दहेज दानव से मुक्ति के लिये स्वस्थ परिवार का मुखिया बनें, कानून के पास नहीं है ईलाज !

बहू -पत्नी के प्रति हमारी सामाजिक जिम्मेदारी क्या है ?

New Delhi :  हमारे देश में सदियों पुरानी परम्परा दहेज, प्रताड़ना का विशाल बटबृक्ष बन चुकी है । तमाम कानून और जागरुकता कार्यक्रम व सरकारें इस कुप्रथा के सामने बौनी साबित हुई है। आंकड़ों की बात करे तो प्रतिदिन लगभग 21 लड़कियां आये दिन आज भी दहेज दानव का शिकार हो रही हैं। आये दिन औसतन 300 से ज्यादा दहेज के मुक़दमे थानों में पंजीकृत हो रहे हैं। हमारी सामाजिक जिम्मेदारी क्या है ? बहू व पत्नी के प्रति हमारा कर्तब्य क्या है ? क्या हम एक अपनी ईच्छा थोपने के लिये एक बंधुआ नौकरानी ब्याह कर घर में लाते हैं ! इसी मानसिकता से एक परिवार दूसरे परिवार से आज भी जुड़ रहा है? यदि ऐसर ही है तो हमें आदर्श व संविधान तथा सभ्य मानने का ढोंग करने के बजाय खुद को बहसी घोषित कर देना चाहिये। कैसे सामाजिक माहौल में और किन रीति-रिवाजों के चलते हम अपनी बेटियों को जन्म दे रहे हैं और उनकी शादियां कर रहे हैं यह संकट उत्पन्न करने वाला है। इससे समाज ,ब्यक्ति , परिवार, देश सभी तबाह हैं।
जन्म लेने के बाद से ही अपनी ही बच्चीं को पराया धन बताकर परवरिश करने वाले परिवार कम नहीं हैं। उसकी शादी हो जाने के बाद कुछ ढपोरसंखी उपदेशक चाचा टाइप के लड़की के काॅन में यह कहना नहीं भूलते कि अब वही तुम्हारा घर है वहाॅ से हॅसी -खुशी आनां नही ंतो मत आनां। वहीं मर जानां। क्या ये उपदेशक पहले से मान बैठे हैं कि हमारी बिटिया के साथ जुल्म होगा? यदि हाॅ तो इनसे बड़ा साजिशकर्ता कौन होगा। ये दहेज के लालची से कहीं ज्यादा कमीने विचार के लोग हैं। ये बेटी का ब्याह नहीं सौदा करतेें हैं। उसकी लाशों पर बोली लगाकर दहेज लोभियों से ऐसे लोग समझौता कर लेतें हंै। बेटी जिस घर में पैदा हुई उसकी परवरिश बेटों से कम नहीं होनी चाहिये। उसे तय करनें का अधिकार हो कि वह कहाॅ रहना चाहती है। पराया -पराया कि रट परिवार में बंद होनी चाहिये।

बेटी पराया क्यों और कैसे

किसी बेटी के साथ पराया धन के साथ कई संकट उभर आते हैं। ससुराल में प्रताड़ना, मायका पराया वह जाय तो जाय कहाॅ ? हम क्यों बना रखें हैं ऐसा समाज ? शादी के बाद यदि मजबूत मायका है तो कुछ दबाव समझौता हो सकता है अन्यथा वह मानसिक प्रताड़ना में मौत को बले लगाने में संकोच नहीं करतीे हैें। सामाजिक स्तर पर ससुराल की प्रताड़ना मायके के उस पराये शब्द से बल पातीं हैं जो बिटिया के पैदा होनें के बाद बार -बार घर में जपा जाता रहा है। दिल पर कितना बड़ा पत्थर रखकर पति या उसके रिश्तेदारों के खिलाफ मुकदमा करती होंगी लड़कियाँ विशेष रूप से वो लड़कियाँ जिनकी गोद में बच्चे रहते हैं। इन सभी सामाजिक मान्यताओं और शादीशुदा लड़कियों के बड़ी संख्या में मरने के बावजूद चर्चा इस विषय पर नहीं होती कि कैसे लड़कियों के खिलाॅफ होने वाले दहेज संबंधी अपराधों को रोका जाये। हाॅ चर्चा इस विषय पर जरुर होती है कि कैसे दहेज विरुद्ध कानून कमजोर हो !

 सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता ज्योतिका कालरा के मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय ने शनिवार को सोशल एक्शन फोरम फॉर मानवाधिकार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामले में 498-ए पर जो फैसला सुनाया है, वो मेरे द्वारा साल 2015 में दायर की गई एक जनहित याचिका थी। याचिका डालने की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि समय-समय पर अलग-अलग उच्च न्यायालयों के द्वारा तथा सरकार के ज्ञापनों द्वारा 498-ए के मुक़दमों में विभिन्न निर्देश जारी किये गए थे।यथा – किन परिस्थितियों में एफआईआर लिखी जानी चाहिए, किन कारणों के चलते गिरफ्तारी होनी चाहिए, किस-किस को गिरफ्तार किया जा सकता है?ठसी तरह अरुणेश कुमार बनाम भारत सरकार केस पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया उसमें फिर दिशानिर्देश जारी हुए कि एफआईआर कैसे दर्ज की जाए, जाँच कैसे हो, मजिस्ट्रेट मुक़दमे का संज्ञान कैसे लें, वगैरह-वगैरह.।एक याचिका में सर्वोच्च न्यायालय के सामने ये बात भी रखी गई कि कई तरह के दिशा-निर्देशों से महिलाओं के ख़िलाफ होने वाली हिंसा से संबंधित क़ानून कमजोर हो रहे हैं।अदालत से ये प्रार्थना भी की गई कि महिलाओं के ख़िलाफ हो रही हिंसा के संदर्भ में एक यूनिफॉर्म पॉलिसी बनाई जाये जिसके तहत ही एफआईआर रजिस्टर हो, गिरफ्तारी हो और जमानत कैसे मिलनी चाहिए आदि।याचिका में ये भी कहा गया कि सामान्य रूप से पुलिस भी दहेज के मामलों में जब तक कि लड़की की मौत न हो जाये, मामले को गंभीरता से नहीं लेती। फिर जब इस तरह के फैसले आ जाते हैं तो पुलिस को भी दहेज के मामलों में निष्क्रिय रहने का बहाना मिल जाता है और पुलिस कहती है कि लड़कियाँ झूठे मुक़दमे डालती हैं।याचिका में ये भी जिक्र था कि 498-ए सीआरपीसी में पर्याप्त चेक एंड बैलेंस हैं जिनके द्वारा किसी भी प्रकार के दुरुपयोग को रोका जा सकता है। जब एफआईआर के दर्ज होने से लेकर, जाँच को लेकर, गिरफ्तारी को लेकर क़ानून बखूबी बनाये गए हैं, फिर ऐसा क्यों होता है कि दहेज से संबंधित अपराधों को लेकर ही नये-नये दिशानिर्देश जारी किये जाते हैं?

 

हर बार नए दिशानिर्देश क्यों?
अब एक मुकदमें में नये प्रकार के दिशानिर्देश उसके पैरा-19 में जारी किये गए हैं जिसमें लिखा गया है कि-
1. हर जिले में फैमिली वेलफेयर कमिटी होनी चाहिए. सिविल सोसायटी के सदस्यों को मिलाकर ये कमेटी बनाई जाये. यही कमेटी रिपोर्ट देगी कि गिरफ्तारी होनी चाहिए या नहीं।
2. इन मामलों की देखभाल के लिए अलग से अफसर तैनात करने की भी बात कही गई।
3. समझौता होने की स्थिति में जिला न्यायालय ही मुक़दमे को ख़त्म कर देगा।
4. ये भी कहा गया कि जमानत दी जाये या नहीं, ये बड़ी सावधानी से तय किया जाये।
5. रेड कॉर्नर नोटिस रुटीन में जारी नहीं किये जायें।

6. जिला जज सभी मामलों को मिला सकता है।
7. परिवार के सभी सदस्यों की कोर्ट में पेशी की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
8. ये निर्देश गंभीर चोटों या मृत्यु की स्थिति में लागू नहीं होंगे।
राजेश शर्मा के मुक़दमे के बाद काफी आवाजें उठीं कि कैसे सुप्रीम कोर्ट को क़ानून बनाने का अधिकार मिल जाता है। राजेश शर्मा के मामले में दिया गया फैसला संविधान की भावना के विरुद्ध है।फिर सुप्रीम कोर्ट के सामने न्यायधर एनजीओ के नाम से याचिका डाली जाती है कि इसमें प्रार्थना की गई कि समिति में महिलाओं की भी सहभागिता होनी चाहिए। ये याचिका भारत के चीफ जस्टिस के कोर्ट में लगी थी। न्यायधर एनजीओ की याचिका में एडवोकेट कालरा नें हस्तक्षेपकर्ता के तौर पर आवेदन किया तो न्यायालय ने दोनों मामलों को साथ जोड़ दिया और दोबारा विचार के लिए राजेश शर्मा के फैसले को भी कोर्ट के सामने रखा गया।
कोर्ट ने अपने निर्णायक फैसले में ये निम्नलिखित निर्देश दिये
1. क़ानूनी ढांचे के बाहर है इसलिए ये लागू नहीं किया जा सकता।
2. दूसरा निर्देश इस फैसले के अनुरूप है।
3. कहा गया कि अगर समझौता होता है तो हाई कोर्ट में ही केस के निपटारे की याचिका डालनी होगी।
4. चैथे और पाँचवें निर्देश को बरकरार रखा गया।
5. जहाँ तक छठे और सातवें निर्देश का प्रश्न था कि कोर्ट में व्यक्तिगत पेशी हो या नहीं, तो उसके लिये सीआरपीसी के सेक्शन 205 और 317 के तहत आवेदन जमा करने के निर्देश दिये गए। इस फैसले में कहीं भी दहेज के मामलों को काबिले जमानत नहीं बनाया गया. कुछ ख़बरों में ऐसा छपा है कि दहेज के मामलों में जमानत मिल सकती है।
कोर्ट के फैसले को लेकर भ्रम!
एडवाकेट काॅलरा माॅग करतीं हैं कि –
दहेज का प्रचलन इतना बढ़ गया है कि लड़की वालों को शादी पर करोड़ो रुपए ख़र्च करने पड़ते हैं. दहेज की प्रथा घटने की जगह बढ़ी ही है।बहुत अच्छा होता अगर माननीय न्यायाधीश ये भी व्यवस्था दे देते कि इस तरह पत्नियों पर आरोप नहीं लगने चाहिए कि वो झूठी हैं और बदनीयती से अपने पति और ससुराल पक्ष के लोगों के ख़िलाफ मुक़दमे डालती हैं। अगर दहेज की प्रथा समाप्त हो जाए तो सीधी सी बात है कि दहेज से संबंधित इन कानूनों की प्रासंगिकता भी समाप्त हो जायेगी।

                                                                                                                                                                                                   Vaidambh Media

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