काश; शिक्षासुधार के लिये बहते आॅशू घड़ियालू न होते !

Lucknow :  जगन्नाथ आजाद का एक शेर है-
                                                                     इब्तिदा ये थी कि मैं था और दा’वा इल्म का
                                                                     इंतिहा ये है कि इस दा’वे पे शरमाया बहुत
शायर का शरमाना जायज है। इल्म का हाल ही कुछ ऐसा है। खासतौर से उत्तर भारतीय राज्यों का। यूपी का तो हाल कुछ यूं है कि सीएम साहब को भरे मंच से खुले आम कहना पड़ रहा है कि उनके पास नौकरियां तो बहुत हैं, उन्हें लेने लायक नौजवान नहीं हैं। इसमें झूठ कुछ भी नहीं। पढ़ाई-लिखाई का हाल ही कुछ ऐसा है। मोटी फीस लेने वाले प्राइवेट स्कूल-कॉलेजों तक में गाइड बुकों का जोर है। उनसे बचे तो ट्यूशन-कोचिंग। सरकारी टीचरों का हाल क्या है, यह तो किसी से छिपा है नहीं। ऐसे में कैसे-कैसे होनहार तैयार हो रहे हैं। बात करिए तो पता चलता है कि गणित से एमएससी को साइन ए प्लस बी नहीं पता तो समाजशास्त्र के परास्नातक को विवाह के प्रकार पता नहीं।
मुख्यमंत्री जी का कहा क्यों नहीं मानते शिक्षक ?
पर, शिक्षक दिवस के मौके पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के भाषण ने बड़ी उम्मीद जगाई। उन्होंने शिक्षकों से कहा है कि वह अपने बच्चों को उन्हीं स्कूलों में पढ़ने भेजें, जहां वह खुद पढ़ाते हैं। इससे ज्यादा पवित्र भावना तो कोई हो ही नहीं सकती। जाहिर है जब अपना बच्चा भी उसी स्कूल में पढ़ेगा तो शिक्षक ज्यादा जिम्मेदार बनेंगे। लोगों का भरोसा जगा है कि योगी जी अब हाई कोर्ट के आदेश से जुड़ी एक खास फाइल की धूल जरूर झड़वाएंगे। करीब दो साल पहले शिक्षक शिव कुमार पाठक ने उच्च न्यायालय में एक याचिका दाखिल की थी। इस याचिका पर जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने एक आदेश दिया था। उन्होंने राज्य सरकार को आदेश दिया था कि सरकारी खजाने से वेतन उठाने वाले अधिकारी, कर्मचारी, नेता या मंत्री के बच्चे अब से सरकारी स्कूलों में ही पढ़ें। मंशा बहुत अच्छी थी कि इससे भ्रष्टाचार खत्म होगा, सरकारी स्कूल-कॉलेजों की दशा सुधरेगी और राज्य में शैक्षिक क्रांति हो जाएगी।
पुनर्विचार याचिका का भी बड़ा रोल होता है।
खैर तब की सरकार ने इस मामले में पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी थी। तब से मामला वहीं का वहीं अटका है। देखिए अब बात निकली है तो फिर वह दूर तक जानी ही चाहिए। फिर जब मुख्यमंत्री खुद बोले हैं तो फिर राज्य सरकार का यह कर्तव्य भी बनता है। सोचिए लोग कितना पसंद करते हैं कि बड़े नेता-अफसर अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाएं। कभी छत्तीसगढ़ के किसी आईएएस की खबर वायरल होती है तो कभी दिल्ली के किसी मंत्री की। आज हालत यह है कि खाते-पीते सरकारी लोग सरकारी स्कूलों में अपने बच्चे भेजते हैं तो बड़ी खबर बनते हैं। इसे अब आम बात बनाना होगा। जरा सोचिए कि शिक्षा मंत्री जी का बेटा या नाती या पोता सरकारी स्कूल में पढ़ता है। क्या मजाल होगी किसी जिलाधिकारी या डीआईओएस की कि वह जिले के स्कूलों की इमारतों को खंडहर जैसा रहने दे। सोचिए प्रमुख सचिव बेसिक, माध्यमिक या उच्च शिक्षा के घरों के बच्चे सरकारी स्कूल या कॉलेज में पढ़ रहे हों। ऐसे में मजाल है कि वहां की फंडिंग रुक जाए। रही बात शिक्षकों की तो उनकी तो हिम्मत ही नहीं होगी कि वह स्कूल में जाकर मोबाइल गेम खेलें या स्वेटर बुनें। पढ़ाएंगे नहीं तो बात मंत्री-अफसरों के घरों तक जाएगी। अब देखने वाली बात होगी कि शिक्षा में सुधार को लेकर जताई जा रही चिंता वाकई गंभीर है या पहले की सरकारों जैसी सिर्फ कागजी।
कुछ करना है तो सार्थक करो सरकार वरना ठप्प करो सब ।
राज्य सरकार वाकई गंभीर है तो उसे उस संस्कृति स्कूल के कैबिनेट फैसले पर भी गौर करना चाहिए जिसमें सिविल सर्विसेज से जुड़े अफसरों के बच्चों की प्रीमियम पढ़ाई का इंतजाम होना है। अगर ब्यूरोक्रेट परिवारों के बच्चे खास स्कूल में पढ़ेंगे तो जाहिर है कि उनकी चिंता सरकारी स्कूलों को लेकर क्यों होगीध् आखिर ऐसे स्कूल खोलने की नौबत ही इसलिए आई है क्योंकि मंत्री-अफसर जानते हैं कि हकीकत क्या है। उनसे गुजारिश करनी होती तो बात फुजैल जाफरी के इस शेर से खत्म होती-
जहर मीठा हो तो पीने में मजा आता है
बात सच कहिए मगर यूँ कि हकीक़त न लगे।

साभार : SUDHIR MISHRA JI (NbT)

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