नेता जी, क्यों दें भाई आपको वोट!

वोट जरूर दें, ये आप का अधिकार है। इस बार चूके तो पाॅच साल पछताना पड़ेगा। एक सभ्य व लोकतांत्रिक देश के नागरिक का प्रथम कर्तब्य है अपने मत का प्रयोग करना। सुन-सुन के कान पक गये, चलो भाइर्, वोट देंगंे। पर किसे और क्यों ? विकास का वादा करने वालों को या शेखी बघारने वालों को अथवा कानून को ठेंगे पर रखने वालों को। जो देश की सबसे बड़ी पंचायत मे बैठकर देश व देशवासियों के तकदीर का फैसला करेंगे उन लोगों के लिये चुनाव आयोग कुछ नही है तो हमारा ग्राम प्रधान अगर आप की प्रेरणा से थानेदार को पीट देता है तो बुरा क्या है? सवाल में दम है ना।आपकी तुच्छ हरकतें देश को कितने बड़े खतरे में धकेल रही हैं मंच से बोलते समय क्या नेताजी लोग कभी इस बात का ख्याल रखते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से तो चुनाव मैदान मे खड़े ,बड़बोले ,सभी अपराध कर रहे हैं जो विधि सम्मत ब्यवस्थाओं का खुलेआम मजाक उड़ा रहे है। क्या ये कानून से उपर हैं? ये सरेआम कीचड़ एक दूसरे पर उछाल कर देश के विकास की बात करते हैं। बॅटवारे की राजनीति से कौन स्वयं को बचा रहा है। किसी के टोपी की इबारत बदल रही है तो कोइ साॅफा बाध्ॅाता है और टोपी से परहेज करता है। कोइ रिमोट से देश कंट्रोल करने की फिराक में है। किसी को देश के भीतर बिहारी,बंगाली बाहरी लगतें हैं तो कोई प्रदेश में अहिर, ब्राम्हण और दलित, मुस्लिम मत ढूढ़ रहा है। क्या हमें इन्ही मे से किसी एक को चुनना होगा? क्या इनमें से कोई इमानदारी से काम करने का इरादा रखता है? शहर बसा कर गाॅव उजाड़नें वाले किसान की नजर में अराजक होते हैं। गाॅव हमारे देश की आन-बान व शान का प्रतीक है। हमारी संस्कृति खतरे में है। राष्ट्रभक्त नेतागण आप से निवेदन है कि आप अपने इरादे जनता के बीच स्पष्ट रखें। आप चाहे जितना हमें तोड़ेंगे,हम कण-कण में विखर जायें तो भी हमें एकजुट होना आता है। कभी भ्रम हो तो कण-कण से बने हमारे प्रतिबिम्ब जानने के लिये हिमालय को जरूर देखिये। शायद थोड़ी शर्म आप लोगों मे बची हो! अब से तेरी-मेरी छोड़ मुद्दे की बात
हो ।अंधी दौड़ से बाहर निकल कर इस बात पर बहस हो कि गाॅव व किसान वैश्विक स्तर पर कैसे आगे बढ़े। उद्योग कृषि आधरित कैसे हों। गन्ना किसानों व मिलों की बहाली कैसे हो। भारत का क्यूबा कहा जाने वाला पूर्वांचल आगे कैसे बढ़े। भारत को भारत बनकर नही समझने वाले नेताओं तुम्हारा हश्र बहुत बुरा न हो जाय सम्भल जाओ। अमेरिका मे सब अमेरिकी हैं इसलिये विकास की तिब्रता है। जापान में बच्चा बोलना शुरू किया कि सबसे पहले राष्ट्र धर्म व राष्ट्र भक्ति की घुट्टी पिलाई जाती है। किसी भी देश का विकास मशीनों ने नही किया बल्कि उस देश के भावनात्मक ,समर्पित लोगों ने किया। राष्ट्र प्रेम टुकड़े-टुकड़े मे बाॅटा जा रहा है। देशवासी कोई दिखता नही। अलग-अलग तरह से राष्ट्रभक्ति के दावे और उसमे भी हिस्सेदारी की मारामारी। कोई तो तस्वीर साफ करो किसे वोट करें। उम्मीदवार पसंद नही तो नोटा बटन दबाओ। नोटा को कोई अधिकार आपने दिया! वह तो उसी तरह है कि हम अपने घर बैठ कर चुनाव मे खड़े शुरमाओं का विरोध करें। पर तटस्थता आपको स्वीकार नही। खुद सुधरते नही हमें मौका नही देना चाहते और कहते हो देश का विकास करेंगे।
देश का विकास करना है तो देश का सुनना पड़ेगा। हरियाली का विनाश कर कंकरीट के बाग खड़ा करने वाला विकास कितनो को स्वीकार्य है।खेती उजाड़ कर उद्योग नही, कृषि उद्योग बिना गाॅव उजाड़े बसाने की बात करो फिर हमे विश्वास होगा कि शायद तुम सच बोल रहे हो।
जय हिंद !

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