प्रेम व आध्यात्म का पवित्र संयोंग है साॅवन मास !

साॅवन

 

सनातन धर्म के विक्रमीसम्वत कलेंण्डर में पाॅचवाॅ महिना ‘साॅवन‘ के नाम से जाना जाता है। इसे संस्कृत में श्रवण माॅस कहते हैं। श्रवण का अर्थ सुनना होता है। लोक कथाओं में इसे सुनने वाला महीना कहा जाता है। यह सुनने का समय किसान और ब्यापारी को प्रकृति सहज ही एक साथ उपलब्ध करा देती है।

रंगीला सावन-
 साॅवन जहाॅ एक तरफ अपनी खूबसूरती व माॅदकता के लिये जाना जाता है तो दूसरी तरफ आध्यात्म का चरम भी इसी माॅह मे देखने को मिलता है। मोर जंगल में अपनी प्रेयसी को मनाने के लिये दुर्लभ नृत्य करता करता हुआ आपको इसी माह में मिल जायेगा। बहुतायत जलीय जीवों का  प्रणय काॅल होता है साॅवन । कहना गलत न होगा कि साॅवन प्रकृति का यौवन है। रिमझिम बारिश की फुहार, हर कोपलो से  मुस्काती नवीन पत्तियाॅ चहुॅ ओर हरियाली ,नदियों की मचलती धारा, सुन्दर व अपने से लगते पहाड,,उन पर झुंकि काली घटायें़ सभी को अपनी शान में   कुछ कहने के लिये विवश कर देता है साॅवन । सन 1963 में तेलगू फिल्म ‘मोगामंसूल‘ की रिमेक हिन्दी में 1967 में बनीं नाम था ‘मिलन‘ । इसमें मो़ रफि व लता मंगेशकर  की आवाज में साॅवन का जो मनोरम वर्णन किया गया है आज भी जीवंत है कल भी रहेगा। साॅवन, बिरहन को भी बहुत तड़पाता है जिसके पति परदेश है और आंगन में झूला पड़ा है , यह विदेशिया के साहित्य में बृहद रुप से देखने को मिलता है। साॅवन सबको स्पर्श करता है।

आध्यात्म और साॅवन –

आध्यात्मिक दृष्टि से यह पवित्र माॅह देवाधिदेव महादेव शिव को समर्पित है। इस वर्ष  महीने के 30 दिन में पाॅच सोमवार का पड़ना बहुत शुभ माना जा रहा है। इस माॅह प्रतिदिन शिवलिंग पर श्रद्धालू जल चढ़ातें हैं। इस माॅह में गांगा का पवित्र जल लेकर काॅवड़ यात्रा निकाली जाती है। इस तपसी यात्रा का समापन शिवलिंग पर जलाभिषेक के बाद होता है। व्रति द्वारा कई कोस पद यात्रा बिना किसी सुख् सुविधा के अनवरत तय की जाती है।

‘कांवड़ यात्रा’

कहा जाता है,  रावण  पहला कांवड़िया था । आनंद रामायण में  वर्णन है कि भगवान राम ने भी महादेव शिव को कांवड़ चढ़ाई थी।  श्री राम जी  ने कांवड़िया बनकर सुल्तानगंज से जल लिया और देवघर स्थित बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का अभिषेक किया था। कंधे पर गंगाजल लेकर भगवान शिव के ज्योतिर्लिंगों पर चढ़ाने की परंपरा, ‘कांवड़ यात्रा’ कहलाती है। सावन में कावड़ यात्रा शुरू करने से पहले कई नियम  हैं, जिन्हें  हर कांवड़िया संकल्प से पूरा  करता है। यात्रा में नशा, मांस, मदिरा और तामसिक भोजन वर्जित है।  स्नान करके ही कावड़ को हाथ  लगाते है , चमड़े की वस्तु का स्पर्श, वाहन का प्रयोग, चारपाई का उपयोग, वृक्ष या पौधे के नीचे भी कावड़ रखना, कावड़ को अपने सिर के ऊपर से लेकर जाना भी वर्जित  है।

काॅवड़ यात्राव्रति के प्रकार –

  1. सामान्य कांवड़ : स्टैंड पर कांवड़ रखकर आराम से जाते हैं।
  2. डाक कांवड़ : ये जल लेकर लगातार चलते रहते हैं।
  3. खड़ी कांवड़ : कुछ भक्त के साथ सहयोगी भी चलते हैं, जब वे आराम करते हैं दूसरे कांवड़ को चलने के अंदाज में हिलाते-डुलाते रहते हैं।
  4. दांडी कांवड़ : ये भक्त नदी तट से शिवधाम तक की यात्रा दंड देते हुए पूरी करते हैं। इसमें एक महीने तक का वक्त लग जाता है।

महिलाओें का श्रृंगारमाॅस है साॅवन

हरा रंग आंखों को हमेशा सुकून देता है। सावन के महीने में तो पूरी प्रकृति ही हरियाली की चादर ओढ़ लेती है।  इस महीने में महिलाएं प्रमुखता के साथ हरे रंग की चूड़ियां, वस्र धारण करती हैं। साथ ही हथेली और पैरों में मेंहदी रचाती हैं। दरअसल यह प्राचीन परंपरा की देन है जिसका धार्मिक और वैज्ञानिक कारण है। सावन का महीना प्रकृति के सौंदर्य का महीना कहा जाता है। शास्त्रों में स्त्री को भी प्रकृति का दर्जा दिया गया है क्योंकि महिलाएं भी जीवनदायिनी होती हैं। सावन के महीने में कई त्योहार आते हैं, कज्जली तीज, हरियाली तीज और रक्षा बंधन। इन सभी त्योहारों पर महिलाएं मेंहदी लगाती हैं और अपने ऋंगार में हरी चूड़ियों, वस्र और बिंदियों का भी प्रयोग करती हैं। दरअसल इस श्रृंगार के पीछे प्रकृति से नाता झलकता है।

हरे रंग को उर्वरा शक्ति का प्रतीक माना जाता है। यह प्रजनन क्षमता का भी प्रतीक है। मान्यता है कि सावन के महीने में मौसम के प्रभाव के कारण मनुष्य पर काम भाव हावी रहता है।  सावन के महीने में लगातार होती वर्षा और वातावरण में नमी के कारण कई तरह की बीमारियां फैलने लगती हैं। हरे रंग को स्वास्थ्य वर्धक रंग माना गया है। आयुर्वेद में इस रंग को कई तरह के रोगों के उपचार में कारगर माना जाता है।

Vaidambh Media

 

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