घर से ही फूंकना होगा दासत्व मुक्ति आन्दोलन का विगुल

स्त्री को पुरुष से मुक्ति नही चाहिये। आर्थिक स्वतंत्रता,शिक्षा व सुरक्षा के बावजूद समाज का स्वस्थ ,संतुलित स्वरुप हमे प्राप्त नही हो सकेगा;जब तक कि समानता ,सहयोग व संवेदना के साथ उसे दासत्व एवं अधिपत्य से मुकित नही मिल जाती। आम धारणा है ,हमारे देश में स्त्री को जो सम्मान प्राप्त है वह विश्व मे कहीं नहीं। कौन देता है यह सम्मान?किसने बताया इस सम्मान के बारे मेंं? जरुर कोर्इ पुरुष ही रहा होगा ! क्योंकि स्त्री को पतिपरमेश्वर के चरण वंदना और पुत्र रतन के भविष्य निर्माण , सास-ननद के हुक्म और नखरे पूरे करनें में दिन रात जुटे रहने से कब फुर्सत मिली होगी कि वह ऐसी बातें गढ़े। मा की कोंख के बाद सबकुछ पुरुष के हाथ में ही तो रहा। पिता की निगरानी,भार्इ के निर्देशन में चलना, उठना,बैठना,रोना ,हसना सभी कुछ। इसमें मा की मूक सहमति ने कभी मौका ही नही दिया खुद को जानने,पहचानने का। शादी के बाद पति फिर बच्चे। मा कि तरह हम भी मूक रहे तो मेरी बच्ची का भविष्य क्या होगा?
दोस्तों ! अब हर जोर जुल्म के टक्कर में संघर्ष हमारा कर्म बन जाना चाहिए। समस्या को आखे बंद कर स्वीकार कर लेना या पलायनवादी हो जाना खतरनाक है। महिला मुकित आंदोलन की शुरुआत अपने घर से ही करनी होगी। बेटी पैदा हुर्इ, थोड़ी बड़ी हुर्इ उसे सबसे पहला बोध उसे स्त्री होने का कराया जाता है। बेटी हीनग्रंथि का शिकार होने लगती है। यह देश के 70प्रतिशत परिवारों की सच्चार्इ है। जब बेटी घर के भीतर मा को प्रताडि़त व शोषित देखती है, तो स्वयमेव समझ लेती है कि उसका बाकी का जीवन इसी तरह गुजरना है। औरत को शसक्त बनना ही होगा और इसके लिए शिक्षा सबसे बड़ी जरुरत है। हर समस्या का समाधान शिक्षा में है। शिक्षा प्रापित के बाद ब्यवहारिक जीवन यात्रा में ब्यकित र्निभीक हो जाता है। अनपढ़ होने से स्वीकारोकित बढ़ती है। इसलिए शिक्षित बनो,मुंखर हो।
हजारों वर्ष से स्वीकार करने की आदत पड़ गयी। इससे विपरीत होने मे समय तो लगेगा ही। जिन्होने यह मिथक तोड़ा उन्हे आदर्श मानते हुए उनकी परिसिथतियों पर गौर करें- जब उन्होने दकियानूसी परम्परा को तोड़ समाज मे कोर्इ मुकाम बनाया,यही पुरुष समाज उनके गुणगाते नहीं थकता। शबरी,गार्गी,सती,साबित्री, रजिया सुल्तान,रानी लक्ष्मीबार्इ, फलोरेंस नार्इटेंगिल,मदर टेरेसा, रीता फारिया ,तसलीमा नसरीन, मलाला युसुफजर्इ, कमलेश कुमारी,,माधुरी दिक्षित,गुलाबो सहित सैकड़ों नाम हैं सभी ने धारा के विपरीत चलने की कोशिश की इसी वजह से हम इन्हे जान पाये। नि:संदेह परिवार की सबसे मजबूत कड़ी मा होती है। उसे अपने बच्चों के उज्वल भविष्य के लिये शिक्षित होना आवश्यक है। बच्चों मे स्त्री-पुरुष को लेकर परम्परागत हो चुके भेदभाव दूर हां,े इसके लिये मा का शिक्षित होना जरुरी है। लड़कों के मन में लड़कियों के प्रति सम्मान हो इसलिये मा शिक्षित बनें। समाज को समतामूलक बनाने के लिये स्त्री का शिक्षित होना परमावश्यक है।
लक्ष्मी ब्रिज्
गोरखपुर्

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