कावेरी जल विवाद ! पानी के लिये बह रहा खून ?

kaveri फसलों का रकबा बढ़ने से टूटा 50 साल के लिये चलने वाला करार ! 

बढ़ती मांग के अनुरूप  नहीं हो सका पानी का संग्रहण

New Delhi :  कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी जल बंटवारे को लेकर हो रहे संघर्ष के चलते दोनों राज्यों में हिंसा भड़क गई है। इससे पता चलता है कि ऐसे मसलों का निदान तलाश कर पाने में हमारे नीति निर्माता किस कदर विफल रहे हैं। मौजूदा संकट की जड़ें राज्यों द्वारा ब्रिटिश युग से चली आ रही मध्यस्थता और अनगिनत न्याय निर्णयों के नकार में निहित हैं। सन 1924 में यह मसला हल होने के करीब पहुंच गया था जब तत्कालीन मैसूर और मद्रास राज्यों ने मौजूदा कर्नाटक में कन्नमबडी गांव में एक बांध बनाने में सफलता पाई थी। यह बांध इसलिए बनाया गया था ताकि आपातकालीन जरूरतों को पूरा किया जा सके। यह समझौता 50 साल तक चलना था लेकिन फसलों का रकबा बढऩे के कारण पानी की आवश्यकता भी लगातार बढऩे लगी और दिक्कतें शुरू हो गईं। बुरी बात यह है कि पानी की कम खपत वाली मोटे अनाज की फसल की जगह खूब पानी सोखने वाली धान और गन्ने जैसी फसल उगानी शुरू कर दी गई। नतीजा यह हुआ कि हरंगी, हेमवती और कबिनी जैसे तीन और बांध इस इलाके में बना दिए गए। वर्ष 1924 में बना कृष्णा राजा सागर बांध तो यहां पहले से ही था। इन सबके बावजूद बढ़ती मांग के अनुरूप पानी का संग्रहण नहीं किया जा रहा। खासतौर पर कम बारिश वाले दिनों में।निश्चित तौर पर ताजातरीन विवाद मॉनसून की अनिश्चितता से उपजा है। इस वर्ष कुलमिलाकर सामान्य मॉनसून की बात कही जा रही है लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर बारिश के स्तर में असमानता है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक और तमिलनाडु के जलाशयों में क्रमश: 30 प्रतिशत और 49 प्रतिशत जल की कमी है। कर्नाटक और तमिलनाडु में कावेरी नदी के जल धारण क्षेत्र में प्रमुख जलाशयों में पानी का स्तर 10 वर्ष के औसत के मुकाबले 46 फीसदी कम है। वर्ष 2015 की तुलना में यह 30 प्रतिशत कम है। कुछ विशेषज्ञों के मुताबिक बारिश की मात्रा के अलावा वर्षा जल का बह जाना भी इस जल संकट की एक प्रमुख वजह है।

सरकार को फसल बुआई का तरीका जल की उपलब्धता के मुताबिक तय करना चाहिए ।

मौसम की अनिश्चितता तो पहले से समस्या थी, निर्णय प्रक्रिया की ढिलाई ने हालात और खराब कर दिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के शुरुआती निर्णय और उसकी समीक्षा ने हिंसा को बढ़ावा ही दिया है। संशोधित आदेश के मुताबिक अदालत ने कर्नाटक को कहा है कि वह 20 सितंबर तक हर रोज 12,000 क्यूसेक पानी तमिलनाडु में छोड़े। सर्वोच्च अदालत ने केवल एक अंतरिम आदेश दिया है। वर्ष 1995, 2002 और 2012 के जल संकट के वक्त भी उसने ऐसा ही किया था। मामले का अंतिम निपटारा हर बार कावेरी पर्यवेक्षक समिति के हाथों में छोड़ दिया गया। समय पर हस्तक्षेप करना तो दूर, समिति तो कावेरी जल धारण क्षेत्र में लगातार तीसरे साल सामान्य से कम बारिश होने पर भी आसन्न विवाद का अनुमान नहीं लगा सकी। दुखद बात यह है कि सोमवार को दिल्ली में हुई बैठक में भी समिति कोई तात्कालिक हल तक नहीं निकाल सकी। अब यह मामला अगले सप्ताह तक टल गया। यह प्रशासनिक व्यवस्था पर अभियोग सदृश ही है कि संकट को हल करने का सर्वश्रेष्ठ समय अब दक्षिण पश्चिम मॉनसून में सुधार या पूर्वोत्तर मॉनसून के आगमन में निहित रह गया है। ये मॉनसून प्राय: तमिलनाडु में प्रचुर बारिश लेकर आते हैं। तो क्या किया जा सकता है? एक तो यह कि सरकार को फसल बुआई का तरीका जल की उपलब्धता के मुताबिक तय करना चाहिए। दूसरा, चूंकि यह समस्या बारिश की मात्रा से संबंधित है तो कावेरी पंचाट के 2007 के निर्णय की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि हर राज्य का हिस्सा वर्षा जल को ध्यान में रखकर तय करने का फॉर्मूला निकल सके।

कावेरी विवाद है क्या ?

  •   विवाद कावेरी नदी के पानी को लेकर है जिसका उद्गम स्थल कर्नाटक के कोडागु जिले में है. लगभग साढ़े सात सौ किलोमीटर लंबी ये नदी कुशालनगर, मैसूर, श्रीरंगापटना, त्रिरुचिरापल्ली, तंजावुर और मइलादुथुरई जैसे शहरों से गुजरती हुई तमिलनाडु में बंगाल की खाड़ी में गिरती है.  इसके बेसिन में कर्नाटक का 32 हजार वर्ग किलोमीटर और तमिलनाडु का 44 हजार वर्ग किलोमीटर का इलाका शामिल है. कर्नाटक और तमिलनाडु, दोनों ही राज्यों का कहना है कि उन्हें सिंचाई के लिए पानी की जरूरत है और इसे लेकर दशकों के उनके बीच लड़ाई जारी है.
  •    कर्नाटक का कहना है कि बारिश कम होने की वजह से कावेरी में जल स्तर घट गया है और इसीलिए वो तमिलनाडु को पानी नहीं दे सकता है. इसके खिलाफ तमिलनाडु ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. तमिलनाडु का कहना है कि उसे हर हाल में पानी चाहिए, वरना उसके लाखों किसान बर्बाद हो जाएंगे. दूसरी तरफ कर्नाटक के अपने तर्क है. सूखे की मार झेल रहे कर्नाटक का कहना है कि कावेरी का ज्यादातर पानी बेंगलूरू और अन्य शहरों में पीने के लिए इस्तेमाल हो रहा है. सिंचाई के लिए पानी बच ही नहीं रहा है.

पानी के बंटरवारे का विवाद मुख्य रूप तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच है लेकिन चूंकि कावेरी बेसिन में केरल और पुद्दुचेरी के कुछ छोटे-छोटे से इलाके शामिल हैं तो इस विवाद में वो भी कूद गए हैं.

  • 1892 में तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी और मैसूर रियासत के बीच पानी के बंटवारे को लेकर एक समझौता हुआ था. लेकिन जल्द ही समझौता विवादों में घिर गया. इसके बाद 1924 में भी विवाद के निपटारे की कोशिश की गई लेकिन बुनियादी मतभेद बने रहे.
  • जून 1990 में केंद्र सरकार ने कावेरी ट्राइब्यूनल बनाया, जिसने 16 साल की सुनवाई के बाद 2007 में फैसला दिया कि प्रति वर्ष 419 अरब क्यूबिक फीट पानी तमिलनाडु को दिया जाए जबकि 270 अरब क्यूबिक फीट पानी कर्नाटक के हिस्से आए. कावेरी बेसिन में 740 अरब क्यूबिक फीट पानी मानते हुए ट्राइब्यूनल ने ये फैसला दिया. केरल को 30 अरब क्यूबिक फीट और पुद्दुचेरी को 7 अरब क्यूबिक फीट पानी देने का फैसला दिया गया. लेकिन कर्नाटक और तमिलनाडु, दोनों ही ट्राइब्यूनल के फैसले से खुश नहीं थे और उन्होंने समीक्षा याचिका दायर की.
  • 2012 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाले कावेरी नदी प्राधिकरण ने कर्नाटक सरकार को निर्देश दिया कि वो रोज तमिलनाडु को नौ हजार क्यूसेक पानी दे. सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक को झाड़ लगाते हुए कहा कि वो इस फैसले पर अमल नहीं कर रहा है. कर्नाटक सरकार के इसके लिए माफी मांगी और पानी जारी करने की पेशकश की. लेकिन इसे लेकर वहां हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए.

लेकिन मुद्दा सुझला नहीं. कर्नाटक ने फिर पानी रोक दिया तो तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता फिर इस साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची और कहा कि ट्राइब्यूनल के निर्देशों के अनुसार उन्हें पानी दिया जाए. अब अदालत ने कर्नाटक सरकार से कहा है कि वो अगले 10 दिन तक तमिलनाडु को 12 हजार क्यूसेक पानी दे. लेकिन इसके खिलाफ कर्नाटक में लोग फिर सड़कों पर हैं.

Vaidambh Media (thanks to DW )

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