तानाशाही हुकूमत का विरोध है मुहर्रम !

  इस्लाम एक ऐसा धर्म है। अगर कोई भी व्यक्त‍ी सही नियमों से इस धर्म का पालन करें और मोहम्मद पैगम्बर की बातों को अपनी निजी जिन्दगी में उतार लें चाहे वो उन नियमों का अपनाने में थोडा बहूत आलसी किस्म का है। लेकिन थोडा सा भी अमल करले तो उसकी जिन्दगी में अल्लाह की तरफ से कोई शिकायत नहीं रहती क्योंकि अल्लाह ये बात नहीं कहता कि तुम इस्लाम बनो ओर ना ही ये बात कहते हैं कि तुम मेरी इस सभा में रोज सामिल हो लेकिन उन्होनें तो इक मुसलमान से तो बस थोडा सा ही वक्त मांगा है। वो भी जुम्में की दोपहर को। क्या हो जाता है की अगर कोई मुसलमान सप्ताह के इक दिन जूम्में के दिन में दोपहर को आराम न करें तो वो आदमी मर नहीं जाता और कोई कठिन कार्य के लिए भी नहीं कहा है। ना कि तुम मेरे लिए कोई ऐसा काम करों जिससें आपको काफी मेहनत भी करनी पडे् लेकिन हां मस्जिद में जाकर दोपहर केवल 30 मिनट ही नमाज पढ् ले तों वो और उसके अन्दर कोई भी किसी भी प्रकार का परिवर्तन भी तो नहीं होता। मेरी मानों तो दोस्तों इस्लाम को किसी भी प्रकार का खतरा है तो वो इक खुद किसी मुसलमान से है जो दिन में नमाज नहीं पढता अगर इस कोम को कोई खतरा है तो वो है इस्लाम व पैंगम्बर में बनाये नियमो का पालन न करनें वालो लोगों से ही  हैा
गजेन्द्र सिंह पवांर 

 

मुहर्रम के दिनों में रखते हैं उपवास !

  Hyderabad :   मुहर्रम (Muharram) शहादत का त्यौहार माना जाता हैं , इसका  इस्लामिक धर्म में बहुत अधिक महत्व  हैं |matam यह इस्लामिक कैलंडर का पहला महीना  होता हैं,  इसे पूरी शिद्दत के साथ अल्लाह के बन्दों को दी जाने वाली शहादत के रूप में मनाया जाता हैं | यह पवित्र माह रमजान के बाद का  सबसे पवित्र महीना माना जाता हैं | मुहर्रम (Muharram) हिजरी संवत का पहला महीना हैं | इस्लाम में  चार महीनो को महान माना जाता हैं | मुहर्रम के दिनों में भी कई मुस्लिम उपवास भी करते हैं |
आशुरा (Day Of Ashura)

इस माह के 10 दिन तक पैगम्बर मुहम्मद साहब के वारिस इमाम हुसैन की तकलीफों का शोक मनाया जाता हैं लेकिन बाद में इसे जंग में शहीद को दी जाने वाली शहादत के जश्न के तौर पर मनाया जाता हैं और ताजिया सजाकर इसे जाहिर किया जाता हैं | इन दस दिनों को इस्लाम में आशुरा (Day Of Ashura)कहा जाता हैं |

तख्तो ताज जीत कर भी  लड़ाई हार गया यजीद  !

यह समय सन् 60 हिजरी का था | कर्बला जिसे सीरिया के नाम से जाना जाता था | वहाँ यजीद इस्लाम का शहनशाह बनना चाहता था जिसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया | सभी को अपने सामने गुलाम बनाने के लिए उसने यातनायें दी | muharram karbalaयजीद पूरे अरब पर अपना रुतबा चाहता था लेकिन उसके तानाशाह के आगे हजरत मुहम्मद का वारिस इमाम हुसैन और उनके भाईयों ने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया| उस दिन से आज तक मुहर्रम के महीने को शहीद की शहादत के रूप में याद करते हैं | बीवी बच्चो को हिफाज़त देने के लिए इमाम हुसैन मदीना से इराक की तरफ जा रहे थे | तब ही यजीद ने उन पर हमला कर दिया | वो जगह एक गहरा रेगिस्तान थी जिसमे पानी के लिए बस एक नदी थी जिस पर यजीद ने अपने सिपाहियों को तैनात कर दिया था | फिर भी इमाम और उसके भाईयों ने डटकर मुकाबला किया | वे लगभग 72 थे जिन्होंने 8000 सैनिको की फोज़ को दातों तले चने चबवा दिये थे | ऐसा मुकाबला दिया कि दुश्मन भी तारीफ करने लगे | लेकिन वे जीत नही सकते थे वे सभी तो कुर्बान होने आये थे | दर्द, तकलीफ सहकर भूखे प्यासे रहकर भी उन्होंने ने लड़ना स्वीकार किया और यह लड़ाई मुहर्रम 2 से 6 तक चली आखरी दिन इमाम ने अपने सभी साथियों को कब्र में सुलाया लेकिन खुद अकेले अंत तक लड़ते रहे | यजीद के पास कोई तरकीब न बची और उनके लिए इमाम को मारना नामुमकिन सा हो गया | मुहर्रम के दसवे दिन जब इमाम नमाज अदा कर रहे थे तब दुश्मनों ने उन्हें धोखे से मारा | इस तरह से यजीद इमाम को मार पाया लेकिन हौसलों के साथ मरकर भी इमाम जीत का हकदार हुआ और शहीद कहलाया | तख्तो ताज जीत कर भी ये लड़ाई यजीद के लिए हार एक बड़ी हार थी |

