पीएनबी के डिफॉल्टर कर्जदार, 11,467 करोड़ रुपये से अधिक बकाया !

विलफुल डिफॉल्टरों  के आगे बेबस ‘ पंजाब नैशनल बैंक’ !

 New Delhi :  देश में इस समय बैक बीमार हो गये हैं। देश में काला धन खोजने वाले अब कहां और कितना ब्यस्त हैं ये तो अब सरकारी मामला हो गया ,आज बैंक अपने दबंग कर्जदारों के कारण संकट में हैं।कर्जदारों ने वैद्य तरीके से पहले तो भारी भरकम लोन लिया अब कर्ज नहीं जमा करने के बाद जब बैकों ने जाॅच पड़ताल शुरु की तो मामले उल्टे मिले !  पंजाब नैशनल बैंक (पीएनबी) ने 23 फरवरी को 905 ‘विलफुल डिफॉल्टरों’ (जानबूझकर कर्ज न अदा करने वाले) की फेहरिस्त जारी की, जिन पर बैंक का 11,467 करोड़ रुपये से अधिक बकाया है। बैंक ने कहा कि वह कानूनी तरीकों से इन कर्जों की वसूली करेगा और योजना बना रहा है कि इन कर्जों में 3,000 करोड़ रुपये के कर्जों के मामले परिसंपत्ति वसूली कंपनियों के हवाले कर दे। पीएनबी की सूची का विश्लेषण करें तो उसमें तमाम ऐसे डिफॉल्टर हैं, जिनका पता एक ही है। इनमें से 11 बड़े डिफॉल्टर पर बैंक का 843 करोड़ रुपये से ज्यादा बकाया है। अपने समान निदेशकों और साझा पतों के आधार पर इन कंपनियों को तीन समूहों में बांटा जा सकता है। उनमें से कुछ एक ही तरह के कारोबारों में भी Punjab-national-bankसक्रिय नजर आते हैं। इनमें से प्रत्येक समूह का रियल एस्टेट कारोबार में भी कुछ न कुछ दखल जरूर है। एक मीडिया की पड़ताल में यह मालूम पड़ा कि ये कंपनियां उन पतों पर मौजूद ही नहीं हैं, जो उन्होंने बैंक ब्योरे में दर्ज कराया और तमाम अन्य कंपनियां कंपनी मामलों के मंत्रालय (एमसीए) के कंपनी पंजीयक से बाहर निकलने की प्रक्रिया में हैं, जिससे न केवल कर्जदारों द्वारा जमा कराए गए ब्योरे की शुद्घता पर सवाल उठते हैं बल्कि बैंकों द्वारा कर्ज देने से पहले उचित जांच परख के साथ प्रक्रिया को अंजाम न देने का भी संकेत करते हैं। इस मामले में पीएनबी का पक्ष जानने के लिए उसे 26 फरवरी को भेजे गए ई-मेल का कोई जवाब नहीं मिल पाया।एक नियामक जो खुद एक बैंकर भी हैं, का कहना है, ‘यह भी एक पहेली है कि बैंक की उसी शाखा ने उन्हीं लोगों की अलग-अलग फर्मों को कर्ज कैसे दिया। पुराने जमाने में, जब कंप्यूटर नहीं हुआ करते थे, तब डिफॉल्टरों के लिए आसान होता था कि वे नए शहर का रुख करें और नई शाखा खोल दें। अब जब हर चीज कंप्यूटरीकृत है और कंपनियों का डेटा ऑनलाइन है तो यह कैसे संभव हो सकता है?’

राणा समूह (चार कंपनियां, 225.04 करोड़ रुपये)

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नई दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग पर विवादों में रहे हेराल्ड हाउस के बगल में ही प्रताप भवन नाम की इमारत है। हल्की रोशनी से नहाए इसके गलियारों में जब आप कदम रखते हैं तो प्रकाशकों के छोटे-छोटे दफ्तर नजर आते हैं। 43.2 करोड़ रुपये बकाया वाली राणा ग्लोबल और 55.68 करोड़ रुपये बकाया वाली हरिद्वार आयरन ऐंड इस्पात रॉल्स ने अपने पते के तौर पर 108-109, प्रताप भवन का उल्लेख किया है। इस पते पर मीडिया टीम को इन कंपनियों का कोई अता-पता नहीं मिला। इसके बजाय वहां मौजूद एक कर्मचारी ने बताया कि यह शाह टाइम्स का कार्यालय है। शीशे के दरवाजे पर भी शाह पब्लिकेशंस के उकरे-उखड़े निशान नजर आते हैं।

एमसीए के ब्योरे में शाह पब्लिकेशंस का कोई नामोनिशान नहीं मिल सकता। हालांकि मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) में शाह प्रेस प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी जरूर पंजीकृत है, जिसके निदेशक शाह नवाज राणा और इंतखाब राणा, राणा ग्लोबल और हरिद्वार आयरन के निदेशक मंडलों में भी हैं।trap राणा अलॉयज, जिसके पास 10 लाख रुपये की अधिकृत पूंजी है, उस पर 78.96 करोड़ रुपये का बकाया है। एमसीए के दस्तावेजों से इस कंपनी को ‘स्ट्राइक ऑफ’ (हटा) कर दिया गया है। मुजफ्फरनगर की ही राणा उद्योग पर भी 47.2 करोड़ रुपये बकाया है। पीएनबी की सूची के अनुसार राणा नाम से जुड़ी तीनों कंपनियों में कुमरजमा राणा तीनों में निदेशक हैं। मगर इन कंपनियों के एमसीए के पास उपलब्ध ब्योरे में इस नाम को नहीं तलाशा जा सकता। इन चारों कंपनियों ने रुड़की में पीएनबी की सिविल लाइंस शाखा से कर्ज लिया। राणा समूह से जुड़ी कंपनियों को ई-मेल के जरिये भेजे गए सवालों का जवाब नहीं मिला।
ऐपल समूह (तीन कंपनियां, 401.86 करोड़ रुपये) 
 
