नई सरकार में प्राथमिक कौन,कारपोरेट या किसान !

राजनीतिक चिंतक मैकियावेली का सिद्धांत है कि राजा को शेर की तरह बहादुर और लोमड़ी की तरह चालाक होना चाहिए तभी सत्ता पर उसका एकाधिकार बना रह सकता है। वर्तमान भारत की राजनीति मे इस सिद्धांत का प्रयोग सफल रहा है। कारपोरेट ताकतों ने देश की लोकतंत्रिक ब्यवस्था में भाजपा के नरेन्द्र मोदी का चयन कर सिद्धांत को मूर्तरुप दे दिया। शेर को राजा का दूसरा पक्ष बताने के लिये स्वधन्य भारतीय जनता पार्टी ने बीड़ा उठाया और मोदी को राष्ट्रवादी बताने मे सफल रही। फलस्वरुप जनता ने ’अच्छे दिन आने वाले है’ स्लोगन को अपने श्रमराग में स्थान दे दिया। अब मोदी अथवा भाजपा जो भी सरकार आये उसे भारतीयों के श्रमराग की धुन मे ही फैसले लेने होंगे यह जनादेश कहता है , जनता ने सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य व अधिकार पाने के लिये विकासवादी दावा करने वाली ताकत को चुन लिया। कारपोरेट, मोदी का शक्तिशाली रुप दिखाने मे पूरी तरह सफल रहे। यह था शेर। अब बारी लोमड़ी की है वह क्या गुल खिलाती है। यहाॅ मैं सत्ता प्राप्त ब्यक्ति के उस एकांत क्षण की बात कर रहा हूॅ जब वह आइने में अपना स्वयं का प्रतिबिम्ब देख शेर व लोमड़ी दोनो को सफाई देने की रणनीति तय कर रहा होगा। किस पाले मे कब जाना है यह कठिन चुनौती सदैव बनी रहेगी। प्राथमिकता किसे दी जाय? शेर की ताकत व लोमड़ी की चालाक खोपड़ी का समन्वय देखने का प्रत्यक्ष अवसर इस बार लोकतंत्र में प्राप्त हुआ है।
वैश्विक ताकतें भारत की ओर लालच भरी नजर से देख रही है। ऐसे मे छद्म विकास के अवसर विदेशी निवेश के साथ ही उपलब्ध हो जाना स्वाभविक है जो तत्काल युवाओं को पुनः वर्तमान सरकार की ओर आकर्षित करेगा। लेकिन धीरे -धीरे आम आदमी की मालकियत खत्म होती चली जायेगी इस ओर किसी का ध्यान भी नही जायेगा क्योकि सब नौकर बनने जा रहे हैं। सभी नौकर मालिक नही बन सकते इसलिये आन्तरिक उपनिवेश पर बल दिया जा रहा है। काॅग्रेस की गति थेाडी धीमी थी कारपोरेट को तेज आदमी चाहिए। मोदी भाजपा की गति इस मामले मे बहुत तीब्र है। यह विश्व की पहली सरकार है जो कारपोरेट, आमजन, युवा, किसान,महिलायें सबके लिये समान अवसर उपलब्ध कराने का सम्मोहन कर सफल रही। चमत्कार हो गया, और होना ही था । विश्व के देशों मे जो भी संघर्ष की दास्तां पढ़ी जाती है वह शोषित व शोषक के बीच रही है। यहाॅ दोनों के हाथ में एक झंण्डा थमाने का काम कारपोरेट संत नरेन्द्र मोदी ने कर दिखाया। इसके लिये उन्हे बधाई तो बनती है। फिलहाल उन्होने संसदीय दल का नेता चुने जाने के बाद जो दिल को छू लेने वाला भाषण दिया उसमे भारत के गाॅव, गरीब और महिलाओं तथा युवाऔं का विकास प्राथमिक रहा।
अब जादू या चमत्कार कहने से काम चल जायेगा,हरगिज नही। चमत्कार तो तब होगा जब परम्परागत लीक से अलग हट कर विकास हो। बिना गाॅव उजाड़े शहर बसे,कंकरीट की सड़को पर गरीब के लिये छायादार पथ बने, किसानों को सही समय पर पानी मिले,जलवायु का क्रम सही करने में सरकार आगे आकर बाग-बागीचे लगवाये। चिमनियों का धुआॅ और नदियों के स्वच्छ जल को केमिकल बनाकर मानवजाति को संकट मे डालता प्रदूषण दूर हो, विद्युत की वैकल्पिक ब्यवस्था का प्रसार हो,हुनरमंद को प्रोत्साहन व बिना धक्का-मुक्की के काम मिले शिक्षा का भेद-भाव दूर होकर एक शिक्षा बोर्ड बने। तब आमजन को भी लगेगा कि अब अच्छे दिन जरुर आयेंगे। जिस तरह की आक्रामक शैली प्रचार के दौरान रही है जाहिर है सरकार उस तरह काम नही करेगी। फिर भी उम्मीद है कि सर्वाधिक शक्ति प्राप्त सरकार स्वयं को बाहुबली समझने की भूल नही करेगी और पाॅच साल बाद लोकतंत्र के सर्वशक्तिमान दरबार में जब पुनः वापस आयेगी तो उसे पछताना नही पड़ेगा,क्योंकि सरकार से नाराज जनता का कोप ही उन्हे यह अवसर उपलब्ध कराया है।
जय हिंद !

धनंजय “ब्रिज”

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