मुहर्रम का तम क्या हैं ?
मुहर्रम का पैगाम शांति और अमन ही हैं |Peace युद्ध रक्त ही देता हैं | कुर्बानी ही मांगता हैं लेकिन धर्म और सत्य के लिए घुटने न टेकने का सन्देश भी मुहर्रम देता हैं | लड़ाई का अंत तकलीफ देता हैं इसलिए यह दिन अमन और शांति का पैगाम देते हैं |

मुहर्रम कैसे मनाते हैं ?
•  इसे पाक महिना माना जाता हैं | इस दिन को शिद्दत के साथ सभी इस्लामिक धर्म को मानने वाले मनाते हैं |
•  इस दस दिनों में रोजे भी रखे जाते हैं | इन्हें आशुरा कहा जाता हैं |
•  कई लोग पुरे 10 दिन रोजा नहीं करते | पहले एवम अंतिम दिन रोजा रखा जाता हैं |
•  इसे इबादत का महिना कहते हैं | हजरत मुहम्मद के अनुसार इन दिनों रोजा रखने से किये गए बुरे कर्मो का विनाश होता हैं | अल्लाह की रहम होती हैं | गुनाह माफ़ होते हैं |

मुहर्रम ताजिया क्या हैं ?
muharram Varanasiयह बाँस से बनाई जाती हैं यह झाकियों के जैसे सजाई जाती हैं | इसमें इमाम हुसैन की कब्र को बनाकर उसे शान से दफनाने जाते हैं | इसे ही शहीदों को श्रद्धांजलि देना कहते हैं इसमें मातम भी मनाया जाता हैं लेकिन फक्र के साथ शहीदों को याद किया जाता हैं | यह ताजिया मुहर्रम के दस दिनों के बाद ग्यारहवे दिन निकाला जाता हैं इसमें मेला सजता हैं | सभी इस्लामिक लोग इसमें शामिल होते हैं और पूर्वजो की कुर्बानी की गाथा ताजियों के जरिये आवाम को बताई जाती हैं | जिससे जोश और हौसले की कहानी जानकर वे अपने पूर्वजो पर फर्क महसूस कर सके |

मुहर्रम के मौके पर ताजिया जुलूस
taziyaताज़िया बाँस की खपाचों पर रंग-बिरंगे कागज, पन्नी आदि चिपका कर बनाया हुआ मकबरे के आकार का वह मंडप जो मुहर्रम के दिनों में मुसलमान( शिआ)  लोग हजरत इमाम हुसेन की कब्र के प्रतीक रूप में बनाते है और जिसके आगे बैठकर मातम करते और मासिये पढ़ते हैं। ग्यारहवें दिन जलूस के साथ ले जाकर इसे दफन किया जाता है। ताजिया हजरत इमाम हुस्सैन कि याद मे बनाया जाता है। इस्लाम मे कुछ लोग इस कि आलोचना करते हैं ;  मगर ये तजियदारि बहुत शान् से होती है।  हिन्दु  भी पुन्य मानकर इसमें हिस्सा लेते है और तजिया भी बनाते हैं। हिन्दू की सबसे अच्छी तजियदारि जावरा मध्याप्रदेश मे होती है ! यहा ताजिये बास से नहि  बल्कि शीशम व सागौन की लकड़ी के बनाये जाते हैं  ,  जिस पर काॅच और माइका का काम होता है  । जावरा मे ३०० से ज्यादा (१२ फिट) ताजिया बनते हैं।

Vaidambh Media

 

Previous Post
Next Post

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

hogan outlet online scarpe hogan outlet nike tn pas cher tn pas cher nike tn 2017 nike tn pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher