पराजित व कुण्ठित मानसिकता की कूटरचना ‘लव-जेहाद’

विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत, यहां विविधता में एकता के संगम का दर्शन होता है। यह देश का सबसे खूबसूरत चेहरा है। इस खूबसूरती को भद्दा बनाने वालों की भी यहां कमी नहीं है। कोई बहुसंख्यक का दम्भ भरता है तो कोई अल्पसंख्यक का रोना रोता है। सत्ता की भूख शान्त करने का यह सबसे सस्ता माध्यम है। अपने-अपने अंदाज में गोलबन्दी कर रहे कुण्ठित मानसिकता के व्यथित सन्तों की इस क्षेत्र में भरमार है। लोकतंत्र की इस बड़ी सी प्रयोगशाला में राजनीतिज्ञ कम, संत, मौलवी, व्यापारी व गुण्डों की संख्या सर्वाधिक है। शायद यही कारण है कि हमारे लोकतंत्र की हवा कभी-कभी निकल जाती है। यहां दंगो का भी अपना मौसम है। चुनाव खत्म होते ही दंगे खत्म हो जाते है। ऐन चुनाव पर जिस पार्टी ने इस मुद्दे को उछाल दिया उस पार्टी का कोई न कोई बंदा राष्ट्रीय पहचान बना लेता है।
महात्मा गांधी के विचारों के नये-नये वाहक बने प्रधानमंत्री श्री मोदी को ‘लव जेहाद’ जैसे प्रसंग पर अपने पार्टी नेताओं की क्लास लेनी चाहिए थी। गांधी जी एक दूसरे के धर्म में दखल देने वालों को राष्ट्रद्रोही मानते थे। उनका मत था कि शैव-वैष्णव भी लड़ते रहे हैं। हिन्दू-मुसलमान भी लड़ रहे हैं। ये कच्चे घड़े, जब तक पक नहीं जाते कोई भी ऐरा-गैरा कंकड़ मारकर स्वार्थ सिद्ध कर सकता है। इन्हे खूब पकने की आवश्यकता है। वेदान्ती संयासी स्वामी रंगानाथ नंद का मत है कि साम्प्रदायिक की पृष्ठिभूमि ही है कि धर्म राजनीति के अधीन रहे। वह मानते हैं कि इस प्रक्रिया ने धर्म और राजनीति दोनों को संकीर्ण, अनुदार, विभेदपूर्ण बना रखा है। ये सब वर्तमान राजनीति में प्रमाणिक है। आश्चर्य है कि राष्ट्रीय राजनीति में आज भी ऐसी बातों के लिए बकायदा स्थान बनाने का प्रयास जारी रहता है। दुर्भाग्यवश राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत भी ‘लव जेहाद’ मामले में रूचि रखते हैं।
प्यार में धोखा देकर धर्म परिवर्तन करा हिन्दू लड़कियों को मुस्लिम बनाने के कथित प्रचार ‘लव जेहाद’ बताया जाता है। गत उपचुनाव में अचानक चैनलों पर लव जेहाद का उद्घोष कर भाजपा के नेता, सांसद योगी आदित्यनाथ स्टार प्रचारक के रुप में उभरे। इसमें केन्द्रीय मंत्री कलराज मिश्र भी वाहवाही लूटने से पीछे नहीं रहे। क्या ये नेता विविधता में एकता का सम्मान कर पाए? हैदराबाद के ओवैसी बन्धुओ देश में हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलते समय यह क्यों भूल जाते हैं कि विश्व में कहीं मुसलमान सुरक्षित है तो वह देश भारत ही है। ऐसे नेता जो धर्म विशेष के विरूद्ध बयानवाजी करते हैं उन्हें कुरान की कुछ सहिष्णु हिदायतें क्या उस समय उन्हें इसकी इजाजत देती हैं! ‘ला इकराहफिद्दीन’ अर्थ है धर्म के मामले में जबरदस्ती नहीं। ‘लाकुम दीनोकुम वलीयदीन’ अर्थ है तुम्हारा मार्ग तुम्हारा, हमारा मार्ग हमारा। भारत में आज भी इस्लाम समृद्ध है। सूफी संत, दरवेश, पीर, फकीरों ने इसकी उन्नति में अपना अनुपम चरित्र, सरलता, कष्ट, सहिष्णुता व आडम्बरहीनता की औषधि से रोगमुक्त कर पुष्पित पल्वित किया है।
आज युवाओं को भटकाव में रखने वाले नेतागण उन्हें यह कभी बताने की कोशिश नहीं किये कि विकास व धर्म में क्या संबंध है। वे अपने ओजस्वी समझने जाने वाले भाषणों के सहारे जिन युवा हाथों में अस्त्र-शस्त्र थमा देते हैं, उनमे से कितनो को रोजगार दिया? ये सवाल उनके लिए गौड़ है। यदि ऐसा नहीं कर सकते तो बंद करों धर्म की ठीकेदारी, जो स्वयं धर्म धारण नहीं कर सकता, उसे धर्म का पाठ पढाने का अधिकार नहीं। हमारे देश में मीराबाई, गार्गी, मांधाता, सत्यवती, द्रोपदी, राधा, रूकमणि जैसी विदूषी व प्रेम की परिभाषा दुनिया को बताने वाली महिलाओं ने समाज को समय-समय पर नयी दिशा दी है। ‘लव जेहाद’ के नाम पर क्या आज की सभ्य व युवा महिलाओं के साथ-साथ इन महान विभूतियों का अपमान नहीं है। उन्हें जो महिलाओं को सहेजने की बात करते हैं सार्वजनिक माफी देश की युवा महिलाओं से मांगनी चाहिए। क्या जो मार्ग सांसद योगी आदित्यनाथ तय करेंगे, उसी मार्ग का अनुसरण हिन्दू युवतियों को करना होगा? किरण वेदी, कल्पना चावला, लता मंगेशकर, मायावती के इस युग में महिलाएं क्या अभी इतनी भोली है कि कथित ‘फरेब’ लव जेहाद का शिकार बन जायेगी। यदि ऐसा महिलाओं के साथ है तो पुरूषों के साथ क्यों नहीं? यह कुण्ठा नही तो और क्या है, कि मुस्लिम लड़कियां हिन्दू लड़को को आकर्षित नहीं करेंगी! पूर्वाग्रह में फंसे नेता यदि महिला व पुरूष में भेद नहीं कर रहे तो ये तमाशा क्या है? हालांकि उपचुनाव में इस संकीर्णता मानसिकता का जवाब जनता ने बखूबी दिया, लेकिन हाल ही में आरएसएस प्रमुख के बयान में लव जेहाद का मुद्दा प्राथमिक होना आने वाले समय के नाजुक स्थिति को बयां करता है।
यदि अकबर, जहांगीर, शाहजहां की बेगमें हिन्दू थी तो हिन्दू भी मुसलमान पत्नी रख सकते थे। अजमेर के हुसैनी ब्राह्मण, बंगाल के पीराली इसके उदाहरण है। गौरतलब है कि चुनावी उदबोधन में यह कहना कि-जोधा अब अकबर के साथ नहीं जायेगी। दुष्ट सिकन्दर अपनी बेटी अब चन्द्रगुप्त को देगा। देने के लिए तैयार रहें, अब हमारी लेने की बारी है। गोरखपुर सदर के सांसद योगी आदित्यनाथ का यह बयान ऐसा लगता है जैसे किसी व्यक्तिगत विद्वेष में दिया जा रहा हो। यह किसी भी दशा में धार्मिक व्यक्ति के वचन नहीं हो सकते। ध्यान दे तो ऐसा लगता है कि कोई सत्ता से पदच्युत किया गया कोई अभिमानी राजा हारने के बाद अपनी भड़ास निकाल रहा हो। नाथ सम्प्रदाय के कुछ जन अपने को सिसोदिया बताते हैं जो महाराणा प्रताप के वंशज है, शायद वही भाव पीढी दर पीढ़ी जबरदस्ती अपने अन्दर रखने के कारण इन्हे व्याकुलता होती रहती है जिसका खामियाजा लोकतंत्र के पर्व पर जनभावना को भड़काकर पूरी करते हैं। क्या कोई संत, योगी, फकीर नफरत व बदले का स्वर देता है? वर्तमान में धर्म का चोला धारण कर राजनीति की सीढ़ी चढ़कर सत्ता प्राप्त करने वालों को अब वक्त आ गया है कि युवा भारत के युवा मतदाता सबक सिखाएं। धर्म किसी भी दशा में विनाश व बदले की इजाजत नहीं देता, धर्म कल्याण का संदेश है, सभी धर्मो को मिलाकर देखिए, विविधता का भण्डार मिलेगा, लेकिन सभी एक ही स्थान पर पहुंचाने का मार्ग प्रशस्त करेंगे वह है सत्य यानि ईश्वर।
हमारा लोकतांत्रिक भारत विविधता में इसी एकता को प्रमाणित करता है, इस खूबसूरत तस्वीर को बचाएं रखने की जिम्मेदारी युवा भारत पर है।

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