नेपाली संविधान : नेपाल में अस्थिरता का बीज !

कर्फ्यू  के बावजूद मधेश में आन्दोलन जारी !

 Pokhara : नेपाल हिंसा में झुलस रहा है। भारत से लगे मधेस इलाकों में NEPALआंदोलन के हिंसक होने के बाद लागू कर्फ्यू  से कोई अंतर नहीं आया। लोगों की जानें जा रही हैं, लेकिन उनका सड़कों पर आना रुका नहीं ।  नाकेबंदी के चलते भारत से सामान  आपूर्ति बाधित हो रही है। आश्चर्यजनक यह है कि नेपाल के नेतागण इसका आरोप भारत पर मढ़ रहे हैं । ऐसा माहौल बनाया जा रहा है जैसे कि भारत नेपाल को गुलाम बनाना चाहता हो।

भारत का विरोध कर राजनीति चटकाने में लगे कम्युनिष्ट !

prachand माओवादी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रमुख प्रचंड  जैसे जिम्मेदार ;  सुनने पर गैर जिम्मेदाराना बयान दे रहे हैं उन्होने कहा कि सुना है भारत हमारी रसद, तेल आदि की आपूर्ति रोक रहा है। हम मोटर के बजाय साइकिल पर चल लेंगे लेकिन उनके तलवे नहीं चाटेंगे। यह नेपालियों के स्वाभिमान का प्रश्न है। हम भारत की जी-हुजूरी नहीं कर सकते। अपनी राजनीति की रोटी को आॅच देने के लिये कुछ अन्य भी बयान में शामिल हैं। उदाहरण के लिए, नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (यूएमएल) के नेता माधव कुमार नेपाल ने कह दिया कि हम पड़ोसी से अच्छे संबंध चाहते हैं, पर यदि कोई हमसे जी-हुजूरी चाहता है तो नेपाल यह करने वाला नहीं। वास्तव में काठमांडो से लेकर पूरे पहाड़ के इलाकों में भारत-विरोधी भावनाएं भड़का दी गई हैं। भारत-विरोधी माहौल इतना उग्र कर दिया गया है कि जो नेता कल तक भारत के समर्थक माने जाते थे वे भी मुखालफत में बोलने लगे हैं।

आंदोलन का ठीकरा भारत पर क्यो फोड़ रहे नेपाली नेता ?
MADHE NEPAL  स्पश्ट है  प्रचंड ऐसा बयान देने वाले अकेले नेता नहीं हैं। हलांकि अभी तक भारत की ओर से कोइ टीका टिप्पणी नहीं की गई है।  भारत ने कभी नहीं कहा कि वह किसी प्रकार की आपूर्ति बंद कर रहा है,  फिर प्रचंड ने ऐसा क्यों कहा?
यह हर दृष्टि से दुर्भाग्यपूर्ण है। समस्या नेपाल की अंदरूनी है। नेपाल के नेता अपनी विफलताओं का ठीकरा भारत केसिर फोड़ना चाहते हैं।MAP अगर संविधान में दोष हैं, उनकी प्रक्रिया में दोष हैं, उनके विरुद्ध आंदोलन से भारत की सीमा पर समस्याएं हो रहीं हैं, मधेसी भारत से मध्यस्थता की मांग कर रहे हैं तो भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता। भारत का विरोध करने वाले राजनीतिक भूल रहे हैं कि भारत मधेसियों की भावनाओं को नकार नहीं सकता, खासकर तब जब उनकी मांगें वाजिब हों। श्रीलंका के तमिलों की समस्या जिस तरह भारत की समस्या हो जाती है उससे भी कहीं ज्यादा परिमाण में मधेसियों की समस्या भारत की समस्या हो जाती है। हमारी लाखों बेटियों की ससुराल मधेस में है। वहां की लाखों बेटियां हमारे यहां शादी करके आर्इं।

 अब भारत के पास मधेसियों  के साथ आवाज लगाने

के अलावा कोई विकल्प नहीं !
Flag-Pin-Indo-Nepal     यह कई पुश्तों से चल रहा है। इस तरह रोटी-बेटी का रिश्ता है। भारत कैसे चुप रह सकता है? खासकर जब वर्तमान स्वीकृत संविधान में उनके साथ भेदभाव किया गया हो और उनके प्रति दी हुई वचनबद्धता का पालन न हुआ हो। वास्तव में भारत के सामने मधेसियों की मांगों के साथ आवाज लगाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए भारत ने कहा है कि नया संविधान न समावेशी है और न ही उस पर सहमति है। विदेश मंत्रालय की खबरों पर विश्वास करें तो नेपाल सरकार को भारत ने बता दिया है कि गैर-बराबरी और अस्थिरता पैदा करने वाला नया नेपाली संविधान मंजूर नहीं किया जा सकता। भारत ने नेपाली नेताओं से नए संविधान की खामियां दूर करने को कहा है।

