जगरूकता का मतलब, उत्तरदायित्व का निर्वहन: राजेश मणि

अर्थयुग की भागमभाग जिंदगी में अपेक्षायें पूरी  होने की जगह, निरंतर बढ़ती जा रहीं हैं। प्रत्येक ब्यक्ति स्वयं में इतना उलझता जा रहा है कि उसे स्वयं के बारे में जानने-समझने की फुर्सत नहीं है। ऐसे समय मे समाज का क्या होगा ? जो हम और आप से निर्मित हुआ है। हम -आप जितना अपने में उलझेंगे समाजिक ब्यवस्था उतनी ही बद्तर होकर हमारे सामने सुरसा का आकार लेती जायेगी। सरकार  पर दोष मढ़कर स्वयं की जिम्मेदारी से भागते लोग,सरकारी तंत्र से रिश्तेदारी जोड़ चुके विचैलिये,आमजन में जागरूकता का अभाव,शहरीकरण की अनावश्यक मार ये सभी मिलकर समाज का अवमुल्यन कर रहें हैं। बेतरतीब होती ब्यवस्था को पटरी पर लाने का कुछ लोग  निरंतर, सार्थक प्रयास कर रहें हैं,उनका मानना है कि अपना कर्तब्य पालन करते हुए,अपने अधिकार के लिये आगे आना होगा। Vaidambh.inके धनंजय बृज ने अधिकारों की लड़ाई का शंखनाद करने वाले  ऐसे ही एक समर्पित समाजसेवी राजेश मणि से उनकी 20वर्षों की सामाजिक कर्मयात्रा पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं प्रमुख अंश-

समाजसेवा का प्रारम्भ कैसे हुआ ?

यदि आप समाज के बारे में तनिक भी चिंता करते हैं तो उससे जुड़े रहना चाहते है। लोगों की सेवा करने का भाव मेरे भीतर भी था।वर्ष 1991 में मानव सेवा संसथान के साथ मै एक स्वयंसेवी के रूप में जुड़ा। गाॅवों की अपनी समस्या है जिसे बहुत करीब से देखने व समझने का मौका मिला। वंचित समूहों से अवगत हुआ।समस्याओं की विराट श्रृंखला ने मुझे प्रयोगवादी बनाया, मैं निष्ठापूर्वक कार्य करता रहा और 20 बरस कब गुजर गया पता ही नही चला। सेवा को पूरे भाव से करते रहने के फलस्वरूप आज मुझे संस्था का निदेशक बनाया गया। फिलहाल इस पद पर कार्यरत हूॅ।

पूर्वांचल की समस्या क्या है ?

वही जो पूरे देश की समस्या है, आधारभूत विकास का अभाव । जागरूकता की कमीं, स्वयं की फटी कमीज सिलने के बजाय दूसरों के सूट पर फब्तिंयाॅ कसना। समस्या के निजात के लिये हमें सम्मिलित प्रयास करना होता है।

आपने क्या देखा, समस्या निवारण हेतु क्या प्रयास रहा ?

सेवा के कार्यकर्ता के रूप में जनसमस्या तथा उनके निदान पर प्रयोग का भरपूर मौका मिला। हमने कृषि, स्वास्थ्य, बच्चों के अधिकार व वंचित समूहों के साथ काम किया,उनके पक्ष को पटल पर लाने का सार्थक प्रयास किया गया। हमनें मानव मात्र को मानव के शोषण से बचाने का अभूतपूर्व प्रयोग किया। भारत-नेपाल की 1745 किमी0 की खुली सीमा पर मानव ब्यापार आम हो गया था। हमने उसमे सीधा हस्तक्षेप करते हुए सरकार के साथ मिलकर निगरानी चैकियाॅ बनाई। 10 वर्ष की गहन निगरानी में दोनो देश के नागरिकों को मानव खरीद-फरोख्त के प्रति सावधान किया जिससे अब हयुमन ट्रैफिकिंग का साहस करने वाले पस्त हो गये हैं। लगभग 2.5 लाख लड़कियों / महिलाओं को दलालों के चंगुल से छुड़ाकर उनकी काउंसलिंग करके सुरक्षित उनके घर पहुॅचाया गया। हमारे इस प्रयास के बाद अब सरकार एंण्टी हयुमन ट्रैफिकिंग यूनिट ,बार्डर पर मानव देह ब्यापार, मानव खरीद-फरोख्त रोकने के लिये तैनात कर रही है। यह प्रयास हमारे लिये किसी मेडल से कम नहीं।

कृषि हमारी जीवन रेखा है। आज के मशीनी युग में किसान व कृषि दोनो का  हराश  हो रहा है।बतौर सामाजिक कार्यकर्ता आप इसे कैसे देखते हैं?

