चलो , मैगी-नूडल के बहाने ही पर्यावरण को जाने !

मित्रों ! नेशले की मैगी गई तो योग ब्यवसायी बाबा रामदेव की बाॅछें खिल गईं उन्होने जनता के दर्द को तुरंत दूर करने के लिये बाजार में शुद्ध देशी नुडल्स उतारने की ब्यवस्था की। अब उन्हाने तो पूरी देश भक्ति दिखाई पर कोर्ट को नजाने क्या दिख गया कि वह जनता की सेवा नहीं कर पाये। इसमें इतनी लेट लतीफी हुई कि सुना है मुई मैगी फिर वापस बाजार में आ गई है उसका सारा दोष कम्पनी ने गुण में बदल दिया ! अब सरकार बेचारी क्या करे ? जब सब पैमाना ठीक हो तो जहर बेचने का भी आदेश दिया जा सकता है क्यों ? फिलहाल हम आपको इस छोटे से हल्के फुल्के खाद्य पदार्थ के माध्यम से पर्यावरणीय समस्या पर सावधान करने के लिये अरुण तिवारी का लेख आमत्रित करते हैं जो पर्यावरण मुद्दे पर खरोचती कलम चलाने के लिये जाने जाते हैं!

सर्वत्र फैलते लेड को रोकने के लिये कोई उपाय करें !

New Delhi: मैगी नूडल्स में सीसा यानी लेड की अधिक मात्रा को लेकर उठा बवाल, बाजार का खेल है या स्थिति सचमुच, इतनी खतरनाक है? इस प्रश्न का उत्तर तो चल रही जाँच और बाजार में नूडल्स के नए ब्राण्ड आने के बाद ही पता चलेगा।

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सीसा या लेड

फिलहाल, माँग हो रही है कि इस जाँच का विस्तार सभी प्रसंस्करित खाद्य पदार्थों को लेकर हो। जाँच, कार्रवाई और उसे सार्वजनिक करने की नियमित प्रक्रिया बने। यह सब ठीक है; यह हो। किन्तु यहाँ उठाने लायक व्यापक चित्र भिन्न है। मूल चित्र यह है कि सीसे की अधिक मात्रा में उपस्थिति चाहे मैगी नूडल्स में हो अथवा हवा, पानी और मिट्टी में; सेहत के लिये नुकसानदेह तो वह सभी जगह है। जिस तरह किसी खाद्य पदार्थ के दूषित होने के कारण हम बीमार पड़ते अथवा मरते हैं, उसी तरह मिलावटी/असन्तुलित रासायनिक वाली मिट्टी, हवा और पानी के कारण भी हम मर और बीमार पड़ ही रहे हैं।

खाद्य पदार्थ मे लेड खिलाने वालों पर कड़े अपराधिक अभियोग बनाये जांय !

worm-found-in-chocolate-of-cadburyप्रश्न यह है कि मिट्टी, हवा और पानी में मिलावट तथा रासायनिक असन्तुलन के दोषियों को लेकर हमारी निगाह, कायदे और सजा उतनी सख्त क्यों नहीं है? खाद्य पदार्थ की तरह मिट्टी, हवा, पानी का रासायनिक अथवा जैविक असन्तुलन बिगाड़ने वालों को लेकर बिना किसी की अनुमति, सीधे-सीधे हत्या अथवा हत्या की कोशिश की धाराओं में प्राथमिक सूचना रिपोर्ट दर्ज क्यों नहीं कराई जा सकती? क्या ऐसी सख्ती के बगैर, पर्यावरण के प्रदूषकों को नियन्त्रित करना सम्भव है? क्या यह सच नहीं कि प्रदूषकों को सजा में ढिलाई भी क्या एक ऐसा कारण नहीं है, जिसकी वजह से हमारे विकासकर्ता, पर्यावरण की परवाह नहीं कर रहे?
लक्ष्मण रेखा के प्रश्न

ये सभी प्रश्न इसलिये हैं; ताकि हम अपने भौतिक विकास के नाम पर हो रहे अतिदोहन और असन्तुलन को समझदारी के साथ लक्ष्मण रेखा में ला सकें। हम समझ सकें कि विकास और पर्यावरण, एक-दूसरे के पूरक होकर ही आगे बढ़ सकते हैं। environmental यह सच है। यह सच, पर्यावरण और विकास को एक-दूसरे की परवाह करने वाले तन्त्र के रूप में चिन्हित करता है। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण है कि पर्यावरण और विकास की चाहत रखने वालों ने आज एक-दूसरे को परस्पर विरोधी मान लिया है। भारत के इंटेलीजेंस ब्यूरो ने ऐसे कई संगठनों को विकास में अवरोध उत्पन्न करने के दोषी के रूप में चिन्हित किया है। हाल ही में अपने खातों को ठीक-ठाक न रख पाने के कारण विदेशी धन लेने वाले करीब 9000 संगठनों के लाइसेंस रद्द करने की सरकारी कार्रवाई को भी इसी आइने में देखा जा रहा है। दूसरी ओर, पर्यावरण के मोर्चे पर चुनौतियाँ-ही-चुनौतियाँ हैं। जिनका जवाब बनने की कोशिश कम, सवाल उठाने की कोशिशें ज्यादा हो रही हैं। ऐसा क्यों? जवाब बनने की कोशिशें भी इलाज के रूप में ही ज्यादा सामने आ रही हैं। बीमारी हो ही न, इसके रोकथाम को प्राथमिकता बनाने का चलन कम नजर आ रहा है।

 गायब हो जाएँगी  हेमन्त और बसन्त ऋतु  !

हम समझ रहे हैं कि विकास के जिस रास्ते पर चलने के कारण पर्यावरणीय संकट गहरा गया है, पर्यावरणीय संकट पलटकर उस विकास को ही बौना बना रहा है। जानते, समझते और झेलते हुए भी हम चेत नहीं रहे। ऐसा क्यों?basant पर्यावरणीय चुनौतियों के मोर्चे पर समाधान के मूल प्रश्न यही हैं।सब जानते हैं कि बढ़ता तापमान और बढ़ता कचरा, पर्यावरण ही नहीं, विकास के हर पहलू की सबसे बड़ी चुनौती है। वैज्ञानिक आकलन है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ेगा, तो बर्फ पिघलने की रफ्तार बढ़ती जाएगी। समुद्रों का जलस्तर बढ़ेगा। नतीजे में कुछ छोटे देश व टापू डूब जाएँगे। समुद्र किनारे की कृषि भूमि कम होगी। लवणता बढ़ेगी। समुद्री किनारों पर पेयजल का संकट गहराएगा। समुद्री खाद्य उत्पादन के रूप में उपलब्ध जीव कम होंगे। वातावरण में मौजूद जल की मात्रा में परिवर्तन होगा। परिणामस्वरूप, मौसम में और परिवर्तन होंगे। और यह जलवायु परिवर्तन तूफान, सूखा और बाढ़ लाएगा। हेमन्त और बसन्त ऋतु गायब हो जाएँगी। इससे मध्य एशिया के कुछ इलाकों में खाद्यान्न उत्पादन बढ़ेगा। किन्तु दक्षिण एशिया में घटेगा। नहीं चेते, तो खाद्यान्न के मामले में स्वावलम्बी भारत जैसे देश में भी खाद्यान्न आयात की स्थिति बनेगी। पानी का संकट बढ़ेगा।

आधुनिक अंधपन में बहुतों की बर्बादी तय !

पर्यावरण को लेकर बढ़ते विवाद, बढ़ती राजनीति, बढ़ता बाजार, बढ़ते बीमार, बढ़ती प्यास और घटती उपलब्धता को देखते हुए यह नकारा नहीं जा सकता कि पर्यावरण, विकास को प्रभावित करने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व है।

'The human environment' symbolises the relationship many humans have with nature.  The sense that somehow we are suspended above the consequences that we as humans wreak on the environment although we are actually integrally connected to it, immersed within it.

Nature, life, death and spirituality –  by Tamara Dean -About Blank

प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता जितनी घटती जाएगी, विकास के सभी पैमाने हासिल करने की चीख-पुकार उतनी बढ़ती जाएगी। अतः प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता और शुचिता बढ़ाने की प्राथमिकता है ही। विकास, उपभोग और पर्यावरण के बीच सन्तुलन साधकर ही यह सम्भव है। जहाँ बाढ़ और सुखाड़ कभी नहीं आते थे, वे नए ‘सूखा क्षेत्र’ और ‘बाढ़ क्षेत्र’ के रूप में चिन्हित होंगे। जाहिर है कि इन सभी कारणों से महंगाई बढ़ेगी। दूसरी ओर जलवायु परिवर्तन के कारण पौधों और जीवों के स्वभाव में परिवर्तन आएगा। पंछी समय से पूर्व अण्डे देने लगेंगे। ठंडी प्रकृति वाले पंछी अपना ठिकाना बदलने को मजबूर होंगे। इससे उनके मूल स्थान पर उनका भोजन रहे जीवों की संख्या एकाएक बढ़ जाएगी। कई प्रजातियाँ लुप्त हो जाएँगे। मनुष्य भी लू, हैजा, जापानी बुखार जैसी बीमारियों और महामारियों का शिकार बनेगा। ये आकलन, जलवायु परिवर्तन पर गठित अन्तर-सरकारी पैनल के हैं।
जिम्मेदार कौन?

Responsible_Care

Responsible Care

पर्यावरण कार्यकर्ता और अन्य आकलन भी इस सभी के लिये इंसान की अतिवादी गतिविधियों को जिम्मेदार मानते हैं। तापमान में बढ़ोत्तरी का 90 प्रतिशत जिम्मेदार तो अकेले ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को ही माना गया है। मूल कारण है, अतिवादी उपभोग।सारी दुनिया, यदि अमेरिकी लोगों जैसी जीवनशैली जीने लग जाए, तो 3.9 अतिरिक्त पृथ्वी के बगैर हमारा गुजारा चलने वाला नहीं। अमेरिका, दुनिया का नम्बर एक प्रदूषक है, तो चीन नम्बर दो। चेतावनी साफ है; फिर भी भारत, उपभोगवादी चीन और अमेरिका जैसा बनना चाहता है। क्या यह ठीक है? जवाब के लिये अमेरिका विकास और पर्यावरण के जरिए आइए समझ लें कि विकास, समग्र अच्छा होता या सिर्फ भौतिक और आर्थिक?

अमेरिकी विकास और पर्यावरण !

america

Hurricane Sandy damage

संयुक्त राज्य अमेरिका में दुनिया की पाँच प्रतिशत आबादी रहती है। किन्तु प्रदूषण में उसकी हिस्सेदारी 25 प्रतिशत है।  कारण कि वहाँ 30 करोड़ की आबादी के पास 25 करोड़ कारें हैं। बहुमत के पास पैसा है, इसलिए ‘यूज एण्ड थ्रो’ की प्रवृत्ति भी है। उपभोग ज्यादा हैं, तो कचरा भी ज्यादा है और संसाधन की खपत भी। एक ओर ताजे पानी का बढ़ता खर्च, घटते जल स्रोत और दूसरी तरफ किसान, उद्योग और शहर के बीच खपत व बँटवारे के बढ़ते विवाद। बड़ी आबादी उपभोग की अति कर रही है, तो करीब एक करोड़ अमेरिकी जीवन की न्यूनतम ज़रूरतों के लिये संघर्ष कर रहे हैं। विषमता का यह विष, सामाजिक विन्यास बिगाड़ रहा है। हम इससे सीखकर सतर्क हों या प्रेरित हों? सोचिए!
यह खोना है कि पाना?

दुनिया में 7400 लाख लोगों को वह पानी मुहैया नहीं !

आर्थिक विकास की असलियत बताते अन्य आँकड़े यह हैं कि प्रदूषित हवा की वजह से यूरोपीय देशों ने एक ही वर्ष में 1.6 ट्रिलियन डॉलर और 6 लाख जीवन खो दिए।without water एक अन्य आँकड़ा है कि वर्ष-2013 में प्राकृतिक आपदा की वजह से दुनिया ने 192 बिलियन डॉलर खो दिए। दुखद है कि दुनिया में 7400 लाख लोगों को वह पानी मुहैया नहीं, जिसे किसी भी मुल्क के मानक पीने योग्य मानते हैं। दुनिया में 40 प्रतिशत मौत पानी, मिट्टी और हवा में बढ़ आए प्रदूषण की वजह से हो रही है। हमें होने वाली 80 प्रतिशत बीमारियों की मूल वजह पानी का प्रदूषण, कमी या अधिकता ही बताया जा रहा है। कहा जा रहा है कि दिल्ली की हवा में बीजिंग से ज्यादा कचरा है। भारत की नदियों में कचरा है। अब यह कचरा मिट्टी में भी उतर रहा है। भारत, भूजल में आर्सेनिक, नाइट्रेट, फ्लोराइड तथा भारी धातु वाली अशुद्धियों की तेजी से बढ़ोत्तरी वाला देश बन गया है। विकास को हमारा तौर-तरीका कचरा बढ़ा रहा है और प्राकृतिक संसाधन को बेहिसाब खा रहा है।

..तो हम क्या करें? भारत क्या करे?

क्या आदिम युग का जीवन जीएँ? क्या गरीब-के-गरीब ही बने रहें? आप यह प्रश्न कर सकते हैं। ढाँचागत और आर्थिक विकास के पक्षधर भी यही प्रश्न कर रहे हैं। जवाब है कि भारत सबसे पहले अपने से प्रश्न करें कि यह खोना है कि पाना?water भारत, सभी के शुभ के लिये लाभ कमाने की अपनी महाजनी परम्परा को याद करें। हर समस्या में समाधान स्वतः निहित होता है। इस स्पष्टता के बावजूद हम न तो पानी के उपयोग में अनुशासन तथा पुर्नोपयोग व कचरा प्रबन्धन में दक्षता ला पा रहे हैं और न ही ऊर्जा के। यह कैसे हो? सोचें और करें। नैतिक और कानूनी.. दोनों स्तर पर यह सुनिश्चित करें कि जो उद्योग जितना पानी खर्च करे, वह उसी क्षेत्र में कम-से-कम उतने पानी के संचयन का इन्तजाम करे। प्राकृतिक संसाधन के दोहन कचरे के निष्पादन, शोधन और पुर्नोपयोग को लेकर उद्योगों को अपनी क्षमता और ईमानदारी, व्यवहार में दिखानी होगी। सरकार को भी चाहिए कि वह पानी-पर्यावरण की चिन्ता करने वाले कार्यकर्ताओं को विकास विरोधी बताने के बजाय, समझे कि पानी बचेगा, तो ही उद्योग बचेंगे; वरना किया गया निवेश भी जाएगा और भारत का औद्योगिक स्वावलम्बन भी।
प्रतिबद्धता, ज़मीन पर उतरे !

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“I say the glass is always full- half with air, half with water : Modi

नियमन के मोर्चे पर जरूरत परियोजनाओं से होने वाले मुनाफे में स्थानीय समुदाय की हिस्सेदारी के प्रावधान करने से ज्यादा, प्राकृतिक संसाधनों का शोषण रोकने की है। भारतीय प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी  ने अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ अपनी बातचीत में प्रकृति से साथ रिश्ते की भारतीय संस्कृति का सन्दर्भ पेश करते हुए प्राकृतिक संसाधनों का बेलगाम दोहन रोकने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। जरूरी है कि यह प्रतिबद्धता, ज़मीन पर उतरे। बैराज, नदीजोड़, जलमार्ग, जलविद्युत, भूमि विकास, नगर विकास, खनन, उद्योग आदि के बारे में निर्णय लेते वक्त विश्लेषण हो कि इनसे किसे कितना रोज़गार मिलेगा, कितना छिनेगा? किसे, कितना मुनाफ़ा होगा और किसका, कितना मुनाफ़ा छिन जाएगा? जीडीपी को आर्थिक विकास का सबसे अच्छा संकेतक मानने से पहले सोचना ही होगा कि जिन वर्षों में भारत में जीडीपी सर्वोच्च रही, उन्हीं वर्षों में किसानों की आत्महत्याओं के आँकड़े सर्वोच्च क्यों रहें?

प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता घटी तो समस्या होगी भयावह !

environmental assessment_reicपर्यावरण को लेकर बढ़ते विवाद, बढ़ती राजनीति, बढ़ता बाजार, बढ़ते बीमार, बढ़ती प्यास और घटती उपलब्धता को देखते हुए यह नकारा नहीं जा सकता कि पर्यावरण, विकास को प्रभावित करने वाला सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तत्व है। प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता जितनी घटती जाएगी, विकास के सभी पैमाने हासिल करने की चीख-पुकार उतनी बढ़ती जाएगी। अतः प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धता और शुचिता बढ़ाने की प्राथमिकता है ही। विकास, उपभोग और पर्यावरण के बीच सन्तुलन साधकर ही यह सम्भव है। सन्तुलन बिगाड़ने वालों को लक्ष्मण रेखा में लाकर ही हो सकता है। मैगी नूडल्स में सीसे का सन्देश यही है और पर्यावरण दिवस का भी।

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