धार्मिक असहिष्णुता पर प्रतिबद्धता या लोकाचार!

नर्इ दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राजधानी में गत मंगलवार को र्इसार्इ समुदाय के एक समारोह को संबोधित करते हुए जो कहा, उसकी उम्मीद उनसे पिछली सदन में विपक्ष करता रहा, बीते कर्इ महीनों से  घर वापसी जैसें बवालिया बयान  पर प्रधानमंत्री से अपेक्षा आमजन को भी होने लगी थी।  समारोह में उन्होने कहा कि धार्मिक असहिष्णुता और इस तर्ज पर होने वाली हिंसा की कड़ी निंदा करते हैं ,उनकी सरकार सभी धमोर्ं के प्रति समानभाव रखती है। अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक से ताल्लुक रखने वाले किसी भी धार्मिक समूह को दूसरों के खिलाफ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से घृणा फैलाने की इजाजत नहीं है।
हलांकि संसद में अपने प्रथम संबोधन में उन्होंने कहा था कि अगर एक अंग अस्वस्थ हो तो हम शरीर को स्वस्थ नहीं कह सकते। इसी तरह की बात स्वाधीनता दिवस के अवसर पर लाल किले की प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर देश को तेजी से विकास करना है तो लोग कम से कम दस साल के लिए जाति-धर्म के झगड़े भुला दें।
विडम्बना यह है कि अब तक प्रधानमंत्रीं जितना भी बोले हैं उसमें चुनावी सम्बोधन की संख्या अधिक है शायद इसी वजह से उनके उदबोधन को दिल्ली की जनता ने गम्भीरता से नही लिया। मोदी सरकार की कल्पना में चुनाव पूर्व लगाये गये विशालकाय होर्डिंगस सरकार को मुंह चिढ़ा रहे हैं।  प्रधानमंत्री जो बोल रहे हैं खुद उनके खेमे के लोगों ने उनके इन संदेशों को तवज्जो नहीं दी।

bihar-village.jpg.image.784.410

नफरत फैलाने की कोशिशें कभी ‘लव जिहाद के विरोध के नाम पर चलती रही तो कभी ‘घर-वापसी के नाम पर, अपनी भयानक बातों को सरेआम मीडिया में बोल कर माहैल गरम रखने का कुछ सांसद तो जैसे ठेका ले रखें हों। कर्इ बार सीधे सांप्रदायिक तनाव फैलाने के प्रयास हुए। दिल्ली में त्रिलोकपुरी, बवाना, नंदनगरी में हुर्इ ऐसी घटनाएं और एक के बाद एक कर्इ गिरजाघरों पर हमले या तोड़-फोड़ के मामले इसी के उदाहरण हैं। आग भड़काने में त्रिलोकपुरी में भी भाजपा के पूर्व स्थानीय विधायक का नाम आया और बवाना में भी। सत्तारूढ पार्टी के कुछ सांसद भी पीछे नहीं रहे। मुजफफर नगर में साम्प्रदायिक रंग कैसा रहा सभी जानते हैं। कभी प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी साहब इन क्षेत्रों के बारे में सोच पाये। यदि नहीं तोे साम्प्रदायिकता पर दिया गया उनका प्रवचन कारपोरेट संत की वांणी ही समझा जायेगा जो मौकापरस्ती पर आधरित होती है। मोदी सरकार के दरबार में साम्प्रदायिक नवरत्नेां की कमी नहीं है। साध्वी निरंजन ज्योति के बयान से उठा बवाल थमा भी नहीं था कि साक्षी महाराज शुरू हो गए। गोरखपुर से भाजपा के सांसद योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों हर मसिजद में मूर्ति रखने की मंशा जाहिर की। उन्हे कोर्इ यह तो बताये कि अस्सी लाख युवा भारत से मोदी ने रोजगार का वादा किया था ना कि मसिजद में मुर्ति रखने का आंदोलन मे आदोलनकारी की भुमिका निभाने का । प्रवीण तोगडि़या जैसे लोगों के आपत्तिजनक बयानों की तो कोर्इ गिनती ही नहीं है। क्या ऐसे तत्त्व यह मान कर  नही चल रहे कि चूंकि कें में उनके अपने लोगों की सरकार है, इसलिए वे कुछ भी करें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा!

riot-muzafer-nagar.jpg.image.784.410

यहीं धर्मध्वजा लेकर संसद में बैठे लोग भूल जाते हैं  कि  उनका धर्म क्या है! मोदी को जनादेश किसी और बात के लिए नहीं बलिक भ्रष्टाचार और महंगार्इ से निजात दिलाते हुए रोजगार मुहैया कराने व विकास के लिए मिला है। भाजपा लोकसभा चुनाव में सबका साथ-सबका विकास केें नारे पर सारा दम लगार्इ थी, फिर  विडंबना यह है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन सारे दु:खद प्रसंगों के दौरान चुप्पी साधे रहे। राज्यसभा में विपक्ष उनके बयान की मांग पर अड़ा रहा उस समय भी वे कुछ कहने को तैयार नहीं थे, फिर चुप्पी तोड़ने का कटु सत्य क्या है! अब प्रधानमंत्री ने चुप्पी तोड़ने की जरूरत महसूस की, तो इसकी दो-तीन खास वजहें हो सकती हैं। पहली कि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत में धार्मिक असहिष्णुता बढ़ने पर दो बार चिंता जतार्इ है, पहली बार अपनी भारत यात्रा के दौरान और दूसरी बार स्वदेश लौटने के बाद।इससे इस धारणा को बल मिला कि ऐसी घटनाओं के कारण देश की अंतरराष्ट्रीय छवि पर बुरा असर पड़ रहा है। दूसरे, दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह जताया है कि सौहार्द को चोट पहुंचाने वाले बयानों और वाकयों के चलते भी भाजपा को नुकसान हुआ। तीसरी बात ऐसी घटनाओं की पृष्ठभूमि में विकास के मुददे के प्रति मोदी सरकार की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठने लगे थे। देर से ही सही, मोदी साहब को खामोशी तोड़नी पड़ी। अगर उन्होंने समय से चेतावनी दी होती, तो उसकी चमक कुछ और होती। पर अब, जब उन्होने  भूल सुधार का रुख किया है तो शंका हो रही है । कारपोरेट संत वाणी या समभाव का प्रवचन यह काफी नहीं है। यह संदेश  तभी यथार्थ समझा जायेगा जब  संसद में बैठे कथित धर्मध्वज वाहक सांसदों की देश को संकट में डालने वाली कड़वी जुबान खुलने पर विपरीत कार्यवाही का निर्देश प्रधानमंत्री की ओर से प्राथमिकता पर होगा। ।

Previous Post
Next Post

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

hogan outlet online scarpe hogan outlet nike tn pas cher tn pas cher nike tn 2017 nike tn pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher