कैसे पढ़ रहा भारत, कहाॅ बढ़ रहा भारत !

  शिक्षा के मोर्चे पर आत्ममंथन

educationschool_f New Delhi: आपके हिसाब से शिक्षा के मोर्चे पर भारत की सबसे बड़ी समस्या क्या है, जिसका सरकार को तात्कालिक तौर पर समाधान निकालना चाहिए? अगर सुर्खियों में छाए विषयों के आधार पर इसका आकलन किया जाए तो आप शायद या तो ऐतिहासिक शोध की गुणवत्ता या प्रतिष्ठिïत प्रबंधन एवं तकनीकी संस्थानों में खस्ताहाल प्रशासन की स्थिति की ओर इशारा करेंगे। कुछ केंद्रीय विद्यालयों में भाषा नीति और स्कूली पाठ्य पुस्तकों में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नाकाफी खुराक की ओर संकेत करेंगे। कुल मिलाकर वक्त आ गया है, जब नींद से उठकर आत्ममंथन किया जाए।

       देंश में विद्या का स्तर

Jaura_Indiaयूएनडीपी की मानव विकास रिपोर्ट के अनुसार एक औसत भारतीय स्कूल में 4.4 वर्ष गुजारता है। यह उन पड़ोसी देशों की तुलना में भी खराब स्थिति है, जिनके बनिस्बत हम खुद को महाशक्ति सा महसूस करते हैं। किसी को बमुश्किल ही यह जोडऩे की जरूरत है, जिसकी हर साल पुनरावृत्ति होती है क्योंकि प्रथम द्वारा प्रत्येक वर्ष कराए जाने वाले स्कूलों के सर्वेक्षणों में यही बात सामने आती है कि कक्षा 5 के विद्यार्थियों में से आधे कक्षा 2 के स्तर की पढ़ाई और गणित के सवाल हल नहीं कर पाते। हालांकि इसके उलट माध्यमिक शिक्षा के स्तर पर दाखिलों का आंकड़ा 69 फीसदी तक है। क्या माध्यमिक विद्यालयों में इतनी बड़ी तादाद में बच्चे वास्तव में कुछ सीख रहे हैं या नहीं? हम नहीं जानते क्योंकि पिछली सरकार ने परीक्षा प्रणाली समाप्त कर दी थी। फिर भी इस सवाल का जवाब तब मिला, जब तमिलनाडु और हिमाचल प्रदेश के कुछ छात्रों ने वर्ष 2012 में अंतरराष्टï्रीय अध्ययन आकलन कार्यक्रम (पीसा) में शिरकत की। भारतीय छात्रों का प्रदर्शन सभी देशों के छात्रों से बदतर था और वे केवल किर्गिजस्तान (जबकि वहां भारत से ज्यादा साक्षरता दर है) के छात्रों से बेहतर रहे। असल में भारत के कक्षा 8 के छात्रों का स्तर दक्षिण कोरिया के कक्षा 3 के छात्रों से भी गया गुजरा था।

किसे चिंता है भारत के नौनिहालों की 

padhai     इस तंत्र में सुधार की शिद्दत से दरकार है। वैसे तो प्राथमिक शिक्षा प्रत्यक्ष रूप से राज्य सरकारों का विषय है लेकिन क्या नई दिल्ली में बैठीं मानव संसाधन विकास मंत्री को अन्य चिंताओं के बीच में इस पर भी ध्यान नहीं देना चाहिए? इस अहम मसले पर संसद में पेश मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट हैरतअंगेज रूप से बहुत कुछ नहीं कहती है। मगर उसे इस तथ्य पर गौर करना चाहिए कि जहां भारत की साक्षरता दर 74 फीसदी है, वहीं म्यांमार की 93 फीसदी और वियतनाम की 94 फीसदी है। यह भी उल्लेखनीय है कि साक्षरता की भारतीय परिभाषा (किसी भी भाषा में पढऩे और लिखने की क्षमता) भी बेहद साधारण और पुराने जमाने की है, उसमें कई अन्य चीजों के अलावा गणना को भी शामिल नहीं किया गया है। अगर 1970 के दशक में यूनेस्को द्वारा स्वीकृत साक्षरता की अधिक सामयिक परिभाषा को पैमाना बनाएं तो भारत की साक्षरता दर काफी नीचे लुढ़क जाएगी।

       शिक्षा के ब्यवसायी कब लेगें जिम्मेदारी

edu2इसके लिए बुनियादी तौर पर जहां तमाम समस्याएं जिम्मेदार हैं, वहीं समस्या का एक अहम पहलू वित्तीय संसाधनों की कमी भी है। सरकारी माध्यम से शिक्षा पर भारत में जीडीपी का 3.8 फीसदी खर्च होता है। मलेशिया में यही आंकड़ा डेढ़ गुने से अधिक (5.9 फीसदी) और थाईलैंड में लगभग दोगुना (7.6 फीसदी) है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनका तर्क है कि मौजूदा सरकारी स्कूलों में सरकारी वित्तीय संसाधन बढ़ा देना कोई हल नहीं है क्योंकि बुनियादी समस्या इन स्कूलों में अध्यापकों (जिन्हें निजी स्कूलों में अध्यापकों की तुलना में कहीं बेहतर वेतन मिलता है) की है, जिनकी गैरहाजिरी चिंताजनक है। वास्तव में बच्चों को सरकारी स्कूलों से निकालकर निजी स्कूलों में दाखिला कराने की दर काफी ऊंची है क्योंकि अभिभावक अपने बच्चों का भविष्य बेहतर करना चाहते हैं। कुछ राज्यों में आधे से ज्यादा छात्र अब निजी स्कूलों में हैं, जहां शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत बेहतर (हालांकि बहुत ज्यादा अच्छा तो नहीं) है। ऐसे में स्कूल या अध्यापकों के बजाय अभिभावकों की पसंद का विकल्प बेहतर हो सकता है।

कुछ प्रयास तो करने होंगे!

education bulding  सरकार के लिए यह बेहतर होगा कि वह शिक्षा पर होने वाले खर्च को सीधे उस स्कूल को मुहैया कराए, जिसे अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए पसंद करें। बाकी आप आश्वस्त हो सकते हैं कि इससे सरकारी स्कूलों में प्रदर्शन का स्तर सुधरेगा भले ही अध्यापन के स्तर में बहुत ज्यादा बदलाव न आए, जिसे भी नए सिरे से गढऩे की जरूरत है ताकि बच्चे सर खपाकर सीखने के बजाय कुछ नए तरीकों से अपने दिगाग को धार दे सकें। मगर क्या सरकार में किसी को इसमें दिलचस्पी है, या फिर वे महज प्रबंधन संस्थानों की स्वायत्तता के स्तर को कम करने में ही मसरूफ हैं?

टी. एन. नाइनन ( B.S.)

Previous Post
Next Post

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

hogan outlet online scarpe hogan outlet nike tn pas cher tn pas cher nike tn 2017 nike tn pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher