जब तक पकड़े ना गये तब तक इमानदार…!

देश -विदेश में नेशले कम्पनी का उत्पाद मैगी प्रतिबंधित हो गया। चलो अच्छा हुआ। खा़द्य पदार्थों पर निगरानी रखने वाली सरकार की संस्था को धन्यवाद! एक सवाल मन मे आता है और डर भी बना हुआ है कि जब इतने विश्वसनीय कम्पनी के उत्पाद का ये हाल है तो विश्व के सबसे बड़े बाजार मे अभी कितने उत्पाद सेहतमंद है! ख़ा़द्य उत्पाद पर सरकार कितनी गम्भीर है इसका अंदाजा लगा पाना कठिन है। फिर भी यदि समय रहते सभी खाद्य पदार्थ कड़ी निगरानी में जाॅच लिये जांय तो देश की सेहत से खिलवाड़ रुक सकता है। आयुरवेद को हर्बल कहकर छोड़े रखना हानिकारक हो सकता है/ इसी प्रकार यूनानी का भी तेल पानी की परख की जानी चाहिए। ये धर्म व देशी के आवरण में कहीं स्वास्थ्य का जनाजा ना निकाल दें। मेगी से भी खतरनाक खाद्य उत्पाद बाजार मे है क्योंकि सरकार के पहरुये कारोबारिसों को थपकी देकर पुचकारते रहते है ;ऐसा नही है तो मैगी इतने दिनों में कितना ‘ लैड ‘ बाजार में बेेंच दी और कितनें उससे प्रभावित हुए इसका आॅकड़ा किसी के पास है। एक रिर्पोट….

 

Maggi Noodles RecipeNew Delhi: काफी पहले की बात है। उपभोक्ता उत्पादों की एक जानीमानी कंपनी ने बाजार में ‘अंडों से बना शैंपू’ पेश किया। बस फिर क्या था, कुछ जगहों पर अंडे की कीमतें बढऩे लगीं। ऐसी अफवाह फैली कि शैंपू बनाने वाली कंपनी ने बाजार से सारे अंडे खरीद लिए हैं और अंडों की कमी हो गई है। कंपनी ने तत्काल स्पष्टïीकरण जारी करके कहा कि शैंपू में अंडे का इस्तेमाल बहुत मामूली मात्रा में किया गया है और बाजार पर उसका असर नहीं पड़ सकता। अब उस किस्से की समकालीन प्रासंगिकता पर बात करते हैं। एक खाद्य उत्पाद कंपनी से पूछा जा रहा है कि वह अपने उत्पाद में पिस्ता और बादाम के प्रयोग को स्पष्टï करे। ऐसा तब है जबकि ये दोनों पदार्थ कंपनी के उत्पाद में बहुत ही मामूली हिस्सा रखते हैं। कह सकते हैं कि यह मामला भी अंडे वाले शैंपू की याद दिलाता है। क्या ये दोनों ही मामले सामान्य विपणन नीति को परिलक्षित नहीं करते जिसमें कोई ब्रांड मामूली गुणात्मक अंतर के आधार पर अपने आप को दूसरों से अलग बताता है? उदाहरण के लिए यह कहा जाता है कि टूथपेस्ट से कोई खास फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि दांतों की सफाई का काम तो दरअसल ब्रश करने से होता है। अब आप पेस्ट में चाक इस्तेमाल करें या सिलिका, क्या फर्क पड़ता है? कुछ खाद्य उत्पाद लाइजिन के इस्तेमाल की बदौलत अपना प्रचार इस प्रकार करते रहे मानो उनके इस्तेमाल से बच्चों का कद बढ़ाने में मदद मिलती हो! बाद में पता चला कि एक चम्मच मटर के दानों में उस उत्पाद से ज्यादा लाइजिन होता है जिसका कंपनी प्रचार कर रही थी। Toothpaste-on-Brush

