नोटबंदी : सरकार के युवावस्था में अब दिखनें लगीं झुर्रियाॅ !

 नहीं प्राप्त हो सके नोटबंदी के लिए तय लक्ष्य !

photo : hindustan times

 New Delhi : अति उत्साह में उठाया गया कदम हर बार सही पड़े यह कदापि सम्भव नहीं। इसीलिये सूझ-बूझ से र्धर्य पूर्वक कार्य को अंजाम देने की बात विद्वजनों द्वारा समझाई गयी है। देश में बहुचर्चित नोटबंदी के अब परिणाम आने शुरु हो गये हैं। सरकार का हाल इस एक महत्वाकाॅक्षी कदम ने युवावस्था में झुर्रियाॅ दिखनें जैसा कर दिया है। कह सकते हैं सरकार जो सफलता चाहती थी वह नहीं मिल पायी। 8 नवम्बर 2016 को रात्री 9 बजे के बाद से ही आम चलन में रहे भरतीय नोट प्रधानमत्री की आकस्मिक घोषणा के साथ लेन-देन के लिये प्रतिबंधित कर दिये गये। ये नोट थे 500 और 1000रुपये के। ये नोट उस समय कुल प्रचलित मुद्रा का 86 प्रतिशत थी। यानीं देश की 86 प्रतिशत की जिम्मेदारी उठानेवाली ब्यवस्था को एकाएक बिना किसी पूर्व संसदीय चर्चा के रोक दिया गया। इसके पीछे काफी दिनों तक तर्क दिया जाता रहा कि यह काले धन के उपर सबसे बड़ा प्रहार है। इनमें नकदी के रूप में भंडारित काले धन का खात्मा, सरकार को प्रचुर लाभ, देश के भुगतान तंत्र के डिजिटलीकरण और बचत को वित्तीय परिसंपत्तियों में बदलने जैसी बातें भी शामिल रहीं। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को वार्षिक रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि नोटबंदी में बंद कुल नकदी में से 99.3 प्रतिशत नोट बाद के दिनों में सरकार की घोषणा के मुताबिक विभिन्न बैंकों में बदल लिए गए। आरबीआई की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि उसने अंतिम आंकड़े जारी करने में सावधानी बरती, भले ही ये आंकड़े मौजूदा सरकार के लिए राजनीतिक रूप से शर्मिंदगी भरे क्यों न साबित हों। नीतिगत दृष्टि से देखें तो अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि नोटबंदी के लिए तय लक्ष्य प्राप्त नहीं हो सके।

  भाषण तक सिमित रह गये नोटबंदी के संभावित लाभ !

