निजता में सेंध लगाने वाला मसौदा सरकार को लेना पड़ा वापस !

     New Delhi : अभिब्यक्ति की जायज सीमा कहाॅ तक है ! यह कौन तय कर सकता है ! भ्रष्टाचार encryption-3में आंकड़ों की बाजीगरी से इमाॅन का संदेश देने वाले भी कम नहीं। वैश्विकरण के बाद कोई मानवता के लिये एक होने की अपील करता है,  तो कोई इससे अपने धर्म को खतरे में बताकर सहानुभूति बटोरने में जुटा है। कुछ बातों से समाज व सरकार दोनो के लिये खतरा उत्पन्न हो जा रहा है। भारत में आइएसआइस का झंण्डा उठाना इसी तरह की समस्या है। पर यह भी सही है कि इसका मानक तय करनेवाला कितना हॅू स्पष्ट ब्यक्ति हो दूसरे छोर से असहमत की ही आवाज आयेगी। ऐसे में भारत सरकार का अपना इन्क्रिप्शन मसौदा वापस लेने का फैसला जनहित मे सही कदम है! पर आगे चलकर इसकी जरुरत से इंकार नही किया जा सकता ! पर यह किसी के फायदे का न होकर जनहित के लिये हो और वह यह विश्वास जादा लोगों को करा सके !

 इन्क्रिप्शन, हकीकत से कोसों दूर : 90 दिनों तकसुरक्षित रखना था निजी संवाद

सरकार के मागने पर उपलब्ध करानी होती अपनी प्रइवेट बातें !

encryption-policy-india  इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी विभाग ने राष्ट्रीय कूटलेखन (इन्क्रिप्शन) नीति के मसौदे को वापस ले लिया है। इस मसौदे को लेकर सार्वजनिक रूप से हायतौबा मच गई थी। सप्ताहांत पर जारी इस मसौदे में इन्क्रिप्शन के तरीकों को लेकर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 84ए के तहत नियम बनाए गए थे। एक विशेषज्ञ समूह द्वारा तैयार किए जाने के बावजूद इसमें ऐसे मानक बनाए गए थे, जो हकीकत से कोसों दूर तो थे ही, साथ ही जिनको लागू करना खतरनाक साबित हो सकता था। इसमें अनुपालन को लेकर भी कुछ ज्यादा ही उम्मीद की गई थी और बहुत अधिक निजी जानकारियों की अपेक्षा की गई थी। लोगों से उम्मीद की गई थी कि वे केवल सरकार द्वारा दिए गए अलगोरिदम और की का प्रयोग करेंगे। हर तरह के इलेक्ट्रॉनिक संचार, जिसमें दो लोगों के बीच का नितांत निजी मसलों पर आधारित निजी संवाद भी शामिल था, उसे कम से कम 90 दिनों तक सुरक्षित रखना था और सरकार द्वारा मांगे जाने पर उसे उपलब्ध कराना था।

 सभी ने की  मसौदे की आलोचना  !

encryption-  आश्चर्य नहीं कि सुरक्षा विशेषज्ञों, नागरिक अधिकारों के हिमायतियों, कंपनियों और आम नागरिकों तक सभी ने इस मसौदे की आलोचना की। निश्चित तौर पर इस मसौदे में सरकार ने अतिरिक्त सूक्ष्म प्रबंधन और विशेषाधिकार शामिल किए थे, जो उद्यमिता को नुकसान भी पहुंचा सकते थे। उदाहरण के लिए मसौदे में सरकार को विशेषाधिकार दिया गया था कि वह चाहे तो कुछ इन्क्रिप्शन अलगोरिदम हटा दे और चाहे तो कुछ अन्य सेवा प्रदाताओं को मानक से छूट दे दे। ऐसे में इसे जल्द वापस लिया जाना राहत भरी खबर है। अमेरिका एवं अन्य विकसित देशों की तर्ज पर राष्टï्रीय इन्क्रिप्शन नीति में गैर सैन्य इन्क्रिप्शन की ऊपरी सीमा निर्धारित की गई है। उस सीमा के तहत कोई भी उपयोगकर्ता, जो चाहे वह कर सकता है। वे नई कूट लेखन व्यवस्था भी लागू कर सकते थे बशर्ते कि वे उल्लिखित सीमा के भीतर हों। इस सीमा की समय-समय पर समीक्षा की जाती है। परंतु निजी संचार को सुरक्षित रखने की कोई वजह नहीं है।

सुरक्षा के मोर्चे पर हो सकती थी बड़ी खामी !

encrypहालांकि कुछ खास मामलों में सरकार अकूट आंकड़ों की स्पष्ट प्रति मांग सकती है। सच तो यह है कि अधिकांश आंकड़ों में किसी न किसी स्तर पर उसके कूट लेखन से छेड़छाड़ होती है। ऐसे में अगर मांग के मुताबिक आंकड़ों को 90 दिनों तक सुरक्षित रखना होता तो सुरक्षा के मोर्चे पर बड़ी खामी पैदा हो सकती थी। आंकड़ों में सेंध लगाने के कारण कई घोटाले और भारी वित्तीय नुकसान होने की घटनाएं हम देख चुके हैं। हर ऑपरेटिंग सिस्टम, सभी इंटरनेट सेवा प्रदाता और क्लाउड स्टोरेज सेवाएं इन्क्रिप्शन का प्रयोग करती हैं। ऐसा करके न केवल आंकड़े का आकार कम किया जाता है बल्कि उपयोगकर्ता और आंकड़े का ब्योरा भी छिपाया जाता है। अधिवक्ता और अंकेक्षक भी ऐसा करते हैं। ईकॉमर्स कारोबारी, बैंक, क्रेडिट कार्ड कंपनियां और अन्य वित्तीय सेवा प्रदाता भी ऐसा करते हैं। ईमेल, इंस्टैंट मैसेजिंग और सोशल मीडिया सेवाएं देने वाली कंपनियां भी ऐसा करती हैं। अनेक इन्क्रिप्शन सिस्टम मुफ्त उपलब्ध हैं। हाईस्कूल के स्तर की गणित और प्रोग्रामिंग जानने वाला कोई भी व्यक्ति नया इन्क्रिप्शन अलगोरिदम तैयार कर सकता है। ऐसे में हर ऐसे सिस्टम के पंजीकरण की बात ही बेतुकी है।

निजता मूलभूत अधिकार नहीं है तो….!

ravi-shankar-parsad-expressप्रौद्योगिकी से इतर मसौदे में विचित्र मानसिकता नजर आती है। इसमें बड़े पैमाने पर निजी और व्यक्तिगत जानकारी मांगी गई थी। अच्छा हुआ जो यह मसौदा वापस ले लिया गया। ऐसी घटनाएं निजता की रक्षा को लेकर सरकार के रुख पर भी सवाल खड़े करती हैं। खासतौर पर तब जबकि अतीत में यह दलील दी जाती रही हो कि निजता मूलभूत अधिकार नहीं है। उम्मीद की जानी चाहिए कि संशोधन के बाद निजता की चिंताएं दूर हो जाएंगी। सरकार को जल्दी ही एक व्यापक निजता सुरक्षा कानून लाना चाहिए ताकि ऐसे नियमों से प्रभावी तरीके से निपटा जा सके।

Vaidambh Media

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