दिल्ली की राजनीति में प्रदूषण !

 

मानहानि या मनमानी !

New Delhi : भारतीय राजनीति के दुष्क्रियाशील मानकों के लिहाज से भी बीते कुछ हफ्ते और भी ज्यादा निराशाजनक रहे हैं।parliament hungama cartoon देश के वित्त मंत्री ने दिल्ली के मुख्यमंत्री के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर किया है। पिछले दिनों समाप्त संसद के शीतकालीन सत्र की परिणति भी पिछले कुछ सत्रों के माफिक ही हुई, जिसमें सिवाय हमारे नेताओं की कुछ हंगामेबाजी के अलावा और कुछ हासिल नहीं हुआ, जिन्होंने संसद में पीठासीन अधिकारी के आसन के नजदीक आने की कवायद को अपनी कसरत का एक हिस्सा बना लिया है, जिस शहर की आबोहवा इतनी खराब हो गई है कि बाहर कसरत करना भी सेहत के लिए नुकसानदेह हो चला है। इसके बजाय पिछले कुछ हफ्तों के तीन घटनाक्रम पर गौर कीजिए।

पहली घटना मद्रास से

1- दिसंबर को चेन्नई शहर के अधिकारियों ने शहर को समय से सूचना दिए बिना जलाशय से अडयार नदी में पानी प्रवाहित करने का अप्रत्याशित फैसला किया क्योंकि जलाशय के टूटने का जोखिम बढ़ रहा था।ADYAR REVER शहर के बाशिंदों को इसकी जानकारी नहीं थी, तमाम लोगों को जिंदगी से हाथ धोना पड़ा और घरों में बाढ़ का पानी घुस आया। शहर का खराब नियोजन कोढ़ में खाज साबित हुआ, जहां हवाई अड्डïा ऐसी जगह बनाया गया, जो अडयार नदी के बाढ़ क्षेत्र में आता है और इस इलाके में आवासीय और व्यावसायिक भवनों के निर्माण की इजाजत दी गई, जहां कभी झीलें हुआ करती थीं। देश के दूसरे महानगरों में भी कमोबेश यही सिलसिला दोहराया जा रहा है।

सरकार की ठुलमुल ब्यवस्था !

2-ब्रिटेन-भारत कारोबारी परिषद की बैठक में प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वस्त करते हुए पुरानी तारीख से कर वसूलने की कवायद को ‘अतीत की बात’ बताया।

केयर्न इंडिया का वेंदाता में होगा विलय

केयर्न इंडिया का वेंदाता में होगा विलय

इसके कुछ हफ्तों बाद ही केयर्न ने प्रधानमंत्री से 10,427 करोड़ रुपये के प्रतिगामी कर विवाद को सुलझाने की गुहार लगाई। कंपनी के पुनर्गठन से जुड़े इस विवाद में कर की मांग एक साल बाद सामने आई और जनवरी, 2014 से ही कंपनी के अधिकारी सहानुभूति का भाव रखने वाले वित्त मंत्री और वरिष्ठï अफसरशाहों से मेल-मुलाकात करते आ रहे हैं। चूंकि यह सरकार बार-बार सुधार करने की बात कर रही है, इसी वजह से कंपनी मामले को मध्यस्थ तक ले जाने में देरी करती रही। फिर सरकार ने मध्यस्थ का ऐलान करने में छह महीने लगा दिए।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के तत्काल दखल की जरूरत ?

