जनोत्सव का विगुल बज गया, अब जनता की बारी आर्इ

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की रणभेरी बज गर्इ। 7अप्रैल से 12 मर्इ तक होने वाले इस महांसंग्राम का परिणाम 16 मर्इ को देश के सामने होगा। 16वीं लोकसभा का निर्वाचन 9 चरणों मे होना हैं। कुल ढ़ार्इ माह के लिए आदर्शे आचार संहिता लागू हो गर्इ है। इसके अंतर्गत प्रशासन के लोग सिर्फ नियमित काम-काज ही करेंगे। इस दौरान सरकार कोर्इै निर्णय नही ले सकती। इस बार सरकार चुनने के लिए देश में 81करोड़ 40 लाख मतदाता हैं। वर्ष 2009 के चुनाव में मतदाताओं की संख्या 71 करोड़ थी और चुनाव 5 चरण में सम्पन्न हुए थे। यानी 10करोण मतदाता बढ़े हैं। ये सभी युवा हैं।इन्हे तर्क करना आता है। ये कुछ समय से राजनीति को बहुत अच्छी तरह समझने की कोशिश कर रहें है। युवाओं में उपेक्षित मानी जा चुकी राजनीति अब अपनी जगह बना चुकी है। सबका ध्यान युवाओें पर है।यह और बात हैे कि विविधताओें वाले इस देश के कुछ हिस्सो मे जाति व धर्म की बात नेताओं को अनचाहे करनी पड़ जाती है। इस बार नेता वोट पाने के लिए और जनता मतदान करने के लिये चिलचिलाती धूप का भी सामना करेंगे।
उत्सव प्रधान भारतवर्ष की अपनी वैशिवक पहचान है। तमाम आंतरिक विभाजक रेखांएं खिचेी होने के बावजूद यह विश्व का सबसे सफल जनतंत्र माना जाता है। भाषा, पंथ, रीति -रिवाज, क्षेत्रियता, स्थार्इ हो चुके आधारभूत मुददे ; सब इस विशाल जनोत्सव का हिस्सा हैं। उत्सव में जो प्रत्यक्ष दिखेगाा वह है रोड शो ,पोस्टर, रैलियों में भींड़ और एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप कर बडे़-बड़े मंचों से विकास का उदघोष करते हमारे नेता। दूसरी तरफ समय-समय पर अलग-अलग झंण्डा बैनर थामे अलग-अलग नारे लगाते आशाभरी नजरें टिकाए खड़ी देश की जनता। वैसे लोकतंत्र के इस जनोत्सव में मतदाता मंद-मंद मुस्करा कर नेताओं का स्वागत कर रहा है। उसे बहुत सारे सवाल अपने नेताओं से करनें हैं। जनसंवाद से दूर रहने वाल,े उड़न खटोले से सीधे मंच सम्भालने वाले नेताओं की लम्बी दलीलों का जनता के सुलगते जज्बात पर कोर्इ असर नही दिख रहा। धनबल, जातिबल व बाहुबल इस महोत्सव मे कमजोर पड़ गया है। मतदाताओं मे प्रशन्नता है और सवाल भी। गरीबी, भ्रष्टाचार, मंहगार्इ और बेरोजगारी ये आमजन की समस्या है। 60वर्ष के लोकतंत्र में हर पाच वर्ष बाद ये मुददे दूने-चौगुने के गुड़क में बढ़ते ही रहे। आखिर कब तक इन मुददों पर चुनावी दुकान सजेगी,कोर्इ एक तो हल कर देते या इस देश की नियति ही यही है।
मतदाताओं के सामने देश में स्थार्इ सरकार देने की चुनौती है। जाति -धर्म की गणित इस बार हल होती नही दिख रही। क्षेत्रिय दल राष्ट्रीय बनने के लिए उतावले हैं। राषिट्रय दलों के समक्ष 272 का जादुर्इ अंक प्राप्त करने का कठिन लक्ष्य है। गठबंधन की सरकार बेचारी होती है। उसे घटक दलों के दबाव मे काम करना होता है। निर्वतमान सरकार इसका उदाहरण है। बीते वर्षों हुए चुनाव में मत प्रतिशत बढ़ा है जिससे उम्मीद है कि युवा व महिलायें मुखर होकर वोट करेंगे। यह लोकतंत्र के लिये सुखद संकेत है।
धनन्जय ब्रिज्

 

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