छूआछूत-भेदभाव से संघर्ष करते आरक्षण तक, जारी है जाति का सफर !

जाति एक भारतब्यापी घटना !

 Lucknow : आधुनिक भारत में सामाजिक परिर्वतन का विषय बहुत विस्तृत और जटिल है।संस्कृतीकरण और पश्चिमीकरण की अवधारणाएॅ जब पहली बार प्रस्तुत हुईं तो उन्होंने भारतीय क्षेत्र में काम करनेंवाले समाज- विज्ञान और मानव -विज्ञान के विद्वानों को आकर्षित किया। निःसंदेह वर्तमान में भी जाति एक भारतब्यापी घटना है। हर जगह ब्राहम्ण हैं , किसान ,दस्तकार, ब्यापारी, सेवक जातियाॅं हैं। जातियांे के बीच अनिवार्यतः अपवित्रता और पवित्रता के रुप अभिब्यक्त होते रहेें हैं । भारत में मनुष्य ने जाति बनाकर समृद्ध समाज का निर्माण किया। फिर भेद-भाव और कर्म प्रधान जातियाॅ अंततः वर्ण ब्यवस्था। फिर साम्राज्यवाद और जातियों का अपने अस्तित्व को लेकर एक लम्बा संघर्ष जो आज भी कायम है। अनवरत अपने अधिकार के लिये संघर्ष।संसार ,कर्म ,धर्म जैसे कुछ एक शब्द ‘ हिन्दू ‘ धर्मशास्त्रीय प्रत्यय, जाति प्रथा में बुने हुए हैं। हलांकि यह अस्पष्ट है कि ये मान्यता सर्वब्यापी हैं ! यह उस क्षेत्र के संस्कृतीकरण की मात्रा पर भी निर्भर करती रही है।

  जातियों में सक्रीय अन्तर्गामी समूह एक बाधा  !

यूूं देखें तो कहाॅर और भड़भूज तथा बारोट जैसी जातियाॅ पहले कुछ क्षेत्रों में ही पाई जातीं थीं। कुछ ही जातियाॅ जो धंधे से जुड़ी होती थीें, वही देश के अन्य भूभग को विस्तारित हुई। जातियों का जखीरा इतना उलझाऊ और अन्तर्गामी समूह वाला होता है कि इनमें आपस में ही बहुत दुराव और भिन्नता है। इनके बीच खान-पान, रहन-सहन ,पूजा-पाठ का भी भेद देखने को मिलता है। इसका फायदा-नुकसान का हिसाब, राजनीतिक लोग अपने-अपने हिसाब से हर रोज लगाते फिर रहे है। आधुनिक भारत के प्रत्येक भाषायी क्षेत्रों में सैकड़ों जातियाॅ और उनके भीतर अन्तर्गामी समूह सक्रीय हैं। जातियों की लड़ाई लड़ने वाले भी अपनी राजनीति चमकाकर हवस और लूट के अवसर की प्रतीक्षा में देखे जा सकते हैं। यह ऐसा युग आ गया है कि सन्यास का चोला पहनें वैरागी को सरकार पेंशन देनें पर अमादा है। जातिविहीन समाज के ढाँचे के बारे क्या अनुमान लगाया जा सकता है? क्या ऐसा कोई समाज बन सकता है जहाँ जन्म-आधारित कोई पहचान न हो ! मनुष्य को प्रकृति ने कुछ भिन्नताएँ दी हैं, जैसे- नस्ल। वर्ण और श्रम ने भिन्नता बनाई है, जैसे- जाति। इसी तरह भूगोल ने मनुष्य को कई रंग और रूप दिये हैं। ये सभी भिन्नताएँ माता-पिता से संतान के क्रम में प्रवाहमान हैं। इन भिन्नताओं के कुछ नाम तो जरूर होंगे, आप चाहें तो संशोधित नाम रख सकते हैं। गांधीजी ने ‘अछूत’ की जगह ‘हरिजन’ का प्रयोग किया और अँग्रेज सरकार ने ‘अनुसूचित जाति’ का तो मराठी भाषा ने ‘दलित’ शब्द कह कर सम्बोधित किया। मगर, इन सभी नामों का संबंध जन्म-आधारित पहचान से है। जातिविहीन समाज कैसा हो सकता है? इसका एक रूप महानगरीय आबादी में देखा जा सकता है। टू और थ्री बी एच के में बसी यह आबादी जाति-आधारित बसावट को तोड़ती है, मगर ‘समाज’ कहला सकने की योग्यता नहीं रखती है। साथ ही यह सवाल बना रहता है कि क्या ये लोग जाति के प्रश्न से मुक्त हैं ? हम पाते हैं कि यह आबादी भी अपनी-अपनी इकाई में निर्जाति नहीं है। जाति-आधारित सामाजिक बसावट से ये अलग तो हो गये हैं मगर ‘संरचना’ से अलग नहीं हुए हैं।

 

 क्या  है संस्कृतीकरण ?

