दिख चुकी भीड़ ,अब वोट सहेजने का समय!

खलिहान से‐‐‐

लहर सैदव हिलती रहती है। उसके नीचे न कोई आधार होता है न ऊपर कोई छत।हमेशा ख्वाबों में मगन रहती है लहर। उसे ऊंचाई छूने का शौक है इसलिए निरन्तर आकाश की ओर उछलती रहती है। कभी-कभी ेजब चरम पर होती है तो सब कुछ तहस-नहस कर देती है। अपनी लोकप्रियता को लहर से जोड़ने वाले नेता उसमें क्या देखतें हैं पता नहीं। वर्तमान समय मे राजनीति की कोई नीति स्पष्ट नही हो पा रही। देश की 16वीं लोकसभा का ऐतिहासिक कहा जाने वाला चुनाव बिन पेंदी के लोटे जैसा हो गया है। लोकतंत्र में विपक्ष,देश की सरकार के क्रियाकलाप का पहरेदार होता है। पर अबतक हमने जो देखा है उसमें मजबूत विपक्ष व मुद्दे दोनो ही किसी ब्यक्ति के पीछे-पीछे चल रहें हैं।महॅगाई व भ्रष्टाचार देश के इस चुनाव में बड़ा मुद्दा बन सकता था। देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी को नजाने कैसी सनक सवार हो गई ,उसने मुद्दों को गांैड़ कर, हजारों सवालों के जवाबदेह ब्यक्ति को आगे कर चुनाव फतेह करने की ठान ली। सत्ता तक पहुॅचने का गलियारा बहुत सकरा होता है। देश के इतिहास,भुगोल,सुरक्षा,संरक्षा जैसे मामलों की जगह ’चायवाला और उसकी मा’ के भावनात्मक राजनीतिक ब्यवसाय ने सभाओं में भीड़ तो जुटाई , अब समय है जनता पर कुछ असर हुआ इससे वाकिफ होने का।, हर सभाओं की भीड़ में वही चेहरे थे अगर कुछ अलग था तो वह है झंण्डा व टोपी। भीड़ दिख चुकी,अब वक्त है वोट सहेजने का, पर राजनीति के दरिया मे लहरों पर टिकी पार्टी इसे कैसे देखती है?े
चायवाला भावी प्रधानमंत्री यानी ’नमों टी’ का अपेक्षित असर नहीं होता देख पी0एम0 उम्मीदवार की अन्य खूबियाॅ परखनी शुरू की गई। अचानक ही पिछ़ड़ा कार्ड बीजेपी ने खेल दिया। अब तक यह समझ मे आ गया कि ब्यक्ति केवल हैावा ह,ै असल में पार्टी तो विचारों से चलती है। फिर भी अब ब्यक्ति को आगे कर पीछे कदम कैसे खींचे पार्टी। पोस्टर लगा अबकी बार, मोदी सरकार। स्वाभिमानी कार्यकर्ताओं को बात दिल पर लगी। भाजपा स्वयं को लोकतांत्रिक बताती है और पोस्टर पर सामंतवाद स्पष्ट दिख रहा है। रह-रह कर पार्टी अध्यक्ष भी इसी भूमिका में दिखने के लिये ब्याकुल हैं। यही आकाॅक्षा उन्हे लखनऊं ले आयी। गाजियाबाद लोकसभा दिल्ली से नजदीक है वहाॅ से पलायन कर गये। यहाॅ की जनता का सामना करने की हिम्मत उनमें नहीं है तो क्यों? जनता ने नाम दिया भगोड़ा। क्या इस उपाधि के बारे में लखनऊं की जनता को भाजपा पार्टी अध्यक्ष सफाई देंगे। यदि नही ं,तो यह बेइमान राजनीति हमें क्या रास्ता दिखायेगी?
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के दावेदार जब बनारस पहुॅचे तो उनका सामना काशी की साझा संस्कृति से हुआ। यहाॅ तो स्वघोषित भावी प्रधानमंत्री कोे अपना वजूद साबित करना पड़ेगा। देश के प्रधानमंत्री पद का दावेदार लोकसभा लड़ कर जीत जाये इसका कोई महत्व नही। महत्वर्पूण बात यह है कि उन्हे कितने लोगों ने चुना। यहाॅ 4लाख मतदाता मुस्लिम हैं। उनकी सहमति पीएम इन वेटिंग के लिए एक चुनौती है। भाजपा प्रत्येक चुनाव में सत्ता की तरफ बढती दिखती है पर उसकी प्रयोगवादी नीति उसे पीछे धकेल देती है। यूपी विधानसभा चुनाव मंे बढ़त ले रही भाजपा को बाबू सिंह कुशवाहा के शामिल करने व निकालने वाले मामले से भारी नुकशान उठाना पड़ा। इस बार अल्पसंख्यकों के बीच पैठ बनाने मे जुटी भाजपा आतंकियों से ताल्लुक रखनेवाले शाबिर अली को शामिल करने की जल्दबाजी कर बैठी । फिर पार्टी से निकाल भी दिया। वह भी उस समय जब पीएम इन वेटिंग जम्मू-कश्मीर में चुनावी मंच से आतंकवाद पर बरसते हुए उनके एजेण्टों के नाम गिना रहे थे। पूर्व जदयू नेता राज्य सभा संासद साबिर अली व उनकी पत्नी के सुर इन दिनों विरोधी हो गये हैं। बीजेपी के एंथम पर गौर कीजिए 20 जगह आपको मोदी मैं, मेरा,मुझसे जैसे शब्दों का प्रयोग करते मिलेंगे। सिद्धांत व राष्ट्रवाद की राजनीति में भाजपा का ये स्थान तो कत्तईं नही हो सकता! शायद बीते दस वर्षों मे ढुलमुल विपक्ष की भूमिका निभाते-निभाते बीजेपी अब ऊब चुकी है उसे सत्ता हर हाल में चाहिए ! तभी तो तरकस के सारे तीर निकाल दियें हैं। एकल नेतृत्व, भावनात्मक गुबार, मूल सिद्धांत से विरत्, जाति कार्ड, गठबंधन, पार्टी में किसी का भी बंद आखों से स्वागत व लोकसभा टिकट तथा कमजोर दिख रहे रूष्ट लोगों का पार्टी से निष्कासन जैसे अस्त्रों का प्रयोग फिलहाल भाजपा कर रही है। ’सर्वधर्म समभाव’ कर्मक्षेत्र मे दिखाई देगा तभी जनता मुखर होगी अन्यथा सबकी सभाओं में भीड़ बनकर खड़ी हो जायेगी और नेता लोग उसे अपना मतदाता मान बैठेंगे, जो कुछ समय की खुशफहमी हो सकती है।

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