निर्भरता की बेड़ियों के बारे में अभी काफी कुछ कहा जाना बाकी है !

महिला पुरुष समानता के बीच मौजूद है एक खाई !

New Delhi : हाल के वर्षों में कार्यस्थलों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर तमाम दलीलें सामने आई हैं। इनमें संस्थान के भीतर प्रतिभा के भरपूर इस्तेमाल से लेकर महिलाओं की पूर्ण आर्थिक क्षमताओं का इस्तेमाल करके वैश्विक अर्थव्यवस्था को तीव्र विकास के सक्षम बनाने जैसी तमाम बातें शामिल हैं ।End-Violence-web-tile इनमें से बाद वाली दलील मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट के एक हालिया विचारोत्तेजक अध्ययन का विषय भी थी। अन्य अध्ययन भी समय-समय पर आते रहे हैं जो हमें यह दिखाते हैं कि कैसे बोर्ड रूम में महिलाओं के मजबूत प्रतिनिधित्व वाली कंपनियां उन कंपनियों की तुलना में बढिय़ा प्रदर्शन करती हैं जहां महिलाओं का प्रतिनिधित्व अपेक्षाकृत कम है।किसी कारोबारी या आर्थिक गतिविधि में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना निश्चित तौर पर महिला पुरुष समानता की दिशा में उठाया गया एक अहम कदम है। किसी कामकाजी और पैसे कमाने वाली महिला की आजादी और श्रमशक्ति से बाहर रहने वाली महिलाओं की निर्भरता की बेडिय़ों के बारे में अभी काफी कुछ कहा जाना बाकी है। हां, श्रमशक्ति में महिलाओं की भागीदारी और समाज में महिला पुरुष समानता के बीच एक खाई मौजूद है जिसे सामुदायिक रुख कहा जाता है। उसे भरना भी जरूरी है क्योंकि उसकी वजह से ही एक निष्कर्ष दूसरे की अनिवार्य गारंटी नहीं देता।

महिला पुरुष समानता : दक्षिण एशिया का प्रदर्शन सबसे खराब !

उदाहरण के लिए मैकिंजी ग्लोबल स्टडी स्पष्ट सुझाव देती है कि समाज में महिला पुरुष समानता तब तक हासिल नहीं की जा सकती है जब तक कि कार्यस्थल पर इस तरह की समानता का माहौल न हो। men womenअध्ययन में दुनिया के 10 हिस्सों को शामिल किया गया है जो महिला पुरुष समता के हिसाब से दुनिया की 90 फीसदी महिला आबादी को दायरे में रखते हैं। आश्चर्य नहीं कि दक्षिण एशिया का प्रदर्शन सबसे खराब है। यहां तक कि पश्चिम एशिया, उत्तरी अफ्रीका और सब सहारा अफ्रीका से भी खराब। ध्यान देने लायक बात यह है कि महिला पुरुष समानता को जिन निष्कर्ष आधारित संकेतकों पर आंका जाता है, काम की समानता भी उनमें से एक है। अन्य तीन इस प्रकार हैं: अनिवार्य सेवाएं और आर्थिक अवसरों का निर्माण, कानूनी संरक्षण और राजनीतिक स्वर तथा शारीरिक सुरक्षा और स्वायत्तता। अलग-अलग देखा जाए तो आश्चर्य नहीं कि उच्च महिला पुरुष समानता वाले देश मसलन पश्चिमी यूरो और उत्तरी अमेरिका व ओशेनिया क्षेत्र के देश तीन अन्य कारकों पर बढ़त कायम किए हुए हैं।

महिला सुरक्षा के लिये अलग से वाहन संचालन करने की नौबत क्यों ?