 सम्भव  है  श्रीलंका की पुनरावृत्ति !
sri-lanka-genocide-state-terrorसच यही है कि इस संविधान के द्वारा नेपाल ने अपने यहां अस्थिरता का बीज बोया है। अगर वह इसे ठीक नहीं करता तो फिर वहां भी श्रीलंका की पुनरावृत्ति हो सकती है। यह नेपाल के हित में है कि जो भी गलतियां हो गई हैं उन्हें वह दूर करे। तीन दिन में बिना बहस के विप के जरिए संविधान को मंजूरी दिलाना वहां की बहुमत आबादी की आवाज को दबाने वाला कदम है। मनमाना संविधान स्वीकृत करने के लिए कई संसदीय प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया। अगर संविधान को सरसरी तौर पर भी देख लें तो साफ दिखाई देगा कि आम सहमति से तैयार उस अंतरिम संविधान को लगभग उलट दिया गया है जिसमें तराई और मधेसियों को बराबरी का हक दिया गया। यह संविधान न्याय करने वाला नहीं है। भारत नेपाल के नेताओं की इच्छा के अनुरूप ही संविधान निर्माण के पीछे सक्रिय रहा है।

बातचीत का आधार क्या होगा?
prime-minister-of-nepal-eनेपाल के प्रधानमंत्री, जिन्हें अब नए संविधान के तहत पद-त्याग करना है, स्वयं चलकर संयुक्त लोकतांत्रिक मधेस मोर्चा के कार्यालय आए थे। वहां उपस्थित लोगों ने उनसे कहा कि आप लोगों ने लंबे समय से हमें गुलाम बना कर रखा है और आपने संविधान में फिर हमारी वही स्थिति बना दी है जिसे हम स्वीकार नहीं कर सकते। कोइराला को उलटे पांव वापस जाना पड़ा। उन्होंने पहले बातचीत की भी अपील की थी, पर बातचीत तो संविधान स्वीकृति के पहले होनी चाहिए थी। जब उस पर राष्ट्रपति रामबरन यादव ने हस्ताक्षर कर दिया, उसे लागू करने की घोषणा कर दी गई तो फिर उसमें बातचीत का आधार क्या होगा? बातचीत तो तभी होगी जब नेपाल के वर्तमान नेतागण स्वीकार करें कि वे इसमें उस तरह से परिवर्तन को तैयार हैं जैसी पहले सहमति बनी थी।
आखिर सहमति क्या थी?

संविधान ऐसा बने कि मधेस लोगों की आबादी के अनुरूप संसद और प्रांत की विधायिकाओं में प्रतिनिधित्व मिले। उन्हें प्रमुख नौकरियों, प्रशासन, पुलिस, सेना में उचित प्रतिनिधित्व मिले। एक मधेस एक प्रदेश की बात मधेस नेता कर रहे थे। ले-देकर आठ प्रदेश बनाने पर सहमति बनी थी। जो सामने आया वह क्या है? यह हर दृष्टि से क्षेत्रीय SAHMATIऔर जातीय असंतुलन वाला संविधान बन गया।
जरा सोचिए, नेपाल की एक सौ पैंसठ सदस्यीय संसद में इक्यावन प्रतिशत जनता का नेतृत्व केवल साठ से पैंसठ प्रतिनिधि करेंगे। इससे तराई और मधेसियों को न्याय कहां मिला? सरकार उनके उनचास प्रतिशत होने की बात कहती है, जबकि मधेसी स्वयं को इक्यावन प्रतिशत से ज्यादा मानते हैं।
Nepal-new-constitution- NEPAL नेपाल के नए संविधान ने ज्यादा प्रतिनिधि पहाड़ी इलाकों से आने के प्रावधान बना दिए। अंदर के राजनीतिक-भौगोलिक विभाजन में आठ राज्य बनाने की जगह आपने सात राज्य बना दिए। उनकी भौगोलिक परिमिति इस तरह बनी है कि हर प्रदेश में मधेसी अल्पसंख्यक हो जाएं और पहाड़ी बहुसंख्यक। इससे राजनीतिक सत्ता में मधेसियों का प्रतिनिधित्व अपने आप कम हो जाएगा। सात प्रदेशों के सीमांकन में भी खामियां हैं। दो मधेस प्रदेशों के सीमांकन में एक में जहां पहाड़ के चार जिलों को शामिल कर विवाद खड़ा किया गया है वहीं दूसरे मधेस प्रदेश में औद्योगिक विकास का एक भी कॉरिडोर नहीं है।

