है आगे भी रखनी होगी, अतएव सतर्क समझदारी व जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए समाज की छवि प्रस्तुत करना है। बच्चों के सम्बंध में लगभग 250 कानून है जो उन्हं सुरक्षा प्रदान करतें हैं। मीडिया को देखना होगा कि ये कानून , जिम्मेंदार एजेंसियों द्वारा वास्तविक धरातल पर किस तरह और कितना क्रियान्वित हो रहे हैं। कानूनी प्रविधानों की जानकारी रखते हुए की गई सजग रिर्पोटिंग से मीडिया बहुत बड़ा बदलाव ला सकती है।

 

इससे पूर्व कार्यक्रम का प्रारम्भ सेफ सोसाइटी के समन्वयक ब्रजेश चतुर्वेदी ने परिचय सत्र में बताया कि गोरखपुर रेलवे स्टेशन प्लेटफार्म पर अपने परिवार से भूले -भटके बच्चों की यथा सम्भव मदद संस्था कर रही है। इस क्र्म में तीन वर्षों से अनवरत बच्चों के हितार्थ काम करते हुए उन्होने अपने अनुभव मीडिया के साथ साझाा किये। उन्होने बताया कि अभिभावक का ब्यवहार अपने बच्चों के प्रति नाकारात्मक होने की वजह से घर से भागने वाले बच्चों की संख्या बढ़ रही है। ये भटकते बच्चे भीख मांगने से लेकर आतंकी बनने तक का सामथ्र्य रखते हैं। पलायन करने वाले बच्चों में 81 प्रतिशत शिक्षित पाये गये हैं। इस वर्ष घर से पलायन करने वालों में 62 प्रतिशत बच्चे गोरखपुर परिक्षेत्र से हैं। इन पलायन करनेवाले बच्चों में टृैफिकिंग के मामले भी गोरखपुर प्लेटफार्म से सेफ सोसाइटी ने लगभग 27 फिसद् को एण्टी ह्यूमन टृैफिंिकग टीम को सौंपा ।

कार्यक्रम में प्रतिभाग करते हुए गोरखपुर जर्नलिस्ट प्रेसक्लब के अध्यक्ष मारकण्डेय मणि ने कहा कि बचपन को जीवंत करने वाली आधारभूत संस्थाओं को ब6चाना जरुरी है। कानून की बृहद् जानकारी मीडिया को होनी चाहिए जिससे उसकी बारीकियों को समझते हुए समाचार का प्रकाशन व संकलन किया जाय। यह कार्यक्रम मीडिया के लिये भी बहुत प्रभावी है। विमर्श के ओपेन सेशन में समाजसेवी विश्वविजय सिंह ने सवाल उठाया कि बच्चों के लिये सबसे सुरक्षित स्थान घर है, बच्चों के लिये सबसे अधिक विश्वसनीय उसके माॅ बाप होते हैं । फिर बच्चे की सुरक्षा कहां है ? कानून क्या कर सकता है ? इस पर कानून के जानकार बार एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष रत्नाकर सिंह ने कहा कि कानून का भय लोकसेवक पैदा करते हैं। अपराधी व बाल संरक्षा के जिम्मेदारों को कानून का भय होना चाहिए, और यह कलम के सिपाही बखूबी कर सकते है। बहुत से सरकारी ईकाइ्र गठित हैं पर उनका वास्तविक कृत्य आरामफरामोशी हो गया है जिसपर लगाम मीडिया बखूबी लगा सकती है। समाज को कानूनी जानकारी जितनी बृहद हो तो क्रियान्वयन आसान हो जाता है।

 

वरिष्ठ पत्रकार रितेश मिश्रा ने कहा कि बच्चों के मामले प्रत्येक ब्यक्ति व परिवार से जुड़ा बहुत नाजुक मामला है। कानून की जानकारी , टूटता समाज, समाप्त होती आधारभूत सुविधायें जैसे समाप्त होते खेल के मैदान बढती आधुनिकता , विडियो गेम्स,अनेक प्रकार का अभिभावक पर बढता दबाव बच्चों के पलायन की जड़ में है। इसी क्रम में बच्चों के तस्करी मामले मेें एक जानकारी जोड़ते हुए 1924 का जिक्र वयोबृद्ध पत्रकार श्यामानन्द श्रीवास्तव ने बताया कि बिहार व पश्चिम चम्पारण से बाल मजदूर पलायन रोकने के लिये नारायणी पर बने एक पुल को तोड़ दिया गया। पत्रकार अरुण कुमार मुन्ना नें पत्रकार को बच्चों के अधिकार के मुताबिक रिर्पोटिंग की बारीकियों को समझने के लिये कई महत्वपूर्ण सवाल रखे। इस दौरान राजनीति व पत्रकारिता से जुड़े आलोक शुक्ल ने भी महत्वपूर्ण प्रश्न परिवार व बच्चों के सुरक्षा तथा कानून के सम्बंध में उठाये।
ओपेन डिस्कस के बाद कानूनविद् ओं7कार नाथ त्रिपाठी ने मुद्दों को समावेशित कर सहमतिपूर्ण हल सार्वजनिक राय से लेते हुए कहा कि बच्चा सबके लिये रहस्य हैं। कानून में बच्चे की कोइ्र निश्चित परिभाषा नर्हीं । 50 संस्थाये बच्चों की सुरक्षा के लिये है और काम भी कर रहीं हैं। यह कानून ही बच्चों को जब दो भाग में बाॅटता है तो एक सुरक्षा पाने वाला हो जाता है दूसरा बाल अपराधी कहा जाने वाला। कमियाॅ बहुत हैं, पर सिमित संसाधन में उचित कार्यवाही के लिये कानून को जन-जन तक पहुंचाना होगा। गाॅव मे बच्चों के सुरक्षा कमेटी की निगरानी स्थानीय मीडिया करने लगे और जिले तक क्र्रमवार रिर्पोटिंग हो तो तंत्र व एजेंसियां दौड़ना शुरु कर दें। अंततः धन्यवाद प्रस्ताव के साथ इस सहमति पर मिडिया विमर्श सत्र का समापन हुआ कि बच्चों के अधिकार ,ब्यवहार व जिम्मेदारों व उनके बच्चों से ब्यवहार, कृत्य पर मीडिया सजग नजर रखने का प्रयास करती रहेगी।  परिचर्चा में दिपक पाण्डेय, माहेश्वर मिश्र, अनिल कुमार गुप्ता, अंगद प्रजापति,दिनेश पाण्डेय, मनोज श्रीवास्तव, अब्दुल जदीद, गौरव,अविनाश, रंजीत निषाद सहित कई गणमान्य उपस्थित रहे।

Vaidambh Media Report (VMR)

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