सवाल यह है कि जब ब्रांड ऐंबेसडरों को उनके द्वारा किए जा रहे प्रचार के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है (कंगना रनौत ने समझदारी का परिचय देते हुए गोरा करने वाली क्रीम का प्रचार करने से इनकार कर दिया) तो क्या ब्रांड मैनेजरों को भी उनके काम के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा? मैगी प्रकरण को देखा जाए तो यह विवाद कुछ उसी तरह बढ़ रहा है जिस तरह एक वक्त शीतल पेय में कीटनाशकों के इस्तेमाल का मामला उछला था। आने वाले दिनों में अन्य कंपनियां भी जांच के दायरे में आ सकती हैं। लेकिन एक बार हमने ऐसी शुरुआत कर दी (मेरे लिए यह स्वागतयोग्य है) तो हम आखिर कहां रुकेंगे? क्या उन लोगों के साथ भी मैगी नूडल्स मामले जैसा व्यवहार होगा जो उन आयुर्वेदिक उत्पादों का प्रचार करते हैं जिनमें लोहा बतौर घटक पड़ा हुआ है या फिर उनको लापरवाही का लाभ मिलेगा? पेटा (पीपुल फॉर एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स) से जुड़ी एक महिला ने टेलीविजन पर एकदम सही कहा था कि हम जो अंडे खाते हैं उनमें से अधिकांश पोल्ट्री उद्योग से आते हैं जहंा मुर्गियों के साथ अत्यंत क्रूर व्यवहार किया जाता है।

थेड़ा़ा हो हल्ला किया, फिर सो जाओ ; कब तक चलेगा ऐसे?

egg-pulaoयही वजह है कि पश्चिमी देशों में ऐसे अंडों की मांग बढ़ रही है जो बिना कैद में रखे जाने वाली मुर्गियों से हों (हालांकि ऐसा अध्ययन भी है जो कहता है कि बंधन में रहने वाले मुर्ग कम तनावपूर्ण जीवन जीते हैं!)। पश्चिमी मांस उत्पादन उद्योग द्वारा शूकरों तथा अन्य जानवरों पर की जाने वाली क्रूरताओं के बारे में काफी कुछ लिखा गया है। कोबे बीफ और लिवर पेट जैसे स्वादिष्टï और चर्चित उत्पाद तैयार करने में जो तरीके अपनाए जाते हैं, उन पर भी यह बात लागू होती है। भारत में क्रूरता और अधिक मूलभूत स्तर पर होती है। हमारे बूचडख़ानों की स्थिति और जानवरों को वहां पहुंचने वाले कष्टï के बारे में सोचिए। इतना ही नहीं क्या हमने जानवरों को मारने पर प्रतिबंध लगाने के असर के बारे में सोचा है? दक्षिणी ओडिशा से तटीय आंध्र प्रदेश की ओर बढऩे पर राजमार्ग पर जानवरों के झुंड के झुंड नजर आते हैं।

poultry बूढ़े, दुबले पतले और चलने में असमर्थ जानवर सैकड़ों किलोमीटर हांककर विशाखापत्तनम लाए जाते हैं जहां उनको ट्रकों में भरकर दक्षिण भारत के बूचडख़ानों में ले जाया जाता है। अगर उनको मरना ही है तो क्या उन्हें आखिरी लंबी लेकिन दर्दनाक यात्रा से बचाया नहीं जा सकता या उनको पहले ही ट्रक में नहीं लादा जा सकता? अगर उनको मारने पर प्रतिबंध है तो फिर दूध न देने वाली बूढ़ी गायों और काम के न रह गए बूढ़े बैलों का ख्याल कौन रखेगा? एक बार इस राह पर निकल जाने के बाद काम करने का एजेंडा बहुत व्यापक हो जाता है और उसका चौतरफा विस्तार हो जाता है। उस स्थिति में लॉबीइंग करने वाले सक्रिय हो जाएंगे, अधिक संख्या में अंडे उत्पादित करने वाले राज्य नहीं चाहेंगे कि पोल्ट्री उद्योग का सही ढंग से नियमन हो। रूढि़वादी लोग चाहेंगे कि आयुर्वेदिक उत्पादों को अलग छोड़ दिया जाए और आधुनिक बाजारविदों को लगेगा कि उपभोक्ताओं को मूर्ख बनाने की उनकी नीतियों में कुछ भी गलत नहीं है। कम से कम तब तक जब तक नूडल्स जैसा कोई मुद्दा सामने नहीं आ जाता।

                          Vaidambh Media

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