3- हाल में ही अभी पिछले हफ्ते की बात करें। हॉलीवुड के नामचीन सितारे ऑरलैंडो ब्लूम भारत पधारे।Miranda Kerr & Orlando Bloom उत्तर प्रदेश सरकार के मेहमान के तौर पर तशरीफ लाए ब्लूम को आते ही मुश्किलों का सामना करना पड़ा और सरकारी अधिकारियों के ब्योरे से मुझे यही समझ आया कि अपने इलेक्ट्रॉनिक वीजा से जुड़ी ‘तकनीकी दिक्कतों’ के चलते वह ‘दोषी’ पाए गए और उन्हें सुबह तड़के 3 बजे ही वापस रवाना करने की बात आई। सरकारी अधिकारियों ने एक विचित्र दलील दी कि ब्लूम की वीजा मंजूरी का प्रिंट बहुत हल्का है और दूसरा यह कि अभी पुष्टिï नहीं हुई कि अभिनेता के वीजा को मंजूरी मिली या नहीं।sushma_swaraj 3x2 बड़े तार्किक तरह के ब्लूम ने गुजारिश की कि उन्हें तुरंत वापस भेजने के बजाय सुबह 10 बजे तक दिल्ली हवाई अड्डïे पर ही ठहराया जाए ताकि उनके मेजबानों को हालात सुलझाने के लिए कुछ समय मिल जाए। इसके बजाय वह आव्रजन अधिकारियों पर चिल्लाते और ब्रिटिश एयरवेज के अधिकारियों से कहते कि उनकी लंदन जाने वाली उड़ान उन्हें लेकर ही जाए। उन्हें लंदन रवाना करने के बाद ‘लॉर्ड ऑफ द रिंग्स’ फेम अभिनेता के वीजा के लिए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के तत्काल दखल की जरूरत पड़ती। ऐसे में कोई हैरत की बात नहीं कि हमारे देश में केवल 77 लाख सैलानी आते हैं, (और मैं शर्तिया कह सकता हूं कि उनमें से अधिकांश विदेशी पासपोर्ट धारक भारतीय मूल के लोग होंगे) जो मलेशिया में आने वाले 2.7 करोड़ सैलानियों की संख्या से भी कम हैं।

अतुल्य भारत मुहिम ?

इनमें से से एक भी मामला पर्यटन अभियान की अतुल्य भारत मुहिम को साकार नहीं करता बल्कि इसमें देश की अफसरशाही की अक्षमता ही जाहिर होती है।atulya bharat ‘यहां के मेरे अनुभव से यही निष्कर्ष निकलता है कि मौजूदा तंत्र कुछ हद तक पुराना है और जो मामलों को त्वरित रूप से सुलझाने के मामले में निश्चित रूप से उपयोगी नहीं है। समन्वय की कमी और लातफीताशाही का कुछ ज्यादा ही बोलबाला है, जहां अनावश्यक नोटिंग की जाती है।’ यह गद्यांश केयन्र्स के मुख्य कार्याधिकारी सिमॉन थॉमसन के पत्र से नहीं लिया गया है। न ही यह ब्लूम के किसी यात्रा वृत्तांत से लिया गया है, जिनकी मां का जन्म कलकत्ता में हुआ था, जब उनके दादा वहां डॉक्टर के रूप में तैनात थे। असल में यह 5 जनवरी, 1948 को देश के मुख्यमंत्रियों को लिखे जवाहरलाल नेहरू के पत्र से लिया गया है।

देशहित  पर  ईष्र्या -लापरवाही !

व्यावहारिक ज्ञान तो यही बताएगा कि अगर यह सरकार वाकई उस ग्रंथि से पीछा छुड़ाना चाहती है, जिसे प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री लगातार पिछली सरकारों का ‘कर आतंकवाद’ करार देते हुए हैं तो वे केयर्न मामला कुछ हफ्तों में ही सुलझा देते, जिसमें बस कुछ संबंधित अफसरों को बुलाना पड़ता और उन्हें जरूरी निर्देश दिए जाते। indian-bureaucrats-वहीं ब्लूम के साथ भिड़े अधिकारियों को उनके बारे में जानने के लिए गूगल करने में कितनी मशक्कत करनी पड़ती? उन्होंने यूनिसेफ शांति दूत के रूप में कई जगहों का दौरा किया है, उन्हें कोई न कोई तस्वीर या जानकारी आसानी से मिल जाती। मगर भारत में अफसरशाही के लिए कुछ भी सही या तार्किक करना पूरी तरह समझ से परे है। भारत में शासन/प्रशासन अभी भी परंपराओं और मनमानी ताकत के इस्तेमाल में फंसा हुआ है। फाइनैंशियल टाइम्स में प्रकाशित एक हालिया आलेख में एक युवा अफसर के हवाले से बताया गया कि उसने रेलवे के द्वितीय श्रेणी के डब्बों में शौचालय के लिए सस्ते मग मुहैया कराने पर फैसले को डेढ़ साल तक लटकाए रखा। ऐसा तब हो रहा है, जब मंत्रालय अगले पांच वर्षों में रेल नेटवर्क को सुधारने पर 137 अरब डॉलर खर्च करना चाहता है। (B.S.)

राहुल जैकब

V.N.S.

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