निश्चित तौर पर देश में हरित क्राॅति अब नही है। परम्परागत खेती हमें स्थिर रखे हुए है।समय के साथ एग्रो विजनेस की ओर हमें बढ़ना होगा। सबसे बड़ा गन्ना उत्पादक क्षेत्र अब इस फसल से मुॅह मोड़ चुका है। वैज्ञानिक खेती का प्रयोग बढ़ रहा हैं।  आज किसान उत्पाद जल्दी पाने के लिये हानिकारक रसायनों का प्रयोग कर रहा है इसमे  जागरूकता का अभाव नही है बल्कि भूखे पेट की आग है। यह जहर आगे चलकर स्वास्थ्य की बड़ी समस्या का कारण बनेगा। बाजार की माॅग इतनी बढ़ गयी है कि लोगों के पेट भरने की जिम्मेदारी किसान पर आकर ठहर जाती है और वह जानबूझ कर रासायनिक पदार्थों का प्रयोग उत्पाद में करता है। जैविक खाद कों बढ़ावा देने की जिम्मेदारी अकेले किसान के बूते मे नहीं है।हम सबको इसके लिये आगे आना होगा। किसान द्वारा जैविक खाद से उत्पादित अन्न को बाजार तक पहुॅचाने व उसकेे उत्पाद की सही कीमत दिये जाने का प्रबंध होना चाहिए,तभी किसान का मनोबल बढ़ेगा। बाजार को किसानों तक पहुॅचाया जाय तभी कृषि प्रणाली विकसित हो पायेगी।  सरकार की सैकड़ों अच्छी योजनायें  किसान के हित में चलायी जा रहीं हैं।

किसान तो वहीं है जहाॅ दसको पहले था, फिर योजनाओं के होने न होने का क्या औचित्य? 

विचैलियों के कारण किसान अंधकार मेें जीने को विवश था। आज तकनीकी संसाधन सबके पास है जो जागरूकता का सबसे महत्वपूर्ण साधन है, किसान की समस्या हल करने उन्हे सही सलाह देने के लिये टोल फ्री नम्बर हैं। धीरे-धीरे किसान कृषि को अर्थब्यवस्था से जोड़ रहा है लेकिन अर्थ की अपेक्षा में वह स्वास्थ्य को दाॅव पर लगा रहा है। गैर सरकारी संगठनों की जिम्मेदारी अब और बढ़ गई है, जागरूकता की जगह उत्रदायित्व का बोध करायें। ग्राम प्रधान के पास समितियाॅ हैं जो निरंतर सम्बंधित विभागों से किसानों को जानकारी व मदद प्रदान कर सकती हैं ,हमे डेमों दिखना होगा। यानी करते हुए सीखने की प्रवृति विकसित करनी होगी,दोष मढकर निकल लेने से अब काम नही चलेगा।

सामाजिक कार्यकर्ता की नजर से पूर्वांचल का स्वास्थ्य कैसा है ?

स्वास्थ्य को लेकर पूर्वांचल में घोर लापरवाही है। पानी में तमाम रसायन घुल चुके हैं। खाद्य पदार्थ और पानी ने पूर्वांचल का स्वास्थ्य बिगाड़ दिया है। यह सब जानते हुए भी लोग दूषित पानी ही पीते हैं। स्वास्थ्य सेवायें अपने को असहाय बताते हुए रेंग रहीं है।

कौन जिम्मेदार है ?

सब जगह आप सरकार को दोष देकर अपनी कमी छुपाना चाहेंगे क्या यह सही है। आपको अपने नागरिक धर्म का पालन करना होगा,तभी आप अपने अधिकार के लिये लड़ पायेंगे। गाॅव मे 40 से 50 घर के बीच इंडिया मार्का हैण्डपम्प लगा होने के बावजूद हम कई नीजी कारण से उसका पानी नही पीते। सब कुछ जानते हुए बीमारी को खुली दावत देते हैं। पूर्वांचल की इस दशा के लिये हम स्वयं भी जिम्मेदार हैं क्योंकि जब तक उत्तरदायित्व का बोध नही होगा ,सिवाय दोष देने के कर्तब्य पालन व अधिकार के लिये लड़ाई मे हिस्सा नहीं ले सकेंगे।

क्या करना होगा ?

सीमित संसाधन के बीच पाजिटिव सोच बनानी होगी। स्वास्थ्य को लेकर समाज में बहुत लापरवाही है। स्वास्थ्य परीक्षण तभी होगा जब चिकित्सक कहेगा। हम गाॅवों मे स्वास्थ्य के प्रति लोगों को सुरक्षित रखने के लिये स्वास्थ्य बीमा को बढ़ावा दे रहें हैं। ग्राम पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य समिति की बैठक करवाकर लोगों के स्वास्थ्य का परीक्षण कराते हैं। यह पहल सार्थक है। प्रत्येक गाॅव में स्वास्थ्य परीक्षण कार्यक्रम होने चाहिए। ग्रामीण स्वास्थ्य व सुविधा के लिये लगभग 29 विभाग ग्रामसभा स्तर पर कार्य करते हैं ।उन्हें एकसाथ ग्रामसभा की बैठक में आकर समस्या निस्तारण का काम करना चाहिये। हमारा संवैधानिक अधिकार हमसे छिन रहा है। केवल ग्राम पंचायत स्तर का सरकारी कुनबा सक्रीय हो जाय तो हम इंसेफेलाइटिस से मासूमों को बचाने मे सफल हो जायेंगे। यह तभी होगा जब ग्राम सभा व उसके नागरिक अपने अधिकार के लिये लड़ने योग्य बनेंगे।

इंसेफेलाइटिस उन्मूलन/जागरूकता में आपका योगदान !

इंसेफेलाइटिस फैलने का सबसे बड़ा कारण है गंदगी। इसके लिये सरकार व आमजन सम्मिलित रूप से दोषी हैं। सरकारी महकमा समयबद्ध कार्यवाही नही करता और हम अपने नैतिक कर्तब्य का पालन नहीं करते। इसमे पंचायतीराज ब्यवस्था बहुत सहायक सिद्ध हो सकती है। हमने महराजगंज जनपद का चेहरी गाॅव को जो 54 टोले में विभक्त है उसे गोंद लिया। ’सेवा’ के स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं के शानदार प्रयास से यह गाॅव इंसेफेलाइटिस मुक्त हो गया। यहाॅ ग्रामसभा के स्वास्थ्य समिति की बैठक नियमित होती है।गाॅव का प्रत्येक परिवार सफाई का पूरा ध्यान रखता है। शाम को नीम की पत्ती का धुआॅ किया जाता है तथा बच्चों को पूरे आस्तीन का कपड़ा व शरीर पर नीम के तेल का लेपन किया जाता है। सेवा के तरफ से प्रत्येक परिवार को मच्छरदानी देने के अलावॅा 54 टोलों मे फागिंग कराई गई। मच्छररोधी पौधा गेंदे का फूल हर दरवाजे पर लगाया गया।यहाॅ सफाई के लिये लोग सरकार पर निर्भर नहीं रहते हैं। तत्कालीन कमीश्नर ने चेहरी माडल की तारीफ की। हलांकि ब्यवहारिक प्रयोग को वैज्ञानिक व चिकित्सकों ने नकार दिया।
इंसेफेलाइटिस को करीब से देखने के कारण मैं मासूमों को चुपचाप मरते हुए नहीं देख सकता था। ऐसे मे मैने हाईकार्ट मे पीआइएल दाखिल किया। सरकार ने शपथपत्र देकर कोर्ट को बताया कि सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र सुविधाओं से लैस है। मानवाधिकार में अपेील किया , डीजी हेल्थ को नोटिस भी गई मामला अधर में है। अंततः बालसंरक्षण आयोग जन सुनवाई के लिये मेरे पहल पर आया।देशभर में लोग जाने कि यहाॅ स्वास्थ्य का हाल क्या है,लेकिन सुनवाई के बाद अब सरकारी महकमा फिर उसी राह पर है। हमे सम्मिलित प्रयास से अब इसे एक आन्दोलन का रूप देना होगा।

वंचित समूहों के साथ आपने काम किया। उनके बीच सबसे बड़ी समस्या क्या है जिसे तत्काल दूर करना होगा ?

कुपोषण। हमने मुसहरो के बीच काम किया है। न्यूट्रिशनल पोषण उन तक नही पहुॅच रहा। उनका स्वास्थ्य बुरी तरह प्रभावित है। उनका रहन -सहन जागरूकता कार्यक्रम के बाद  बदला है। सेवा के कार्यकर्ता निरंतर निगरानी रखें हैं लेकिन ये निगरानी कब तक? हम स्वतंत्र रूप से मानव सेवा के प्रति अपने उत्तरदायित्व क्यों नही निभा पा रहे। जिम्मेदारों को क्यों बार-बार कटघरे मे खड़ा होना पड़ता है। शायद एक आन्दोलन की दरकार है।

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