परंतु यहां सवाल यह है कि इन देशों की प्राथमिकता क्या है? माहौल बनाना अथवा महिलाओं की श्रम शक्ति में अधिकाधिक भागीदारी ? pujaजाहिर सी बात है कि अलग-अलग देशों के लिहाज से उनके उत्तर अलग-अलग हैं लेकिन भारत इस बात का अच्छा उदाहरण है कि आखिर क्यों कैसे इनका आपस में अभिसरण जरूरी नहीं है और आखिर क्यों दोनों के विकास के लिए प्रगतिशील रुख अपनाना आवश्यक है। सूचना प्रौद्योगिकी और उससे जुड़ी सेवाएं इसका उदाहरण हैं। नई सदी में जिन उद्योगों में उछाल देखने को मिली उनमें महिलाओं की भागीदारी काफी ज्यादा है।ledy bus पिछले 15 साल में, सूचना प्रौद्योगिकी के दबदबे वाले शहरों में महिलाओं के लिए माहौल अपेक्षाकृत बेहतर हुआ है। उदाहरण के लिए अधिकांश यूरोपीय अथवा अमेरिकी शहर और पूर्वी व दक्षिणपूर्वी एशिया के वे शहर जहां कार्य बल में महिलाओं की भागीदारी अच्छी है, वहां महिलाओं के लिए देर रात में अकेले यात्रा करना भी आसान है। भारत में सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी सेवाएं देने वाली कोई कंपनी महिलाओं को देर रात सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करने देने का जोखिम नहीं उठा सकती। शारीरिक सुरक्षा महिलाओं को फैक्टरियों और कार्यालयों में लाने की ओर पहला कदम है। लेकिन देश के अधिकांश शहरों में वह पूरी तरह नदारद है। मुंबई और कोलकाता जैसे शहर जिन्हें एक समय ठीक माना जाता था वहां भी हालात में तेजी से गिरावट आई है। नतीजतन देर रात तक काम करने वाली महिला कर्मचारियों के लिए सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था करनी पड़ती है जिससे काम की लागत में इजाफा होता है।

स्वतंत्र महिलाओं के उदय ने सार्वजनिक बहस को रूढि़वादी बना दिया ?
womendayशहरी भारत की बात करें तो स्वतंत्र आय और जीवनशैली वाली महिलाओं के उदय ने सार्वजनिक बहस को आक्रामक रूप से रूढि़वादी बना दिया है। कुछ शहरों में कामकाजी महिलाओं पर पब और बार में जाने के लिए हमला किया गया। राजनेता और सार्वजनिक आचार व्यवहार के स्वयंभू ठेकेदार खुलकर इस बारे में अपनी राय रखते हैं कि महिलाओं को उनके हिसाब से कैसे वस्त्र पहनने चाहिए और किस तरह का व्यवहार करना चाहिए। यह सब मिलकर कामकाजी महिलाओं के लिए प्रतिकूल माहौल तैयार करता है।

कौन जिम्मेदार है ?

आखिर में, कारोबारी परिदृश्य और रवैये में आए स्पष्ट बदलाव पर विचार कीजिए। यह बात ध्यान देने लायक है कि भारतीय मूल की किसी सूचना प्रौद्योगिकी अथवा उससे संबंधित सेवाएं प्रदान करने वाली कंपनी (जिनमें बड़ी संख्या में महिला कर्मचारी कार्यरत हैं) में से किसी का नेतृत्व महिलाओं के हाथ में नहीं है। working women इसकी तुलना एक्सेंचर, आईबीएम, कैप जेमिनाई, एचपी, फेसबुक, इंटेल जैसी कंपनियों से कीजिए जिनमें महिलाएं मुख्य कार्यकारी के रूप में काम कर रही हैं। भारत के इस प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र में कामकाजी बल में भले ही महिलाओं की भागीदारी काफी बढ़ी हो (मातृत्व अवकाश और बच्चे की देखरेख की छुट्टिïयों के मामले में भी इसने मानक तय किए हैं) लेकिन इसने महिला पुरुष समता के मामले में कुछ खास नहीं किया। इसके लिए कौन या क्या जिम्मेदार है ?

कनिका दत्ता  (B.S.)

Vaidambh Media

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