दशानन मंदिर: यहाॅ होती है लंकाधिराज रावण की आरती !

   रावण से मन्नतें मांगते हैं श्रद्धालु !

Ravana_British_Museum

Ravan in British museum

Kanpur: रावण समस्त विद्या-वैभव से परिपूर्ण था। अर्थात वह ईश्वर को प्राप्त करने का सामर्थय रखता था। यथार्थ कहें तो रावण , मनुष्य का सर्वोत्तम चरित्र है। आज दुनियां भर में बुराई मिटाने के लिये रावण का पुतला दहन होता है। सभी उसे जलते हुए देखते हैं ; पर किसी को यह भान भी नही होता कि जो रावण वह जलते हुए देख रहे हैं वह शरीर है आत्मा नहीं ! आत्मा तो अमर है उसे पवित्र बनाये रखना हमारा दायित्व है वरना रावण के गुण मिश्रण होते देर नही लगेगी । आत्मा अविनाशिता का पालन करती है . शायद ऐसे ही विचारों से प्रभावित एक विद्वान ने महापंडित रावण का मंदिर स्थापित किया । दशहरे पर पूरे देश में अच्छाई पर बुराई की विजय के रूप में भगवान राम की पूजा होगी और हर जगह रावण के पुतले का दहन किया जाएगा। लेकिन उत्तर प्रदेश में कानपुर के शिवाला इलाके में स्थित दशानन मंदिर में लंकाधिराज रावण की पूजा और आरती होगी। यहां श्रद्धालु रावण से मन्नतें मांगते हैं ।
साल में एक बार खुलते हैं मंदिर के पट
बड़े फख्र से जलता है रावण ! कहावत है – एक लाख पूत सवा लाख नाती ता रावण घ्रर दिया ना बाती !

Kakinada is a city in Andhra Pradesh and the only place in the Andhra Pradesh where Ravana was worshipped

Kakinada is a city in Andhra Pradesh and the only place in the Andhra Pradesh where Ravana was worshipped

शायद यह प्रतीक था मन के भीतर सहस्त्रों रावण के लिये ; बुराई के रुप मे रावण को जलाने का प्राविधान इसी कारण से बना होगा..! तभी तो रावण का प्रतीक स्थापित करने का खयाल किसी विद्वान के मन में आया । प्रमाणिक तौर पर, इस दशानन मंदिर का निर्माण 1890 में हुआ था । इसके दरवाजे साल में केवल एक बार दशहरे के दिन सुबह नौ बजे खुलते हैं। मंदिर में स्थापित रावण की मूर्ति पुजारी द्वारा सफाई की जाती है। उसके बाद श्रृंगार किया जाता है । इसके बाद रावण की आरती उतारी जाती है। दिन भर मंदिर श्रद्धालुओं के लिए खुला रहता है, लेकिन शाम को रावण का पुतला दहन होने के बाद इस मंदिर के दरवाजे एक साल के लिए बंद कर दिए जाते हैं। यहां पूजा अर्चना के लिए देश भर से हजारों लोग आते हैं। इस मंदिर के एक दिन खुलने के पक्ष में कोई तथ्य स्पष्ट नही है पर सम्भव है 359 दिन मदिर बंद होने का कारण बुराई हो और एक दिन जब खुलता हो वह उसकी अच्छाई हो।
 125 साल पुराना है रावण मंदिर
मंदिर के संयोजक केके तिवारी ने बताया कि शिवाला इलाके में कैलाश मंदिर परिसर में भगवान शिव के मंदिर के पास ही लंकेश का मंदिर है। ravan-- यह करीब 125 साल पुराना है। इसका निर्माण महाराज गुरू प्रसाद शुक्ल ने कराया था। यहां हजारों श्रद्धालु पूजा अर्चना करते हैं। वह बताते हैं कि रावण प्रकांड पंडित होने के साथ भगवान शिव का परम भक्त था। इसलिये शक्ति के प्रतीक के रूप में यहां कैलाश मंदिर परिसर में रावण का मंदिर बनाया गया था। रावण की आरती के बाद श्रद्धालु सरसों के तेल का दीपक जलाकर प्रार्थना करते हैं।

देश में और भी हैं रावण मंदिर जहाॅ विधि विधान से होती है रावणपूजा।

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Ravana is also worshiped in Ravana Rundi in Mandsaur district and Shajapur district’s Bhadkhedi.

इंदौर का जय लंकेश मित्र मंडल पिछले चालीस साल से दशहरे पर रावण की पूजा कर रहा है. यह संगठन रावण को ‘भगवान शिव का परम भक्त’ और ‘महाविद्वान’ मानता है.संगठन के प्रमुख महेश गौहर ने बताया कि इस बार भी दशहरे पर पूरे विधि-विधान से रावण की पूजा.अर्चना की गयी. इस मौके पर ‘रावण संहिता’ के पाठ और कन्याओं के पूजन के साथ हवन और प्रसाद वितरण भी किया गया. गौहर ने कहा, ‘हमने लोगों से विनम्र अनुरोध किया है कि वे हमारे आराध्य रावण का दशहरे पर पुतला न फूंकें. इससे पर्यावरण को भी फायदा होगा.’
मंदसौर का दामाद था रावण
ravanMandir2 यहां से कोई 200 किलोमीटर दूर मंदसौर में किंवदंती है कि रावण की पत्नी मंदोदरी का मायका इस नगर में ही था यानी रावण मंदसौर का दामाद था. मंदसौर के खानपुरा इलाके में रावण की प्रतिमा स्थापित है और नामदेव समुदाय अपनी प्राचीन मान्यताओं के चलते इसकी पूजा करता है. सामाजिक कार्यकर्ता अनिल त्रिवेदी देश में रावण की पूजा के चलन को ‘भक्ति की स्वतंत्रता’ के रूप में देखते हैं.

यहाॅ पैदा हुआ था दशकंधर ,बन रही विशाल मुर्ति

bisharakhगौतमबुद्ध नगर जिले के विषराख ब्लाक का 5हजार से अधिक आबादी वाला गाॅव विशराख जहाॅ रावण का बचपन बीता वहाॅ रावण के गुणों का बखान किया जाता है पर विजयादशमी के दिन शोक जैसा माहौल रहता है। यहाॅ गाव में पूरे दिन रावण की पूजा होती है। यहाॅ रावण का बचपन बीता था। यह गाॅव लगभग 1हजार वर्ष पुराना है। यहीं राक्षसकुमारी कैकसी का विवाह रावण के पिता विश्वेश्रवा के साथ सम्पन्न हुआ था। यहीं कुम्भरण व विभीषण भी पैदा हुए थे। 2 करोड़ की लागत से यहाॅ रावण मंदिर एक पंजीकृत संस्था द्वारा निर्माणाधीन है। संस्थाध्यक्ष अनिल कौशिक बताते है कि इसमें रावण की आदमकद मुर्ति जयपुर से लाई जानी है साथ ही 42 फुट का विशाल शिवलिंग भी यहाॅ स्थापित किया जाना है।

रावण के गाॅव मे नही होती रामलीला !
इस गांव में कभी रामलीला का आयोजन नहीं किया जाता है और न ही रावण को जलाया जाता है। बिसरख में रामलीला करने पर आने वाली आफत के पीछे यह मान्यता है कि यहां रावण ने जन्म लिया था। ravan ka ganvकिंवदंती के अनुसार रावण ने यहां के शिव मंदिर और गाजियाबाद के हिरण्यगर्भ मंदिर एवं दूधेश्वर नाथ महादेव मंदिर में शिव की तपस्या की थी। मंदोदरी से विवाह करने के बाद रावण परिवार सहित लंका चला गया था। पुराणों में बिसरख का प्राचीन नाम विश्वेश्वरा बताया गया है। जिसके बारे में यह बताया जाता है कि त्रेता युग में प्राकृतिक आपदा के कारण यह गांव पृथ्वी में समा गया। पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा करायी गयी खुदाई में इस गांव से कई शिवलिंग प्राप्त हुए हैं। यहां प्राप्त होने वाले शिवलिंग अष्ट भुजाओं वाले हैं जो अन्य कहीं पर नहीं हैं। रावण की जन्म स्थली होने की मान्यता के कारण इस गांव के लोग विजया दशमी के दिन जब पूरा देश रावण दहन का जश्न मनाता है ये अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए रावण की पूजा में लगे रहते हैं।
Vaidambh Media

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