टीबी : कैसे हो ..पूरा कोर्स-पक्का इलाज !

हवा मे घूम रहे टीबी के वाइरस!

Gorakhpur :  तपेदिक से पीड़ित ब्यक्ति को इलाज की सख्त आवश्यकता होती है। tb spreadइसके लिये जरुरी नहीं कि सरकार व उसके बनाये तंत्र का इंतजार किया जाय। समाज को जागरुक रहने पर स्वास्थ्य के प्रति सदैव सचेत रहकर किसी भी बीमारी का मुकाबला आसानी से किया जा सकता है। तपेदिक शरीर के किसी भी अंग में हो सकता है। टीबी कई प्रकार की होती है। इसमें फेेंफड़े में कफ वाली टीबी ही सबसे खतरनाक होती है। इससे टीबी के विषाणु मरीज की खाॅसी के माध्यम से बाहर आते हैं और दूसरे लोगों को भी टीबी होने का खतरा बढ़ जाता है। चिकित्सक बताते हैं कि इसका सबसे बड़ा कारण है गलत दिनचर्या जिससे ब्यक्ति का इम्यून पावर यानि रोग से लड़ने की ताकत का कम हो जाना।

सभी हो रहे जागरुक हम क्येां नहीं ?

drugs and the inscription letters on the board

  who: 1.5 Million Deaths in 2014.

विश्व में सभी देश टीबी से निजात पाने के लिये अपने देश के नागरिकों को जागरुक बना रहे हैं।

इसी विश्वब्यापी अभियान को भारत में डाट्स के नाम से जानते हैं । इसमें मरीज के इलाज का पूरा प्रबंध होता है। यहाॅ मरीज के सुविधा मुताबिक दवा खिलाने का इंतजाम रहता हैं। टीबी के मरीज को इलाज बीच में नहीं छोड़ना चाहिए। क्योंकि इससे टीबी और खतरनाक हो जाती है तथा दवा भी लम्बी अवधि तक करनी पड़ती है।
टीबी के मुख्यतः पाॅच चरण होते है………

प्रथम
द्वितीय
एम डी आर
एक्स डीआर

टीडी आर

शहर-गाॅव सब जगह  स्थिति नाजुक  !    

हफतों खाॅसी आने को आज भी गम्भीरता से नही लिया जा रहा। गाॅव में हालात बदतर हैं डाट्स प्रोवाइडर को माना जाता है कि शहरी क्षेत्र में एक्टिव हैं गांवो में सिथिल !tb lethal in india जबकि दोनो ही जगह स्थिति नाजुक है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के कमोबेश सभी जनपद ऐसी ही समस्या से ग्रसित है। कारण पूछने पर अलग- अलग समस्या बताई जाती है। महराजगंज जनपद के कई पीएचसी का हाल ऐसा ही है। गोरखपुर के खोराबार क्षेत्र स्थित बेलवार न्यू पी एच सी की हालत भी अति दयनीय है वहाॅ चिकित्सक तब पहुॅचते हैं जब बहुत जरुरी हो वरना वह गोरखपुर शहर में ही प्राइवेट प्रेक्टिस करते हैं और पगार सरकार से लेते है। ऐसे वह अकेले चिकित्सक नही हैं। जबकि सरकार ने उन्हे सरकारी आवास करोडा्रे रुपये खर्च कर बनवा कर दिये है। जब स्वास्थ्य केंद्रों पर चिकित्सा प्रभारीयों का ये हाल है तो मातहत कितने समयबद्ध होंगे बताने की जरुरत नहीं। आज भी बहुत सारे टीबी केन्द्रोें पर वार्ड ब्वाय चिकित्सक की जिम्मेदारी पूरी करता है। एक बात तो स्पस्ट है कि टीबी मरीज की काउंसलिंग नही की जाती। महराजगंज के न्यू पी एच सी श्यमदेउरवाॅ मे बेलवा ग्रामसभा में कुल 10 टीबी मरीज हैं जिनमें से 4 क्योर हो चुके हैं।

 केस हिस्ट्री स्टडी का महत्व नही समझ रहे चिकित्सक व काउंसलर!

जिनकी दवा चल रही है उनमें से फेकू विश्वकर्मा व राधेश्याम प्रजापति क्योर होने के 4साल बाद पुनः मरीज हो गये।tb patient feku जाॅच पडताल के बाद पता चला कि इस समय किस स्टेज की दवा चल रही है यह उन्हे नही पता । उनकेे टीबी इलाज कार्ड पर पूर्व्र में चली दवा अथवा कयोर होने की कोई सूचना नही थी। जाहिर है मरीज की काउंसलिग व केस हिस्ट्री की स्टडी नही हुई । चिकित्सक अपने मुताबिक दवा शुरु कर दिये! 59 वर्षीय फेकू उन तमाम टीबी मरीजों के उदाहरण हैं जिन्हे क्योर होने के 5 साल बाद जब पुनः टीबी हुई । फिर भी वह महीनों यह नही जान सके कि उनको टीबी हो गई है। यह घटिया काउंसलिंग की ही देन है। वर्तमान में उनकी प्रथम चरण की दवा चल रही है जो लगभग 6 माह हो गये। जबकि उन्हे कटेगरी सेकेण्ड की दवा चलनी चहिए। ऐसी लापरवाही से एम डी आर टीबी का खतरा बढ जाता है। खेती किसानी करने वाले फेकू समझदार ब्यक्ति हैं उनकी काउंसलिंग ठीक से हुई होती तो वह दुबारा सतर्क रहते! यदि मरीज व उसके परिवार की काउंसलिंग ढंग से की गई होती तो सम्भव है कि उसे व उसकी पत्नी तथा मित्र राधेश्याम प्रजापति को दुबारा टीबी नही हुई होती।

