कैसे हो देश की बीमार शिक्षा का ईलाज ?

 क्यों स्कूल जाना छोड़ रहे छात्र ?

Chandigarh : पंजाब में स्कूली अध्यापकों का ही जब अंग्रेजी का इम्तिहान हुआ और उसमें वे अपनी उलूल-जुलूल बातों से बुरी तरह अनुत्तीर्ण हुए, जिसमें उन्होंने ‘लैक ऑफ इंट्रेस्ट’ की जगह ‘लीक school ऑफ इंट्रेस्ट’ जैसी बातें लिखीं तो जाहिर है इससे उन्हें राज्य के शिक्षा मंत्री के कोप का भाजन बनना ही था। ऐसे मामलों को भुनाने में टेलीविजन चैनल भी पीछे नहीं रहे और उन्होंने अपने कैमरों का रुख मध्य प्रदेश और बिहार के स्कूलों की ओर मोड़ दिया। हालांकि प्राइम टाइम टेलीविजन पर अध्यापकों की ऐसी जगहंसाई कराकर उनका मानमर्दन करना संभवत: उचित नहीं है, यह दर्शाएगा कि ज्ञान के अभाव में इतनी बड़ी तादाद में छात्र क्यों स्कूल जाना छोड़ रहे हैं।

  हैरत  :  छात्रों की अज्ञानता में योगदान दे रहे अध्यापक 

जहां मध्य प्रदेश के अध्यापक ‘शुड’ और ‘वैकेंट’ जैसे अंग्रेजी शब्दों की सही स्पेलिंग नहीं लिख पाए वहीं बिहार के अध्यापक अंग्रेजी के ‘फैबु्रअरी’, ‘मंडे’ और ‘मैंगो’ जैसे शब्दों को ब्लैकबोर्ड पर सही ढंग से नहीं लिख पाए। बात केवल अंग्रेजी तक ही सीमित नहीं थी, बल्कि अध्यापक छात्रों को यह तक पढ़ाते हुए पाए गए कि एक साल में 360 दिन होते हैं और देश की राजधानी पटना है। इस पर विश्वास करना भले ही मुश्किल है लेकिन भारत के स्कूलों की व्यथा बयां करने वाले ऐसे दुखद वीडियो की यूट्यूब पर भरमार है, जो अपने छात्रों की अज्ञानता में योगदान दे रहे हैं। इसलिए क्या इसमें कोई हैरत की बात है कि अंतरराष्टï्रीय छात्र आकलन अध्ययन के हालिया कार्यक्रम में 64 देशों की सूची में भारत 63वें स्थान पर रहा, जहां देश के कुछ बेहतरीन स्कूल सर्वेक्षण में शामिल स्कूलों की सूची में महज औसत की श्रेणी में ही जगह बना पाए?

गद्यांश का उचित शीर्षक नहीं लगा पाए 64 फीसदी अध्यापक !

10 महीनों का बीएड पाठ्यक्रम ;  संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह  उग आए

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D for ‘Daaru’, P for ‘Piyo’: A Drunk Teacher’s Class by nd tv report

निश्चित रूप से शहरों में भी हालात बहुत बेहतर नहीं हैं। गणित की परीक्षा में भी अध्यापकों का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और उनमें से अधिकांश गणित के सामान्य से सवाल भी हल नहीं कर पाए, वहीं भाषा गद्यांश की परीक्षा में 64 फीसदी अध्यापक गद्यांश का उचित शीर्षक नहीं लगा पाए। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार बीएड किए हुए 99 फीसदी से अधिक शिक्षक केंद्रीय अध्यापक पात्रता परीक्षा (सीटीईटी), 2012 परीक्षा में उत्तीर्ण नहीं हुए। शिक्षा के अधिकार के तहत किसी भी केंद्रीय स्कूल में कक्षा एक से कक्षा आठ तक के विद्यार्थियों के अध्यापन के लिए सीटीईटी प्रमाण पत्र अनिवार्य है। यह तथ्य इस तस्वीर को और भयावह बना देता है कि इस परीक्षा के लिए आवेदन करने वालों में से अधिकांश बीएड स्नातक पहले से ही प्राथमिक शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं, जिनके पास जिला शिक्षण एवं प्रशिक्षण संस्थानों (डीआईईटी) से शिक्षण में दो वर्षीय डिप्लोमा (डीईडी) या उसके समकक्ष योग्यता है। यह यही दर्शाता है कि डीआईईटी का उच्च शिक्षण संस्थानों से कैसे कोई तंत्रीय जुड़ाव नहीं है और कैसे देश भर में 10 महीनों का बीएड पाठ्यक्रम कराने वाले संस्थान कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं, जो किसी भी काम के नहीं।