वर्तमान केन्द्र सरकार का सर्वाधिक आशावादी दृष्टिकोण दो अनुमानों पर आधारित था पहला कि बहुत बड़ी मात्रा में नकदी को कर अधिकारियों से छिपाकर रखा गया है। दूसरा अनुमान था कि यह नकदी तंत्र में वापस नहीं आएगी। उचित कर दर पर नकदी की वापसी तो बिल्कुल ही नहीं। नकदी उच्च कर दर पर वापस आती तो सरकार को खासा फायदा पहुॅचता । 99.3 प्रतिशत बंद नोटों की वापसी ने इस अंाकलन की धज्जियां उड़ा दीं। अन्य संभावित लाभ भी भाषण तक सिमित रह गये। आर बी आई आज भी उस बीमारी से परेशान है जिस कारण नोटबंदी की गई थी । यानि फेक करेंसी की छपाई व बाजार में वितरण। ऐसी कोई जानकारी सामने नहीं आई है कि नकली नोट बनाने वाले नए नोटों की नकल नहीं कर पा रहे हैं। इसके अलावा चूंकि 500 और 1,000 रुपये के नोट की जगह 2,000 रुपये के नोट जारी किए गए तो यह भी स्पष्ट नहीं होता है कि उच्च मूल्य मुद्रा में होने वाले लेनदेन या भारी भरकम नकद राशि के भंडारण पर रोक कैसे लगेगी ? जाहिर है केंन्द्र सरकार को अपेक्षिक सफलता नहीं मिल सकी है। अलबत्ता ये चैंकाने वाली बात है कि सरकार के इस कदम से सभी सहमें हुए थे । सभी की नजरों मेें एक अनजाना चोर देखा जा सकता था। एक दूसरे पर शक, बनते -बिगड़ते – गढ़ते भी देखा गया। सरकार द्वारा नोटबंदी की घोषणा के विरुद्ध आंदोलन न खड़ा होने के पीछे एक दूसरे पर शंका बहुत बड़ा हथियार साबित हुआ। किसी ने कोइ्र आन्दोलन – सवाल तक खड़े नहीं किये। सब नोट बदलनें में लगे रहे। हमारे देश में भुगतान लेन-देन के तरीके नकदी ही चलन में आम व विश्वसनीय हैं। बैंक में फर्जीवाड़े व गबन की खबरों से पढ लिखा तबका भी बैकिंग से परहेज करता है। ऐसे में वित्तमंत्री जेटली को पहले भारत को समझना होगा फिर कैशलेश की वकालत करनीं होगी। यदि इसे मजबूती से लागू करना है तो ये जिम्मेदारी बैंको को देनी होगी कि वे कैशलेश ब्यवस्था को पटरी पर लायें। कानून बनाकर देश में कैशलेश ब्यवस्था लागू करने का मतलब होगा बहुत सारे ब्यापार व रोजगार को प्रभावित कर देना । इस तरह तो जैसे सरकार चाहती है यह देश के जनहित में कभी नहीं हो सकेगा। 2000 के नोट सामान्य लेन-देन में मुश्किल है पर स्टोर करने लायक है। बैंक से बचाकर कुछ पूंजी घर रखने की भारतीयों की आदत व परम्परा में है। सरकार की जो मंशा है वह एक मजबूत प्रशासनिक प्रक्रिया संचलन से ही सम्भव होगी! विद्वानों के अनुसार 2000 की नोट अर्थशास्त्र के सिद्धांत मुद्रा मूल्य सिद्धांत पर खरी नही उतरती।

आम घरों के लिये बज्र बन गई नोटबंदी !
नोटबंदी का सबसे निराशाजनक परिणाम, आम घरों की बचत पर नकारात्मक प्रभाव से पड़ गया। आरबीआई ने बीते वर्षों के दौरान आम घरों की बचत के जो आंकड़े जारी किए हैं काफी निराशाजनक हैं। आम पारिवारिक बचत में छोटे असंगठित क्षेत्र के उद्यमों की बचत भी शामिल की जाती है। नोटबंदी ने इन्हें तगड़ा झटका दिया है। कहने के लिये तो आम पारिवारिक बचत 11 फीसदी सकल राष्ट्रीय व्यय योग्य आय के साथ कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर है । परन्तु सच्चाई ये नहीं है! सच यह है कि आम परिवारों के पास अब नोटबंदी के पहले से ज्यादा नकदी बचत के रूप में है। बैंक जमा में आई उल्लेखनीय गिरावट की यह भी एक वजह है। दूसरे शब्दों में कहें तो बचत को वित्तीय तंत्र में लाने की कोशिश पूरी तरह नाकाम रही है। आज सकल घरेलू उत्पाद में नकदी का अनुमान ऐसे स्तर पर पहुंच चुका है जिसकी तुलना नोटबंदी के पहले के स्तर से की जा सकती है। ऐसा लगता है कि नोटबंदी से जो भी बदलाव आए वे सरकार की अपेक्षाओं से परे थे। अब आशा की जानी चाहिए कि सरकार भविष्य में नीतियां बनाते समय इस घटना से जरूरी सबक लेगी और नोटबंदी जैसे कदमों से बचेगी जिन्होंने अर्थव्यवस्था को स्पष्ट रूप से धक्का पहुंचाया। वर्तमान सरकार ने जिस उद्देश्य से नोटबंदी की उस पर लम्बे समय से कुछ विश्वस्त लोगों के साथ काम करने के बाद निर्णय लिया जाना चाहिये था। पर ऐसा नहीं हुआ। यहाॅ विशेषज्ञों पर नेता भारी पड़े और परिणाम मनमॅाफिक नही मिल सका।

                                                                                                                                                                                               Vaidambh Media

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