नैतिक बोले तो, लाल बहादुर शास्त्री

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का अपना मत है कि लाल बहादुर शास्त्री जैसे जमीनी व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने से हमारा लोकतंत्र सफल हो गया। वर्तमान प्रधानमंत्री श्री मोदी उन्हे 2 अक्टूबर को उनके जन्मदिवस पर भूल गये, ऐसा मुझे इस लिए लगता है क्योंकि मीडिया में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं मिला। स्पष्ट कर दूं कि मोदी साहब चेहरा दाये घुमायें या बांये मीडिया सारे काम छोड़कर ये बातें जनता को बताती है।
अभी प्रधानमंत्री, हरियाणा व महाराष्ट्र विधानसभा की चुनावी कमान संभाले हुए हैं। इसके पूर्व मैराथन विदेशी दौरा करके जैसे ही देश पहुंचे, गन्दगी साफ करने के लिए झाडू उठा लिये। ये सब इतना तेज होने का कारण विद्वान लोग मोदी साहब का 20 घण्टे काम करना बताते हैं। यदि हम इस बात को ध्यान से सुनें तो अर्थ निकलेगा कि इनके पूर्व के प्रधानमंत्री काम करने में ज्यादा वक्त लेते थे। महोदय! यदि भारत के लाल, लाल बहादुर शास्त्री को स्मरण कर लिये होते तो आपकी ये गलतहफमी दूर हो जाती। पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब किसी ने दिया तो वह वही भारत का लाल था और दुनिया ने पहली बार भारत की सामरिक शक्ति का लोहा माना। वर्तमान सरकार को 60 साल के लोकतांत्रिक देश में विकास अब तक नहीं दिखा। काश! एक बार भारत के दूसरे प्रधानमंत्री के कार्यकाल का अवलोकन करते तो विकास का मतलब समझ में आता। भारत के लोग प्रकृति प्रेमी है। पश्चिमी देश प्रकृति से लड़ते हुए जीवन व्यतीत कर रहे हैं। आजकी सरकार उनके विचारों से प्रभावित है जो आगे के लिए खतरनाक है।
सफाई के लिए महात्मा गांधी भी कहते थे, प्रधानमंत्री भी कह रहे हैं। महात्मा गांधी के पास भावनात्मक अपील श्रद्धा पात्र लोग थे। प्रधानमंत्री के पास बना बनाया सिस्टम है। लाल बहादुर शास्त्री ने अपने समय में दोनों का प्रयोग सही समय देखकर किया और अब तक के प्रधानमंत्रियों की अपील पर पहल कराने में अव्वल रहे।
शास्त्री जी ने कभी नहीं कहा कि वे झोपड़ी में जन्मे, गरीबी के पालने में झूले, हां इसे वह याद जरूर रखते थे। प्रधानमंत्री बनने पर जब उनके आवास में कूलर लगा तो उन्होंने बड़ी सादगी से कहा कि हमारे परिवार को इसकी आदत नहीं पड़नी चाहिए। इसलिए इसे आवास के बजाय जनता दरबार में लगा दो। स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमण्डल में रेल मंत्रालय संभालने वाले शास्त्री जी ने अपना प्रथम बजट लोकसभा में हिन्दी में पेश किया। कुछ लोगों के रूष्ट हो जाने पर उनके जवाब अंगे्रजी में देकर सबको साथ लेकर चलने की क्षमता प्रदर्शित की। एक रेल दुर्घटना पर नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए त्याग पत्र दे दिया। वह सच्चे लोकतंत्रवादी थे।
संघर्ष की आग में तपकर कुन्दन बने शास्त्री जी को भूख-प्यास की पहचान थी। वह गरीबी को ढंग से जानते थे। सनातन संस्कृति के प्रतीक लाल बहादुर शास्त्री सच्चे भारतीय थे। इसी दम पर उन्होंने राष्ट्र से उपवास की अपील की। देश की जनता ने न केवल इसका सम्मान किया बल्कि यह दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में दर्ज हो गया। उन्होंने जवान व किसान को महत्व देकर हरित क्रान्ति के जरिये कृषि व रक्षा दोनों को बल दिया। ये सब कुछ आज भी प्रासंगिक है। दुःख है कि आज विचार और भारत दोनों पीछे हैं, व्यक्ति और व्यक्तित्व आगे निकल गए। भारत आज भी स्वाभिमानी है परन्तु उसके दरबार के कुछ चारण व भाँट अमेरिकी धुन बजाकर चाइनीज गीतों पर थिरक रहे हैं।
शास्त्री जी जैसे नेक दिल महापुरूषो का भारत को सदैव इतंजार है। हम उम्मीद करते हैं कि वर्तमान सरकार उनके विचार व व्यक्तित्व से भारत के लिए कुछ उम्दा कर सकेगी।

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