मधेसियों के साथ समानता क्यों नहीं ?
NEPAL PR   अगर पहले से मधेसियों के साथ समानता का व्यवहार किया गया होता, उन्हें हर क्षेत्र में समुचित प्रतिनिधित्व मिला होता तो शायद आवाज नहीं उठती। नेपाल का नेतृत्व करने वाले नेताओं ने आरंभ से ही मधेसियों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार किया। लाखों की संख्या में मधेसियों को नागरिकता के अधिकार से भी वंचित रखा गया। लंबा आंदोलन चला, तब जाकर नागरिकता देने की स्वीकृति दी गई। लंबे समय तक मधेसियों को काठमांडो जाने के लिए परमिट की आवश्यकता होती थी। प्रशासन से लेकर संसद में उनका प्रतिनिधित्व 2 से 7 प्रतिशत तक सीमित रहा। नेपाली रेडियो से हिंदी का प्रसारण तक बंद कर दिया गया। इनकी भाषाओं भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका को मान्यता नहीं दी गई। विद्यालयों तक में हिंदी की पढ़ाई बंद हो गई। अब जब से वे जागृत हुए हैं, अपने अधिकारों की मांग कर रहे हैं, तो इन नेताओं को समस्या हो रही है!

नेपाल तभी स्थिर होगा जब मधेसी – पहाड़ी दोनों के बीच एकता हो !
Nepal_s_Politic63  नेपाल एक देश के रूप में तभी सुखी, समृद्ध और स्थिर रह सकता है जब मधेसी और पहाड़ी दोनों के बीच एकता हो। संविधान इस एकता को परिपुष्ट करने वाला होना चाहिए, जबकि यह एकता को तोड़ने वाला है। संविधान में बहुत सारे अच्छे प्रावधान हैं। नेपाल को एक पूर्ण संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य बना दिया गया है। संघवाद की भावना और लोकतांत्रिकता तो तब होगी जब इसमें स्वाभाविक रूप से क्षेत्रीय संतुलन की स्थापना के तत्त्व हों। जबकि राज्य ऐसे बना दिए जिनमें पहाड़ी ही बहुमत में रहें। आरक्षण, कोटा प्रणाली लगा दी, लेकिन तराई के आदिवासियों थारुओं, लिम्बुआन आदि को दोयम दर्जे का बना दिया। इसलिए जिन आदिवासियों को पहले इन नेताओं ने मधेसी मोर्चों से अलग करा दिया था, वे भी साथ मिलकर आवाज उठा रहे हैं।

भेदभावपूर्ण संविधान क्यों ?
sambidhan-masyauda     यह संविधान मधेसियों के लिए कितना भेदभावपूर्ण है इसका एक उदाहरण देखिए। इसमें लिखा है कि विदेशी लड़की अगर शादी करके नेपाल आती है तो उसे पंद्रह वर्षों बाद अंगीकृत नागरिकता मिलेगी और उसका बच्चा भी अंगीकृत नागरिक होगा। यानी उसे वहां की राजनीति में भाग लेने का अधिकार नहीं होगा, न वह शासन के शीर्ष पद की ही अर्हता रखेगा। जरा सोचिए, ऐसी स्थिति में कोई भारतीय क्यों वहां अपनी लड़की ब्याहेगा? विदेश में सबसे ज्यादा तो भारत में ही उनकी शादियां होती हैं। जाहिर है, हम नेपाल के साथ बेटी और रोटी का जो संबंध कहते हैं उसका भी स्थायी पटाक्षेप करने का प्रावधान इसमें डाल दिया गया है।
कुल मिलाकर यह संविधान नेपाल को विरोध, विद्रोह और अलगाववादी सोच की ओर धकेलने का साधन बन रहा है। भारत के खिलाफ आग उगल कर या इसे आक्षेपित करके नेपाली राजनीतिक नेतृत्व इसका समाधान नहीं कर सकता । भारत नेपाल की बेहतरी चाहता है, लेकिन यह बेहतरी पहाड़ी और तराई दोनों क्षेत्रों के लोगों के बीच समानता से ही संभव है। इसलिए संविधान में तुरंत इसके अनुरूप संशोधन करना चाहिए।

Vaidambh Media

Previous Post
Next Post

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

hogan outlet online scarpe hogan outlet nike tn pas cher tn pas cher nike tn 2017 nike tn pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher air max pas cher scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet scarpe hogan outlet chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher chaussures louboutin pas cher