अध्यापन पेशा, अंतिम विकल्प के रूप में  !

teach tअगस्त्य इंटरनैशनल फाउंडेशन का कहना है कि इसकी प्रमुख वजहों में से एक यही है कि अध्यापन पेशा लोगों के लिए मजबूरी बन गया है और लोग इसे अंतिम विकल्प के रूप में ही देखते हैं और बेहतर आजीविका मिलने तक इसे एक अस्थायी इंतजाम के तौर पर लेते हैं, यह रुझान इतना मजबूत है कि बेहतरीन स्कूलों को भी अच्छे शिक्षक मिलने और उन्हें अपने साथ बरकरार रखने में मुश्किलें झेलनी पड़ रही हैं। आखिरकार एक कॉल सेंटर कर्मी की तनख्वाह एक शीर्ष निजी स्कूल में पढ़ाने वाले अध्यापक की तुलना में दोगुनी होती है। भारत में प्राथमिक/माध्यमिक विद्यालयों में तकरीबन 70 से 80 लाख अध्यापकों की जरूरत है जबकि इस समय केवल 30 से 40 लाख अध्यापक उपलब्ध हैं, ऐसे में इस चुनौती का हल कैसे निकलेगा? इस किल्लत को पूरा करने के लिए राज्य सरकारों के कुछ स्कूलों ने परा-अध्यापकों या अनुबंधित शिक्षकों की नियुक्ति करनी शुरू कर दी है, जो पूरी तरह से अप्रशिक्षित हैं और उनमें से अधिकांश 3,000 रुपये प्रति महीने तक की कम तनख्वाह पाते हैं।

अध्यापकों का मनोबल रसातल में है !

frustate teacherऐसे में कोई हैरत की बात नहीं कि अध्यापकों का मनोबल रसातल में है। ग्रामीण भारत में अमूमन एक चौथाई प्राथमिक शिक्षक रोजाना गैरहाजिर रहते हैं। उनकी गैरहाजिरी का प्रभाव इस तथ्य से और तस्वीर बिगाड़ देता है कि भारत में किसी औसत प्राथमिक विद्यालय में तीन अध्यापकों से ज्यादा नहीं होते और उन्हें तमाम ऐसे कार्यों का दायित्व भी मिल जाता है, जिनका अध्यापन से कोई लेनादेना नहीं। इनमें जनगणना के लिए आंकड़ों का संग्रह करना और चुनावों के दौरान जरूरत के समय चुनाव केंद्रों पर भेजे जाने जैसे तमाम काम शामिल होते हैं, जिनमें उनका काफी वक्त लग जाता है। अगर अध्यापकों का एक बड़ा वर्ग तैयार करना है तो यह तभी संभव हो पाएगा, जब भारत में शिक्षकों के चयन और उनके प्रशिक्षण की प्रक्रिया में व्यापक परिवर्तन किया जाए। यदि देश को कुशल, उत्साही लोगों को शिक्षण क्षेत्र की ओर आकर्षित करना है तो उन्हें अपेक्षाकृत बेहतर तनख्वाह की पेशकश और शिक्षण गतिविधियों में प्रशिक्षण देना होगा। केवल शिक्षा के अधिकार के साथ शिक्षा के विस्तार से ही काम नहीं चलेगा। (B.S.)

श्यामल मजूमदार

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