प्रधानमंत्री के लिए संविधान ही एकमात्र पवित्र पुस्तक है तो…?

   रोज़मर्रा की   गंदगी में हम पवित्र पुस्तकों को नहीं घसीटते !Bhagavad-gita-front

 NewDelhi: गद्य का इस्तेमाल कभी-कभी सच्चाई पर पर्दा डालने के लिए किया जाता है. या कहा जा सकता है कि भाषा या शब्द दरअसल खाली बर्तन हैं, जिनमें अर्थ कहीं और से भरा जाता है.भारत के प्रधानमंत्री के वक्तव्यों को पढ़ते हुए शब्द और अर्थ के बीच के रिश्ते पर कुछ इसी तरह के विचार मन में आते हैं.’टाइम’ पत्रिका में उन्होंने अपने कार्यकाल का एक साल पूरा होने के उपलक्ष्य में एक लंबा इंटरव्यू दिया है. इसका नोटिस भारत की मीडिया ने लिया है. इसमें अनेक बातें कही गई हैं.’भारतीय प्रधानमंत्री के लिए संविधान ही एकमात्र पवित्र पुस्तक है’, ऐसा उन्होंने कहा है.पवित्र पुस्तकों के साथ हम कैसा रिश्ता रखते हैं, यह हम सबको मालूम है. वे पूजा किए जाने के लिए होती हैं, उन्हें धूप-अगरबत्ती दिखाई जाती है, दुनियावी मसलों में हम उनका इस्तेमाल नहीं करते. रोज़मर्रा की   गंदगी में हम पवित्र पुस्तकों को नहीं घसीटते.

उपहार स्वरूप गीता

modi gita  अगर संविधान नामक पुस्तक, जो लिखी और छपी है, इतनी ही श्रेष्ठ है तो जापान हो या अमरीका, जो किताब बतौर प्रधानमंत्री वे राज्याध्यक्षों को उपहार में देते रहे हैं, वह तो गीता है, यह संविधान नहीं, और गीता के बारे में उनका ख़्याल है कि इससे बड़ी कोई देन भारतीय सभ्यता की है ही नहीं.’भारत को डिक्टेटरशिप की ज़रूरत नहीं, वह यहाँ चल नहीं सकती क्योंकि हमारे डीएनए में लोकतंत्र है’, यह दूसरी बात कही गई.डीएनए शब्द को जितना लोकप्रिय आज के प्रधानमंत्री ने बनाया है, उसे देखते हुए जीव वैज्ञानिकों को उन्हें सम्मानित करना चाहिए.लेकिन जिस देश में जाति के नाम पर हत्या आम बात हो, जो देश ऊंच-नीच की बीमारी से इस कदर पीड़ित हो कि इस्लाम हो या ईसाइयत, जाति से न बच पाए, उसके लोगों के बारे में यह कहना कि लोकतंत्र उसके डीएनए में है, काव्यात्मक उड़ान भी नहीं.

                                                                                                       डिक्टेटर है या नहीं  !                     3

ख़ुद प्रधानमंत्री डिक्टेटर हैं या नहीं! यह तो आप उनके मंत्रिमंडल के सदस्यों से जा कर पूछ लें. या भारतीय जनता पार्टी के नए-पुराने सदस्यों से. अब तो उनकी मौजूदगी में प्राचीन लौह पुरुष तक, जो कभी उनके गुरु और संरक्षक हुआ करते थे, मुँह नहीं खोल सकते.
डिक्टेटर शब्द बदनाम हो चुका है और अगर उसके इस्तेमाल के बिना ही डिक्टेटरशिप चल सकती हो, तो फिर यह कहने की ज़रूरत ही कहाँ रह जाती है कि मैं डिक्टेटर बनना चाहता हूँ.लेकिन जिस व्यक्ति का आदर्श सिंगापुर का संस्थापक राज्याध्यक्ष या चीन हो, उससे अलग से यह पूछना भी हद दर्जे का भोलापन है कि आप डिक्टेटर होना चाहते हैं या नहीं.सरकार सभी धर्मों के लोगों को समान भाव से देखती है. बात सही है. लेकिन अगर कुछ धार्मिक सा संगठन, समूहों के ख़िलाफ़ घृणा अभियान चल रहा हो तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर वह चलने देती है: आखिर वह लोकतांत्रिक सरकार है.जब जूलियो रिबेरो जैसा व्यक्ति यह कहने लगे कि यह देश अब उसे पराया लगने लगा है, तब यह कहना कि अल्पसंख्यकों के भय लगने की बात काल्पनिक और निराधार है, दरअसल एक छिपी हुई धमकी है: आप यह कहने की हिम्मत भी कैसे कर रहे हैं.

लोकतंत्र की सुरक्षा
RSSग्रीन पीस पर रोक, फोर्ड फाउंडेशन पर पाबंदी, सिविल सोसाइटी संगठनों पर रोक-थाम, तरह-तरह के क़ानूनी बदलाव ताकत को केंद्रीकृत करने की कोशिश: इसके बावजूद लोकतंत्र के सुरक्षित होने का दावा! संघीय ताने बाने की दुहाई और बिना राज्य सरकार से बात किए अरुणाचल प्रदेश में आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट लागू करना, जीएसटी क़ानून के माध्यम से राज्य की टैक्स की कमाई को हथियाने की कवायद ! प्रधानमंत्री के बयानों के बारे में अब उनके दल के अध्यक्ष के हवाले से कहा जाने लगा है कि वे तो बातें हैं, बातों का क्या ! लेकिन आपको अगर इसका गंभीरता से अध्ययन करना हो तो आपको राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भाषा-व्यवहार को देखना होगा.यह समझना होगा कि उसने अपने इरादों को हमेशा शब्दों की आड़ देकर छिपाए रखा है. आपको अटल बिहारी वाजपेयी के भाषणों का विश्लेषण करना होगा. फिर शब्द और मंशा के बीच की खाई दिखाई पड़ेगी.
                                                                   शब्दों की ढाल d
शब्द ताकतवर के लिए अक्सर ढाल का काम करते हैं. उन्हें सामने रखकर वे किसी भी हमले का समना कर ले जाते हैं.लेकिन आख़िर जॉर्ज ऑरवेल ने बताया है कि कैसे भाषा तानाशाहों के हाथ आकर मायने खो देती है. भारत के लिए यह ऐसा ही वक़्त है.शायद ही इसके इतिहास में ऐसा मौक़ा कभी आया हो कि शब्द जो कहे जाते हों, उनके मायने ठीक उसके उलट हों …!

                                                                                                              D.J.S.

           Vaidambh Media

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