पहाड़ी-मधेसी अंतर बताकर जमीनी हकीकत से दूर करने की साजिश !

नेपाल का सत्ताधारी कुलीन वर्ग देश को एक खतरनाक रास्ते पर ले जा रहा है !

New Delhi: भारत-नेपाल सीमा पर कथित नाकेबंदी पर मचे अवास्तविक विवाद के बीच नेपाल का मौजूदा सत्ताधारी कुलीन वर्ग देश को एक खतरनाक रास्ते पर ले जा रहा है। Nepal-countryजानबूझकर एक जोखिम भरा राजनीतिक और सामाजिक ध्रुवीकरण किया जा रहा है ताकि पात्रता की अहंकारी भावना रखने वाले उच्च जाति के कुलीनों की अपना वरीय दर्जा बरकरार रखने की अशोभनीय कोशिश को एक दिखावटी जामा पहनाया जा सके। अतीत में भी ऐसा कई बार देखने को मिला है जब भारत विरोध के रूप में अंधराष्टï्रवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है और कहीं अधिक घातक देसी एजेंडे से ध्यान भटकाया जा रहा है। इसमें यह जोखिम भी है कि इस दौरान नेपाल के उस लोकतांत्रिक आंदोलन की वजह से हासिल वे तमाम ऐतिहासिक लाभ कहीं गंवा न दिए जाएं जिन्हें नेपाल की तमाम आबादी ने बलिदान देकर हासिल किया था और जिसका भारत ने भरपूर समर्थन किया था।

60 से 80 लाख नेपाली नागरिक भारत में रह रहे हैं इसमे सर्वाधिक संख्या में पहाडी हैं !

भारत में नेपाल को लेकर कई गलत धारणाएं हैं। हमने पहाड़ी और मैदानी की अवधारणा को स्वीकार कर लिया है और यह भी मान बैठे हैं कि मैदानी लोग भारतीय मूल के हैं और इसलिए उनको भारत का समर्थन हासिल है। नेपाल सरकार का यही आरोप भी है।nepaali  तराई इलाके में रहने वाले लोग भारत से वहां गए हुए लोग नहीं हैं बल्कि यह वहां की मूल आबादी है। वे किसी की उदारता से नेपाल के नागरिक नहीं बने बल्कि यह उनका अधिकार है। लेकिन यह भी सच है कि मैदानी लोगों के सीमा के पार भारत के लोगों के साथ करीबी रिश्ते हैं लेकिन ऐसा तो पहाड़ी लोगों के साथ भी है। नेपाली मूल के लाखों भारतीय नागरिक देश के कई हिस्सों में रहते हैं। वे भारत के नागरिक हैं लेकिन नेपाल के रिश्तेदारों से भी उनके करीबी संबंध हैं। पिछले डेढ़ दशक में माओवादी अशांति और आर्थिक तंगी के चलते करीब 60 से 80 लाख नेपाली नागरिक भारत में रह रहे हैं और काम कर रहे हैं। इनमें बड़ी संख्या पहाड़ी लोगों की है। भारतीय सेना के हजारों पेंशनयाफ्ता पूर्व जवान नेपाली हैं जो यहां के गांव कस्बों में बसे हुए हैं। उनमें से लगभग सभी पहाड़ी हैं।neppal अंत में बात करते हैं उच्चवर्णीय नेपालियों की जिनमें राज परिवार के लोग भी शामिल हैं। उनकी भी भारत में तमाम शादियां और करीब रिश्तेदारियां हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच करीब और अंतरंग रिश्तों में इन लोगों की अहम हिस्सेदारी है। ऐसे में पहाड़ी-मधेसी अंतर की बात को भारत और नेपाल के विवाद की वजह बताकर जमीनी हकीकत के साथ छल किया जा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश के नीति निर्माता इस गलत व्याख्या के शिकार नहीं होंगे और भारत नेपाल के समावेशी लोकतंत्र और मधेसियों समेत तमाम जातीय समूहों के लोगों के समान अधिकारों का समर्थन करता रहेगा। इसमें जनजातीय लोग भी शामिल हैं जिनको समान रूप से दबाया गया है।

नेपाल आबादी के किसी भी धड़े की निराशा से भारत का कोई हित नहीं !

नेपाल की आबादी के किसी भी धड़े को परेशान करने या उसके लिए हताशा या निराशा पैदा करने में भारत का कोई हित नहीं हो सकता क्योंकि दोनों देशों के लोगों के बीच काफी करीबी रिश्ते हैं।nepal pahadi ज्यादा लोग नहीं जानते कि नेपाल की बिजली आपूर्ति का अधिकांश हिस्सा भारत से जाता है। यह अबाध ढंग से जारी है और नेपाल में प्रवेश के कई अन्य मार्ग बाकायदा खुले हुए हैं। तो नाकेबंदी का सवाल कहां है? क्या दक्षिण के उग्र प्रदर्शनकारी पूरी सीमा पर आवागमन बाधित किए हुए हैं। ऐसे में भारत से यह उम्मीद करना ठीक नहीं है कि वह उन नेपाली नेताओं के झांसे में आ जाएगा जिन्होंने अपनी अदूरदर्शी नीतियों के चलते यह माहौल पैदा किया है।कई बार हमें सुनने को मिलता है कि भारत की राजनैतिक हस्तियां और विश्लेषक मैदानी आंदोलनों तथा अन्य जनजातीय आंदोलनों को खारिज करते हैं और उनके राजनेताओं के मतभेदों की ओर इशारा करते हैं। उनकी आपसी तकरार की वजह चाहे जो भी हो लेकिन वे अपने लोगों के अधिकारों की वैध मांग के लिए संघर्ष करते हैं। हम इन नेताओं की निजी महत्त्वाकांक्षाओं के समर्थन में नहीं हैं बल्कि उन लोगों के समर्थन में हैं जिनको उनके अधिकारों से वंचित किया जा रहा है।

दूसरे देश के हाथों खेलने वाला देशद्रोही बताने की अति राष्टï्रवादी भावना सही नहीं !

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Madhesi protesters throw stones at police in Nepal’s Birgunj town,

वास्तव में तो लोग अपने नेताओं से कई मायने में आगे हैं और इसका मतलब यह हुआ कि उनके संघर्ष को आसानी से दबाया नहीं जा सकता है। क्या इस तकरार में भारतीय नेता शामिल नहीं होते? पहाडिय़ों को नेपाली पहचान बताते हुए मैदानी लोगों को दूसरे देश के हाथों खेलने वाला देशद्रोही बताने की अति राष्टï्रवादी भावना सही नहीं है। हमें पहले ही खतरे का संकेत नजर आ रहा है। नेपाल एक ऐसा मुल्क है जिसका मैदानी इलाका ही उसके खाद्यान्न का स्रोत है। देश के अधिकांश उद्योग धंधे वहीं स्थित हैं और उसका सबसे बड़ा पड़ोसी बाजार भारत है।

 नेपाल के लिए बहुत कीमती हैं तराई के लोग !

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Farmlands of southern Nepal

तराई के लोग नेपाल के लिए बहुत कीमती हैं और वे देश की आर्थिक संपन्नता का आधार बने रहेंगे। ऐसे वक्त में जबकि देश भीषण जलजले से उबर ही रहा है, क्या आर्थिक जीवनरेखा को इस तरह जोखिम में डालना उचित है?nepal tarai भारत को लेकर चाहे जो भी दिक्कत हो लेकिन नेपाल की राष्ट्रीय एकता को जोखिम में डालना और उसकी आर्थिक सेहत को संकटग्रस्त करना कहीं अधिक बड़ी नीतिगत चुनौती साबित हो सकती है। ठंड करीब आ रही है और बड़ी संख्या में देश के लोग बिना समुचित आसरे और खाने के पहाड़ी इलाकों में यूं ही रह रहे हैं। भूकंप ने पहले से ही सीमित संचार माध्यमों को और अधिक नुकसान पहुंचाया। यह एक ऐसी मानवीय त्रासदी थी जिससे निपटने की समुचित कोशिशों के बावजूद नेपाल सरकार पारंपरिक कुलीन वर्ग के हितों की रक्षा के लिए राजनीतिक खेल खेल रही है। भारत ने भूकंप के तत्काल बाद आपातकालीन आपूर्तियां पहुंचाईं और विनिर्माण में मदद की। इस समर्थन को जारी रखने की आवश्यकता है लेकिन इसे नेपाली सत्ता प्रतिष्ठïान की ओर से क्षति पहुंचायी जा रही है।

भारत- नेपाल के कारोबारी और आर्थिक रिश्तों की तुलना में नगण्य है चीन का आपूर्ति स्तर !

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China & Nepal signed LOE for duty-free treatment

आखिर में चीन की बात। आश्चर्य नहीं कि नेपाल सरकार ने यह सुझाव देकर भारत को बेचैन करने की कोशिश की है कि चीन तिब्बत-नेपाल सीमा पर बिछाई गई सड़क के जरिये उसे मदद भेजेगा। तेल टैंकरों समेत कुछ आपूर्ति आई भी। लेकिन पिछले एक महीने के दौरान चीन की आपूर्ति का स्तर भारत और नेपाल के कारोबारी और आर्थिक रिश्तों की तुलना में नगण्य रहा है। भारत को नेपाल में चीन की गतिविधियों को लेकर सतर्क रहना होगा। लेकिन अगर नेपाल सरकार को चीन का इस्तेमाल भारत पर दबाव बनाने के लिए करते रहने दिया गया तो यह अनुत्पादक साबित हो सकता है। (B.S.)

      श्याम सरन 

( लेखक पूर्व विदेश सचिव और नेपाल में भारत के राजदूत रह चुके हैं। फिलहाल वह आरआईएस के चेयरमैन और सीपीआर के फेलो हैं )

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