बहुत धीरे-धीरे फैलता है कुष्टरोग , रहें सावधान !

 उत्तर भारत में  हिमालय की तराई में अधिक है कुष्टरोग का संक्रमण

New Delhi:  समान्यत त्वचा पर पाये जाने वाले पीले या ताम्र रंग के धब्बे जो सुन्न हों या रंग तथा गठन में परिवर्तन दिखाई दे, तो यह कुष्ठ रोग के लक्षण हो सकते हैं। dog-skin-leprosy-ugly-यह रोग छूत से नहीं फैलता।
उत्तर साइबेरिया ; छोड़कर संसार का कोई भाग ऐसा नहीं था जहाँ यह रोग न रहा हो। किंतु अब ठंडे जलवायु वाले प्राय: सभी देशों से इस रोग का उन्मूलन किया जा चुका है। यह अब अधिकाशंत: कर्क रेखा (Tropic of Cancer) से लगे गर्म देशों के उत्तरी और दक्षिणी पट्टी में ही सीमित है और उत्तरी भाग की अपेक्षा दक्षिणी भाग में अधिक है। भारत, अफ्रीका और दक्षिणी अमरीका में यह रोग अधिक व्यापक है। भारत में यह रोग उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में अधिक है। उड़ीसा, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु और दक्षिण महाराष्ट्र में यह क्षेत्रीय रोग सरीखा है। उत्तर भारत में यह हिमालय की तराई में ही अधिक देखने में आता है।

कुष्टरोग , रोगाणु से होता है !
hansen's कुष्ट की गणना संसार के प्राचीनतम ज्ञात रोगों में की जाती है। इसका उल्लेख चरक और सुश्रुत ने अपने ग्रंथों में किया है।  कोढ या कुष्टरोग (लिप्रोसी) या हन्सेन रोग (Hansen’s disease) एक जीर्ण रोग है जो माइको बैक्टिरिअम ले प्राई (Mycobacterium leprae) नामक जीवाणु (बैक्टिरिया) के कारण होता है। यह मुख्य रुप से मानव त्वचा, ऊपरी श्वसन पथ की श्लेष्मिका, परिधीय तंत्रिकाओं, आंखों और शरीर के कुछ अन्य क्षेत्रों को प्रभावित करता है। यह न तो वंशागत है और न ही दैवीय प्रकोप बल्कि यह एक रोगाणु से होता है।

संक्रामक रोग है कुष्ट
यह रोग संक्रामक है।   Leprosy_CRRFRP_2958709bयह रोग सामान्यत: गंदगी में रहनेवाले और समुचित भोजन के अभाव से ग्रस्त लोगों में ही होता है ; किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि स्वच्छ और समृद्धिपूर्ण जीवन बितानेवाले लोग भी इस रोग से ग्रसित पाए जाते हैं।आयुर्वेद के अनुसार कुष्ट चौदह प्रकार के कहे गए हैं और उसके अंतर्गत त्वचा के श्वेत रूप धारण करने को भी कुष्ट कहा गया है। किंतु आधुनिक विज्ञान उसे कुष्ट से भिन्न मानता है।
कुष्ट सामान्यत: तीन प्रकार का ही होता है-
तंत्रिका कुष्ट (Nerve leprosy)-  इसमें शरीर के एक अथवा अनेक अवयवों की संवेदनशीलता समाप्त हो जाती है। सुई चुभोने पर भी मनुष्य किसी प्रकार का कोई कष्ट अनुभव नहीं करता।
ग्रंथि कुष्ट (Lapromatus leprosy)-  इसमें शरीर के किसी भी भाग में त्वचा से भिन्न रंग के धब्बे या चकत्ते पड़ जाते हैं अथवा शरीर में गाँठे निकल आती है।
मिश्रित कुष्ट- इसमें शरीर के अवयवों की संवेदनशीलता समाप्त होने के साथ-साथ त्वचा में चकत्ते भी पड़ते हैं और गाँठे भी निकलती हैं।

कुष्ट संक्रमण का तत्काल विस्फोट नहीं होता ! 

Lepromatous_Leprosy-

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Oral Lesions of Leprosy

 अन्य रोगों की तरह इसके संक्रमण का तत्काल विस्फोट नहीं करता। उसको गति इतनी मंद होती है। कि संक्रमण के दो से पाँच वर्ष बाद ही रोग के लक्ष्ण उभरते हैं और तब शरीर का कोई भाग संवेदनहीन हो जाता है अथवा त्वचा पर चकत्ते निकलते हैं या कान के पास अथवा शरीर के किसी अन्य भाग में गाँठ पड़ जाती है।    इससे रोगी को तत्काल किसी प्रकार का कोई कष्ट नहीं होता। फलत: लोग इसकी ओर तत्काल ध्यान नहीं देते। रोग उभरने के बाद भी वह अत्यंत मंद गति से बढ़ता है और पूर्ण रूप धारण करने में उसे चार-पाँच बरस और लग जाते है। रोग के विकसित हो जाने के बाद भी रोगी सामान्यत: अपने को इस रोग से ग्रसित होने की कल्पना नहीं कर पाता। वह इस अवस्था में आलस्य, थकान, कार्य करने की क्षमता में कमी, गर्मी और धूप बर्दाश्त न हो सकने की ही शिकायत करता है।

Note the necrotizing skin reaction associates with non-nodular diffuse leprosy referred to as Lucio

जब यह रोग और अधिक बढ़ता है तो धीरे-धीरे मांसमज्जा क्षय (ड्राइ अव्सार्वशन) होने लगता है।   जब वह हड्डी तक पहुँच जाता है तो हड्डी भी गलने लगती है और वह गलित कुष्ट का रूप धारण कर लेता है। कभी जब संवेदना शून्य स्थान में कोई चोट लग जाती है अथवा किसी प्रकार कट जाता है तो मनुष्य उसका अनुभव नहीं कर पाता; इस प्रकार वह उपेक्षित रह जाता है। इस प्रकार अनजाने ही वह व्रण का रूप धारण कर लेता है जो कालांतर में गलित कुष्ट में परिवर्तित हो जाता है।

कुष्ठ रोग , ठीक हो जाता है ; नही करें घृणा !

leprosy patient

Harvard graduate treating Bihar leprosy patients honoured

इस रोग के संबंध में लोगों में यह गलत धारणा है कि यह असाध्य है।   गलित कुष्ट की वीभत्सता से समाज इतना आक्रांत है कि लोग कुष्ट के रोगी को घृणा की दृष्टि से देखते हैं और उसकी समुचित चिकित्सा नहीं की जाती और उसके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाता है।  वास्तविकता यह है कि कुष्ट रोग से कहीं अधिक भयानक यक्ष्मा, हैजा और डिप्थीरिया हैं। यदि लक्षण प्रकट होते ही कुष्ट रोग का उपचार आरंभ कर दिया जाए तो इस रोग से मुक्त होना निश्चित है। मनुष्य स्वस्थ होकर अपना सारा कार्य पूर्ववत् कर सकता है। इस प्रकार कुष्ट,  रोग होने के साथ-साथ एक सामाजिक समस्या भी है। उपेक्षित रोगी जीवन से निराश होकर प्राय: वाराणसी आदि तीर्थों एवं अन्य स्थानों पर चले जाते हैं जहाँ उन्हें रहने को स्थान और खाने को भोजन आसानी से मिल जाता है। वहाँ के भिक्षुक बनकर घूमते हैं। अत: चिकित्सा व्यवस्था के साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि समाज में कुष्ट के रोगी के प्रति घृणा के भाव दूर हों।

Dr. J.H. Maurya

Vaidambh Media

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