धरातल पर उतर कर करना होगा विकास

आधुनिक विकास की कीमत दो लोगों को सबसे अधिक चुकानी पड़ी। पहला गरीब दूसरा प्राकृतिक संसाधन। ऐसे तो कथित आधुनिक विकास हमें विनाश की ओर ले जा रहा है। जिस उत्पादन की हम डींगे मार रहे हैं उनको उतपादित करने वाली मशीनों के इधन का भविष्य क्या है। प्रकृति की अकूत सम्पदा पर हम अपनी हबस पूरी करने के लिए लगातार डाॅका डाल रहें हैं। समय -समय पर खामियाजा भी भुगत रहें हैं। अमीर जीवनशैली की बनावटी विचारधारा ने हमें बेबुनियादी बना दिया है। मनुष्य प्रकृति की सबसे बड़ी देन है। इसपर प्रकृति के सभी समाज की जिम्मेदारी है। मानव समाज के स्वयं जीवित रहने की यह अनिवार्य शर्त बन गयी है।
बीते 300 वर्षों में दुनिया के 30प्रतिशत लोगों की सुखसुविधा के लिए सभी मनुष्यों ने जाने -अनजाने प्रकृति को विनाश के दरवाजे तक पहॅुचाने में अपनी क्षमता लगाई है। पेट्रोलियम के ज्ञात भंडार का दोहन जारी है। वर्तमान स्थिति यही दर्शाती है कि पेट्रोल महज 50  वर्षो  मे समाप्त हो जायेगा।जबकि प्राकृतिक गैस और कोयला क्रमशः 57व 77 वर्ष के लिये ही बचा है। विकास की अंधी अवधारण ने अपने देश में भी जंगल व कृषि भूमि को बड़े पैमाने पर र्बबाद कर दिया है। एक सर्वे के मुताबिक विश्व में14‐74 करोड़ हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य बची है। जबकि अभी जंगल 36 करोड़ हेक्टेयर पर हैं। जहाॅ गलत तरीकों के इस्तेमाल से अबतक लगभग 20 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर हो गयी है वहीं प्रति वर्ष औसतन 25लाख हेक्टेयर जंगल काटे जा रहें हैं। जल-जमीन और हवा में प्रदूषण का जहर फैल रहा है। तापमान मे प्रति दशक 3डिग्री सेिल्सयस की वृद्धि हो रही है। बरसात के मौसम में 33से 40 डिग्री के बीच तापमान का होना उस पर मानसून का गायब रहना । किसानों के लिये जीवन मरण का प्रश्न बन गया है। अन्नदाता की इस विकट समस्या का प्रभाव शहरीकरण की वकालत करने वालों पर बहुत जबरदस्त पडने वाला है। देश के सभी हिस्से सूखाग्रस्त हो गये हैं। वैज्ञानिक इस दिशा मे काम करें कि कही कार्बन उत्सर्जन व रेडियेशन का प्रभव तो नही। यदि ऐसा है तो सरकार के पास आधुनिकीकरण का क्या विकल्प होना चाहियेघ्
सनद करना होगा 1995-96 के दौर में देश में कूलर एसी व फ्रिज की तीव्र बृद्धि देखी गयी। उस समय अमेरिकी देशों में मानसून बहुत खराब स्थिति में था। नासा ने जब इस समस्या पर शोध किया तो पाया कि क्लोरो-फ्लोरो मेथेन गैस ओजोन परत को भारी नुकसान पहुॅचा रही है इसका सबसे बड़ा नुकसान अमेरिका को ही हो रहा है। ये गैस निकल कहाॅ से रही हैं, पता चला कि भीषण गर्मी मे राहत के लिये घर मे लगे एसी व फ्रिज से उत्सर्जित गैस देश में सूखा व आकस्मिक बाढ़ ,तूफान व अन्य आपदाओं के कारक हैं।  निर्णय  लिया गया कि इस गैस का प्रयोग तत्काल बंद कर दिया जाय। प्रश्न खड़ा हुआ इनसे र्निमित सामानों का क्या हो? अमेरिका ने एशियाई देशों पर नजर दौड़ाई और क्षमता के मुताबिक उन्हे सामान खरीदने पर राजी कर लिया। अपने विनाश की दावत हम पैसा देकर उड़ाते हैं यह कितना हास्यास्पद है। भारत इन सामानों की खरीद में सबसे आगे है। आज हम भारी सूखे की चपेट में हैं। इसका सीधा प्रभाव देश के किसानों पर पड़ रहा है। हमारे प्रधनमंत्री वैज्ञानिकों से कृषि पर बृहद शोध की बात किये। अच्छा लगा। बस उन्हे यह याद रखना होगा कि अमेरिकी आवभगत में देश के वैज्ञानिकों व किसानों से किया वादा न भूल जाय। एैसा याद रखना उन्हे इस लिये भी जरुरी है क्योंकि गुंजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होने अहामदाबाद में फ्रांस के उस जहाज को काटने की संस्तुति दे दी जिसे विश्व भर मे कही जगह नही मिली। सभी देशों को अपने नागरिकों की चिंता थी क्योकि उसके विखंण्डन से इतना कार्बन उत्सर्जित होता कि आने वाली नस्ले तक प्रभावित होती। प्रधानमंत्री जी !देश और उसके नागरिक हित के बाद ही किसी और हित की बात होनी चाहिए। धरातल पर उतर कर विकास को परिभाषित करना इस देश की माॅग है और चुनौती भी।

धनंजय ब्रिज

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