फालोअप स्पूटम इग्जामीनेशन का भरपूर अभाव !

tb kendr gajiyabadमहराजंगज जनपद की न्यू पीएचसी श्यामदेउरवाॅ के प्रभारी चिकित्सक डा0 एके मणि कहते हैं कि क्षेत्र में एम डी आर मरीज बढ रहे हैं। प्रश्न है क्यों ! उनका जवाब था जागरुकता की कमी । फालोअप स्पूटम इग्जामीनेशन का भरपूर अभाव इन क्षेत्रों में देखा जा सकता है। ये लापरवाही जिलें के हर स्वास्थ्य केन्द्रों पर देख सकते है। काउंसलर का टका सा जवाब इस संदर्भ में होता है साहब ! बहुत कम बजट है किसी तरह अभियान सम्पन्न हो जाय वही बहुत है।

जो जागरुक है  उन्हे, क्यों नही कुछ बताते साहब!
बेलवा गाॅव कई मायने में अहम है। यहाॅ सभी कामकाजी और औसत दर्जे के लोग रहते है। जागरुक भी है।tbcare-pic एक सामाजिक संस्था सेफ सोसाइटी के कार्यकर्ता यहाॅ सार्थक कार्य करते मिले। कार्यकर्ता राममिलन ने बताया कि उसके गाॅव का पेय जल दूषित है पर कोई ध्यान नही देता। गाॅव में जब टीबी मरीज ज्यादे दिखने लगे तो इन लोगों ने संस्था के मदद से स्वयं काउंसलिंग करनी शुंरु की और क्योर पेसेण्ट को इस टीम का हिस्स बनाया जिसका फायदा उन्हे मिला। अब मरीज चिकित्सक से यह सवाल करता है कि जाॅच मे क्या निकला साहब!

फालोअप टेस्ट ; पर्चे मे दर्ज करना क्यों भूल रहे चिकित्सक ?
एक- एक परत कुरेदने पर पता चला कि फेकू की पत्नी को भी 7साल पहले भी टीबी हुआ था। Captureऔर दवा भी चली। जिन परिवारों में टीबी दुबारा हो रही है संस्था के लोग इस पर खासा घ्यान दे रहे हैं कि उन्हे तुरन्त स्वस्थ्य लाभ व काउंसलिग दी जाय! फेकू मई 2015 से टीबी जाॅच के बाद दवा खा रहे है। 6 माह बीत चुके पर उनके पर्चे में कही फालोअप टेस्ट की जानकारी नही है। जबकि नियमानुसार पुनः बलगम जाॅच या एक्सरे कराके मरीज के पर्चो में इलाज समाप्त किये जाने का कारण अंकित करना अनिवार्य है! टीबी इलाज वाले पर्चे पर स्पष्ट देख सकते हैं कि समय -जाॅच-तिथि- परिणाम  लिखा होता है। जिसमें चिकित्सक को चिक्त्सिा विवरण भरना होता है। इलाज के दौरान इम्प्रुवमेण्ट जाॅचने के लिये प्रत्येेक दो माह पर मरीज का बलगम या एक्सरे जाॅच तथा वजन की जानकारी की जाती है। जिसकी रिपोर्ट बकायदा पर्चे मे दर्ज करना होता है। दुर्भाग्य से चिकित्साकेन्द्रो पर इसका भी अभाव है।

मारना ही होगा बहानासाइटिस का वाइरस!
इस गाॅव के लोगों में जागरुकता बहुत है। चिकित्सा क्षेत्र की जनसुनवाई में इस गाॅव के लोगों ने पेय जल अशुद्धता पर एनसीपीसीआर को मजबूर कर दिया कि वह इस समस्या को प्राथमिकता दें। tb safe इनकी बातें सुनी गई और कार्यवाही हुई। सरकारी हैण्डपम्पो पर दबंगों का अवैध कब्जा था तत्कालीन जिलाधिकारी सौम्या अग्रवाल के नेतृत्व में सारे पम्प रातोरात कब्जा मुक्त कराये गये। इसके बाद भी जागरुकता का अभाव का रटारटाया आरोप लगाकर स्वस्थ्यकर्मी बचने की कोशिश करते हैं तो उनके इस बहानासाइटिश का इलाज अतिशिघ्र्र कर देना चाहिये । क्योकि यह बहुत खतरनाक वाइरस है यही डाट्स को सबसे जादा प्रभावित कर रहा है।

Vaidambh Media

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