बहुतों जन सभाओं में खुलेआम जातिगत गालियाॅ देने का दौर भी चलता रहा है।  लगभग सभी मंचों से जाति तोड़ने की बात तो की जाती हैं, पर अपनी जाति का एक संगठन बनाकर, जातिगत शक्ति का दावा पेश करने से पीछे नहीं हटते।  उपर हम बात कर रहे थे संस्कृतीकरण की । यह संस्कृतीकरण है क्या ? यह वह प्रकृया है जिसमें राज्य के समक्ष ऊची जाति में शामिल हाने की अर्जी डाली जाती रही है। इसके द्वारा कोई निचले पायदान पर रहनेवाली जाति, जनजाति उच्च जाति की दिशा में अपने कर्म के आधार कर्म-काण्ड, विचारधारा, जीवन पद्धति को बदलते हुए दावा पेश करती रही है। ये तथ्य हमें महान विद्वान, साहित्य के नोबल पुरस्कार विजेता रविन्द्रनाथ ठाकुर की कैलीफोर्नियाॅ विश्वविद्यालय की ओर से शैक्षिक वर्ष 1962-63 में दिये गये भाषण के अंश से प्राप्त हुए हैं, जो एम एन श्रीनिवासन द्वारा संकलित किये गये थे। यहाॅ यह जानना जरुरी है कि तब भी जब संस्कृतीकरण की माॅग उठती थी तो पड़ोसी जो जाति के दूसरे सोपान पर होते थे वह स्थान, वास, पूजा पद्धति को लेकर विरोध करके निर्णय को अधर में लटका देते थे। फिर भी जागरुकता के अभाव में यह जाति का उच्च सोपान चढ़ने का अच्छा मौका था।आज भारतीय समाज यह बाधा पार कर चुका है।

 सामाजिक सुधार की जरुरत है कि धार्मिक कट्टरता की ?

मैसूर की हरिजन जातियाॅ दास्तकारों (जैसे लुहार, सुनार आदि) के हाथ का बना खानां और पानी पीनां स्वीकार नहीं करतीं थीं जबकि स्वयं को विश्वकर्मा ब्राहम्ण होनें का दावा कर उच्च सोपान पाना चाहतीं थीं। इसी प्रकार किसान(अेाक्कलिग, केरल ओर कर्नाटक क्षेत्र में ) गड़ेरिये तथ मार्क ये सब ब्राहम्ण होने का दावा करते हैं लेकिन अभी भी कहीं-कहीं ये भेद देखने को मिल जाता है कि इनके घर अन्य ब्राहम्ण भेजन नहीं करता है। लिंगायत भी इसी श्रेणी में थे। उन्होंने खुद को कर्नाटक में एक धर्म घोषित कर दिया। इधर उत्तर प्रदेश व बिहार में भी इसका प्रभाव देखने को मिल रहा है कि अनुसूचित जातियाॅ अल्पसंख्यक बनने के लिये बौद्ध अथवा कृश्चियन धर्म अपनाने की ओर अग्रसर हो रहीं हैं। जबकि हिंदूवादी लोगों के तरफ से आज भी समाज सुधार के नाम पर केवल राजनीति ही परोसी जाती रही है।

ध्यान रहे कहीं जाति का उपयोग पूॅजी में न होने लगे !

धर्म और जाति में जागरुकता तथा आधुनिकता लाकर मानव सामाज केन्द्रित कर्म फिलहाल किसी का नहीं दिख रहा है। इसीक्रम में दक्षिण की एक जाति कुर्गी (आदिवासी) अपने को आर्य और क्षत्रिय होने का दावा करती आयी है जो अब राजनीतिक प्रतिष्ठा के कारण देखने को नहीं मिलता ! बहुजन विचारक लेखक सिद्धार्थं लिखते हैं कि पूँजीवाद मनुष्य को ग्राहक के रूप में देखता है, इसलिए ग्राहक बनने के रास्ते में ‘जाति’ जहाँ तक बाधक बनती है उसका विरोध वहीं तक होगा। यदि ‘जाति’ के उपयोग से पूँजी का विस्तार हो तो वह उसका उपयोग धड़ल्ले से करेगा। असहमति की संभावनाओं के बावजूद मैं कहना चाहूँगा कि भारतीय मनुष्य की सबसे बड़ी सामाजिक पहचान उसकी अस्मिता, ‘जाति’ ही है।  फिलहाल, अब तक की यह उपलब्धि है कि राजनीतिक और आर्थिक प्रक्रिया के माध्यम से जातिवादी शोषण को कम करने में सफलता मिली है। आरक्षण ने अब तक के सभी उपायों में सर्वाधिक प्रभावशाली भूमिका निभायी है, क्योंकि इसने आर्थिक और शैक्षणिक प्रक्रिया को तेज गति दी है।  अनेक परिवर्तनों के साथ विरोधी जातिवादी भाषा में भी कमी आयी है।

          Dhananjay

     Vaidambh  Media

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