थोड़ा हम समझें थोड़ा आप तभी बनेगी बात

मित्रों, सामाजिक ब्यवस्था मनुष्य के जीवनयात्रा मे क्या स्थान रखती है इसे साधारण से साधारण ब्यकित भी समझता है।माता-,पिता, सगे- ,सम्बंधी ,बच्चे, क्षेत्र-जवार ,पाप-दोष, आदर्श  सभी समाज की देन हैं। इस ब्यवस्था में मनुष्य ही नही सृषिट की समस्त संरचना रहती है। तमाम अदभुत  वैज्ञानिक घटनाओं के बाद मनुष्य का वर्तमान  स्वरुप हमें प्राप्त हुआ है। जीवों में हम सबसे शसक्त समाज है। हमीं हैं जो र्इश्वर पर उगली उठाता है,र्इश्वर बनने की कोशिश करता है।ब्यर्थ है हमारा प्रयास!पहले  सही मनुष्य तो बन लें! सभी धर्मग्रंथों ने भगवान को भक्तों के अधीन बताया है,फिर भी समय-समय पर ब्यर्थ प्रयास करते रहतें हैं। आज समाज टुकड़ों मे सामने आता है- कभी जातिगत,कभी धार्मिक,कभी अमाीर ,कभी गरीब,कहीं बलवान तो कहीं असहाय। कल्पना कीजिये जिसे पता ही नही है वह किस समाज से है उसके लिये समाज के ठेकेदारों ने क्या ब्यवस्था की है। उसे सहानुभूति का एक निवाला देकर कोहराम मचाया जा सकता है। यहा हम किसे दोष दें। चिंता और उसके साथ ही सैकड़ो प्रश्न जब दिमाग स्वयं की शरीर से करने लगता है तो बाकी के अंग जवाब नही दे पाते। मुझे लगता है कि समाज को सही दिशा में ले जाने की सार्थक पहल से अब वही लोग बच रहें हैं जिनके कंधों पर समाज को स्वस्थ रखते हुए आगे ले जाने की जिम्मेदारी है। इनके बीच सम्भवत: वही सिथति  बनी हुर्इ है जो मेरे दिमाग व शरीर के बाकी अंगों के बीच है, अपनी जिम्मेदारी से बच निकलने की सफाइगोर्इ।
क्या सारी जिम्मेदारी दिमाग पर थोपी जा सकती है ! बाकी के अंग मनमानी के लिये स्वतंत्र हैं! बिल्कुल नहीं। समाज जिनसे बना है उसमे आप,हम और वो सब शामिल हैं। ऐसे में गलती थोपकर हम सामाजिक विकृति ही बढ़ातें हैं। इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि गलत करने वाला दोषी नही है। गलत बातों के बाजार मूल्य में बृद्धि करने वाले वे लोग जिनसे उस ब्यकित व घटना का कोर्इ लेना देना नही है समाज मे सबसे अधिक हैं। हर वह परिवार जो पैसे को महत्व देने मे अपने कर्तब्य भूल जाता है उसके परिवार में दु:ख व अपराध के सिवा कुछ भी देखने को नही मिलता।फिर भी वे झूठी शान में सालो-साल देश के न्यायालायों को गुमराह करते रहतें हैं।ें  मुकदमों को लम्बे समय तक बेतुकी दलीलोें व बयानों  के भरोसे  उलझाकर रखने वाले लोगों ने कभी पीछे खड़ी लाइन पर गौर क्यों नही किया।न जाने कितने मजलूम न्यायालय की सीढ़ी पर वर्षेां एकटक न्याय की राह निहारते गुजारते रहे। देश के विद्वजन , मार्गदर्शक इस बात पर आख मूंद कर क्यों बैठें है,विकासवाद की दौड़ में हम कबिलार्इ बनते जा रहें हैं।ें हर वर्ग का पढ़ा लिखा नौजवान आज भटकाव की राह पर हैर्।उसे भटकाने वाले राजनीतिक ठेकेदार उसकी जातिमरिचिका से आते हैं। यहा आपको सावधान रहना होगा साथियों!
समाज को नियंत्रित करने वाली इकार्इ- सरकार,लोकसेवक,कर्मचारी,जनप्रतिनिधि क्या इन्हे मौकापरस्ती का प्रशिक्षण दिया जाता है! वैधानिक रुप से तो कत्तर्इ नहीं। फिर न्यायालय में आबादी से  अधिक मुकदमें क्यों ?समाज अभी इतना विकृत नहीं हुआ है कि अराजकता स्थान पाये। निशिचत तौर पर समाज के नियंत्रक राग-द्वेश मे लिप्त होकर अपने कतब्यों का निर्वहन कर रहें हैं।जातिगत बात विधि की दृषिट में गुनाह है। हमारे सरकारी तंत्र ये गुनाह कर सकते है। हमारे परिचय में भारतीय होने के अलावा धर्म व जाति अनिवार्य रुप से लिखा व  पूुछा जाता हैं यह हमारे देश की अनिवार्य प्रकि्रया है। क्या वैशिवक स्तर पर हमे अपनी पहचान बताने के लिये भारतीय होने के अतिरिेैक्त जाति- धर्म से अवगत कराने की आवश्यकता होती है? देश व समाज एकसूत्र मे कैसे बधें इस पर ध्यान केदि्रत करने का वक्त है। आधारभूत सुविधाओं मे ठोस कदम उठाने के बजाय वर्षों से गरीब व उसकी मजबूरी को चुनावी बाजार मे निलाम किया जाता रहा है।  गरीबी मिटाने के र्फामूले ने गरीब के चूल्हे मे हमेशा पानी ही डाला है। गरीब को बेचारा समझ उसकी झोली मे दया की भीख डालना कब बंद होगा? यह विडम्बना नही तो फिर क्या है कि प्रत्येक  देशवासी  देश का  नागरिक नही बन पाया। कोर्इ बनटांगिया तो कोइ आदिवासी ,कोइ पुश्तों से गाव में निवास करने के बाद भी देश की नागरिकता पाने के लिये संघर्ष कर रहा है।
समाज के हमसभी जन, लोलुपता के शिकार है। हर क्षेत्र के विकास मे वहा की प्राकृतिक संरचना का सहयोग सर्वाधिक रहा है। सरकार व समाज जब कंधे से कंधा मिलाकर प्रकृति के सानिध्य में विकास का मार्ग ढूंढेंगे तभी देश आगे बढ़ेगा। शिक्षा,स्वास्थ्य,आवास गरीबी व बेरोजगारी का हैवा खड़ाकर  हर बार जनता की सहानुभूति बटोर सरकार बनाने की बेहयायी से बाहर निकलने का वक्त है। हर एक को पहले खुद से फिर सामने वाले से सवाल का वक्त है।दूसरे के धर्म की बुरार्इयों को गिनाने से पहले उसकी अच्छार्इ जानने का वक्त है।जातिगत ब्यवस्था,उसकी उस काल के हिसाब से आवश्यकता फिर पतन ,दुष्परिणाम , पुन:आज की सिथति का मुल्यांकन कर भेद-भाव से रहित समाज बनाने की आवश्यकता है। यदि ऐसा नही कर सकते तो हमे विकास की बात करनी बंद कर देनी चाहिये ।ऐसे मेेेेेें मेरे सभी आरोप-प्रत्यारोप का सिर्फ एक जवाब ‘थोथा चना बाजे घना’।  जय हिंद
धनंजय  बृज
गोरखपुर

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