दक्षिण दिल्ली में हौज खास के निकट कालू सराय गांव में तीन मंजिला इमारत अनुपम प्लाजा में तमाम फोटोस्टेट कियोस्क, स्टेशनरी की दुकानें और साइबर कैफे हैं। इसके गलियारों में उचित रोशनी का भी इंतजाम नहीं और उसका रखरखाव भी खस्ताहाल है। विलफुल डिफॉल्टरों की सूची के अनुसार ऐपल इंडस्ट्रीज और उसकी सहयोगी कंपनियों (ऐपल स्पंज ऐंड पावर और ऐपल कमोडिटीज) के दफ्तर इसी इमारत में होने चाहिए। forgery
तीसरे तल पर हमें ऐपल स्पंज ऐंड पावर का बोर्ड दिखाई पड़ता है। मगर उसका शटर गिरा हुआ है, जिस पर धूल की परत जमी हुई है। वहां से गुजरते एक शख्स ने हमें दूसरी मंजिल पर मौजूद कार्यालय की ओर इशारा किया कि ‘दोनों का संबंध एक ही समूह से है।’ उस दफ्तर में डिजाइन एन डिजाइन का बोर्ड चस्पां था। वहां उपस्थित स्वागत अधिकारी आजाद ने बताया कि यह दफ्तर एस पी गर्ग का है। उसने अपने बॉस का मोबाइल नंबर दिया लेकिन कहा, ‘वह अब नोएडा चले गए हैं।’  ऊपर जाने के लिए सीढिय़ां तंग हैं। इस तरह अनुपम प्लाजा में तीसरे माले पर टी-1 ऐंड 3, जहां ऐपल समूह की कंपनियां पंजीकृत हैं, एस-4 में मौजूद डिजाइन एन डिजाइन से जुड़ी हैं। ऊपर कार्यालय में एक बड़ा हॉल है, जिसमें एक कॉन्फ्रेंस रूम भी है, जिसमें एक मेज और उसके इर्द-गिर्द कुर्सियां लगी हैं। वहां कमरे के एक कोने में आवासीय और अन्य रियल एस्टेट परियोजनाओं की अनुकृतियां (मिनिएचर मॉडल) रखी हुई हैं। गर्ग ने अपने मोबाइल पर कॉल का जवाब नहीं दिया। उनके स्टाफ ने बताया कि वह परियोजनाओं के सिलसिले में अमूमन व्यस्त रहते हैं। doc. fraud
मई, 2015 में ऐपल इंडस्ट्रीज ने बताया था कि उसने अपना पंजीकृत कार्यालय बदलकर पूर्वोत्तर दिल्ली के शाहदरा में भगवानपुर खेड़ा गांव में स्थानांतरित कर दिया है। शाहदरा मेट्रो से रिक्शा करके हमने भगवानपुर खेड़ा पहुंचने की कोशिश की। भगवानपुर खेड़ा पहुंचने में हमें 15 मिनट लग गए। वहां 1/3787 के पहली मंजिल पर ऐपल इंडस्ट्रीज का पता तलाशना ज्यादा मुश्किल नहीं था। एक फोटोस्टेट की दुकान के ऊपर टंगे फ्लेक्स बोर्ड पर 17 कंपनियों के नाम लिखे हैं। सीढिय़ों के ऊपर जाने पर एक छोटा दरवाजा दिखाई देता है जिस पर ताला लगा था। दरवाजे के पास रखे लेटर बॉक्स में एक मोबाइल नंबर लिखा हुआ था।
फोन पर जयकिशोर नाम के शख्स ने जवाब दिया। जब ऐपल इंडस्ट्रीज के बारे में पूछा गया तो उसने कहा कि वह बगल में ही है और कुछ देर में ही पहुंच रहा है। उसके साथ ओमकार सिंह नाम का एक और शख्स भी था। जब किशोर हमें सीढिय़ों से ऊपर ले गया तो हमें 17 कंपनियों के दफ्तर नजर आए। एक तंगहाल जगह में केPNB--621x414वल एक कुर्सी और मेज के लिए ही जगह बनी हुई थी। जब किशोर से पूछा गया कि क्या यही पंजीकृत कार्यालय है तो जवाब मिला, ‘हम केवल डाक की आवाजाही का काम देखते हैं।’ दस्तावेजों के अनुसार ऐपल इंडस्ट्रीज सिंह की पत्नी छाया देवी को हर महीने 1,000 रुपये किराया अदा करती है। हैदराबाद के पवन कुमार गर्ग का नाम ऐपल इंडस्ट्रीज निदेशक के तौर पर किराया करारनामे में दर्ज है। ऐपल समूह की कंपनियों को भेजे गए ई-मेल का कोई जवाब नहीं मिला।
महुआ मीडिया (चार कंपनियां, 217.45 करोड़ रुपये)
कस्तूरबा गांधी मार्ग पर गगनचुंबी इमारत कैलाश की नौवीं मंजिल पर पहुंचने के साथ ही एक छोटा प्लास्टिक बोर्ड नजर आता है, जिस पर सेंचुरी कम्युनिकेशन प्राइवेट लिमिटेड लिखा हुआ है। यह 909, कैलाश महुआ मीडिया, पिक्सॉन मीडिया और पर्ल विजन का पंजीकृत दफ्तर है। ये तीनों कंपनियां पिता-पुत्र की जोड़ी पी के तिवारी और आनंद तिवारी ने शुरू कीं। हमें दफ्तर में कुछ लोग नजर आए। जब हमने तिवारी जीmahuaa के बारे में पूछा तो एक सुरक्षा गार्ड ने हमें बताया कि चार साल पहले सरकारी एजेंसी वापकोस ने इस दफ्तर को ले लिया और महुआ टीवी यहां से नोएडा चला गया, हालांकि उसने हमें उसका पता नहीं दिया। एमसीए दस्तावेजों के अनुसार जब पीएनबी से कर्ज लिया गया तो इन कंपनियों का पता निदेशकों के फ्रेंड्स कॉलोनी स्थित आवास का दिया गया था। फिर भी बैंकों ने सैकड़ों करोड़ रुपये का अग्रिम कर्ज उपलब्ध कराया। महुआ मीडिया केंद्रीय जांच ब्यूरो की तफ्तीश का हिस्सा बन गई है। कंपनी ने कई वर्षों तक अपना बहीखाता नहीं जमा कराया। जेल में समय बिताने के बाद प्रवर्तक 2015 में रिहा हुए। इन कंपनियों के मौजूदा स्तर और योजनाओं के बारे में उन्हें भेजे गए ई-मेल का जवाब नहीं मिला।(B.S.)
एन. सुंदरेश
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