पुरातन ज्ञान का वातायन ,बौद्ध संग्रहालय

संग्रहालय से तात्पर्य उस संस्थान से है जो राष्ट्रीय एकता के संवर्धक स्थल के रुप मे स्वयं को दिब्यमान रखे,साथ ही पुरातन के ज्ञान का वातायन बन युवा शोधार्थियों के भावी निर्माण का मार्गदर्शक बनें। उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग के अधीन आने वाला राजकीय बौद्ध संग्रहालय भी इसी उद्देश्य से स्थापित किया गया । वर्तमान मे यह स्थायी तौर पर गोरखपुर जिले के रामगढ़ ताल , तारामंण्डल क्षेत्र मे लगभग 3एकड़ क्षेत्रफल में स्थित है। गोरखपुर रेलवे व बस स्टेशन से 10 किमी0 की दूरी शहर के दक्षिणी क्षेत्र में स्थित संग्रहालय तक पहुॅचने के लिए तय करनी पड़ती हैै।
अतीत मे झाॅक कर वर्तमान सुदृढ करने वाले विद्वजनों के लिये यहाॅ बहुत कुछ है।देशी-विदेशी पर्यटकों केा यहाॅ बौद्ध धर्म के उद्भव व विकास़ की जानकारी के साथ- साथ इस क्षेत्र की संस्कृतिक धरोहर का भी बोध, इस संग्रहालय में आने पर होता है। गौतम बुद्ध के जीवन की घटनाओं से सम्बन्धित जन्म स्थान“लुम्बिनी,मातुल गृह,“देवदह“, कोलियो का “रामग्राम“, कोपिया, महापरिनिर्वाण की पवित्र भूमि कुशीनगर के प्रमाणित श्रोतों के संग्रह अति महत्वपूण है। संग्रहालय के उपनिदेशक डा0 ए0के0 सिंह बताते हैं कि हमारा मुख्य उद्देश्यपूर्वी क्षेत्र में यत्र-तत्र बिखरी सांस्कृतिक धरोहर एवं देश के अन्य भागों से प्राप्त विविध कलाकृतियों को संकलित कर,उनका अध्ययन,शोध,संरक्षण एवं प्रदर्शन करना है। यहाॅ दो प्रदर्श विथिका है। प्रथम विथिका प्रख्यात विद्वान राहुल संकृत्यायन को समर्पित है। इसमे प्रदर्शित सामग्री बौद्ध धर्म से समर्पित है। दूसरी विथिका में हिन्दू और जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाॅ, लघुचित्र तथा अन्य शामिल है।
यहाॅ 4500 से अधिक पुरातन वस्तुए संरक्षित हैं। सुरक्षा कारणों से 25 का ही डिस्प्ले किया जाता है।शोध छात्रों के लिए तथा विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को ही सभी संग्रहित वस्तुओं का अवलोकन कराया जाता है। प्रथम विथिका में महात्मा बुद्ध के विविध स्वरुपों तथा धर्मचक्र-प्रवर्तन, अभय, ध्यान, ब्याख्यान, भूमिस्पर्श, महापरिनिर्वाण-मुद्रा इसके अलाॅवां मथुरा शैली में बुद्ध-मस्तक आदमकद मुर्ति निर्माण का संकेत देते हैं। यहाॅ मृण्मूर्तियों के निर्माण की समृद्ध परम्परा पुरातन में होने का प्रमाण मौजूद है। हिमालय की उपत्यका से प्राप्त 18वीं शती ई0 की मृण् और धतु की मूर्तियों की लोकप्रियता का ज्ञान यहाॅ होता है।तिब्बत में कपड़ों पर प्राकृतिक रंगों से धार्मिक चित्र बनाने की परम्परा थी। इसे थान्का कहा जाता है यह भी संग्रहालय मे संरक्षित है।
द्वितीय वीथिका में हिंदू और जैन धर्म से सम्बंधित मूर्तियों, लघुचित्र,बस्ती जिले के लहुरादेवी व रामनगरघाट से प्राप्त नवपाषाणकालीन ब्लेड्स तथा सिद्धार्थनगर जिले के गवनरिया- कपिलवस्तु पिपरहवा आदि से मृण्पात्र तथा अन्य स्थलों की  हाथी दाॅत की मूर्तियाॅ ,अष्टभुजी गणेश प्रतिमा आकर्षक है। कुषण कालीन कुबेर व युगल,पूर्व मध्यकालीन कसौटी पत्थर पर बनी पाल शैली की उपमाहेश्वर व अन्य पत्थरों की त्रिशूलधारी शिव, शेषशायी विष्णु,सप्त मृतिकायें वाराही और नवग्रह उल्लेखनीय हैं। पूर्व मध्यकालीन जैन धर्म के तिर्थंकऱ ऋषभनाथ,पाश्र्वनाथ तथा महावीर की प्रतिमायें धर्म और कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
सम्राट अकबर के समय में हिंदू-मुस्लिम चित्रकार संयुक्त रुप से कार्य करते थे। बौद्ध संग्रहालय में राधा को मोती की माला देती हुई सखी,पंचतंत्र की कथाओं का निरुपण करती विभास रागिनी, माखनचोर, गरुड़ारुढ़ विष्णु, इसके अलांवां राजस्थानी एवं पहाड़ी चित्रकला का प्रदर्शन यहाॅ देखने को मिलेगा।
प्रवेश- निःशुल्क । सम्पर्क नम्बर-0551-320639 ,
संग्रहालय में दर्शकों के लिये समय -प्रातः 10‐30 से सायं 4‐30 बजे तक।
अवकाश- प्रत्येक सोमवार व महीने के दूसरे शनिवार के बाद आने वाला रविवार एवं सार्वजनिक अवकाशों पर संग्रहालय बंद रहता है।

विशेष जानकारी के लिये उपनिदेशक -डा0 ए0के0 सिंह से ,मो0न0 -9415846521 पर सम्पर्क कर सकते है।

धनंजय ब्रिज के साथ ए के गंभीर

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